Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 65

प्रशंसकों से निज को ना आँको

109 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

किसी इंसान को दुःख देना इतना आसान है जितना समुद्र में पत्थर फेंकना, पर कोई यह नहीं जानता कि वो कितनी गहराई तक गया होगा?
अहिंसा
दुःख भोगने वाला तो भविष्य में सुखी हो सकता है लेकिन दुःख देने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता है।
कर्म
जो किसी को दुःख नहीं देता है उसके दर्शन मात्र से भी पुण्य होता है।
अहिंसा
मुसीबत की बेला में आँसू मत ढुलकाइए अपनी श्रेष्ठ बुद्धि का उपयोग कीजिए भाग्य के ९९ द्वार बंद होने के बावजूद भी आपके लिए कोई न कोई द्वार अवश्य खुला होगा।
पुरुषार्थ
ज्ञानी बनना दुःख का कारण नहीं अभिमानी बनना दुःख का कारण है।
विनम्रता
अंधा वह नहीं जिसकी आँख फूट गयी अपितु अंधा वह है जो अपने दोष ढकता है।
विवेक
विदेशों में विद्या धन है, संकटों में बुद्धि धन है, पर लोक में धर्म धन है और शील सर्वत्र धन है।
धर्म
ज्ञान से बड़ा धन और चारित्र से बड़ा धर्म कोई नहीं है।
ज्ञान
धर्म कामधेनु है, धर्म चिन्तामणि है, धर्म स्थिर रहने वाला कल्पवृक्ष है और धर्म अविनाशी निधि है।
धर्म
धर्म श्रवण से पापों का नाश, पुण्य, बुद्धि, स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
धर्म
भय, उदारता, कीर्ति, आशा और लज्जा से पंचमकाल में धर्म की प्रवृत्ति होती है।
धर्म
कोई भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सचमुच में शान्त रहें तो समाधान मिल जायेगा।
संयम
निद्रा के समय मुख से ताम्बूल, शय्या से स्त्री, ललाट से तिलक और सिर से पगड़ी का त्याग कर देना चाहिए।
विविध
बड़ी गहरी आती है नींद जब पता हो कि कोई समय से जगा देने वाला है।
विविध
असाता के उदय में नींद नहीं आती है, साता के उदय में नींद आती है, मुनि तो निद्रा जय के लिए तपस्या करते हैं। सहज निद्रा आ रही है तो आपका पुण्य है और निद्रा न आये तो स्वाध्याय करो, मंत्र जाप करो पर चिंता न करो। पाप के उदय में नींद न आये तो पुण्य तो किया जा सकता है।
कर्म
अधिकारों के साथ कर्त्तव्यों का ध्यान रखना चाहिए।
चरित्र
पूर्व की ओर मुख करके भोजन करें, दक्षिण की ओर मुख करके मल त्याग करें, उत्तर की ओर मुख करके मूत्र विसर्जन करें, पश्चिम की ओर मुख करके पैर धोयें।
स्वास्थ्य
सूर्य की धूप से सन्तप्त व्यक्ति यदि तुरन्त स्नान करता है तो उसकी दृष्टि मन्द पड़ जाती है और सिर में पीड़ा होती है।
स्वास्थ्य
घर में फूटे बर्तन और टूटी खाट रहने से धन की हानि होती है।
विविध
जो व्याकरण शास्त्र के अध्ययन बिना पदार्थों का विवेचन करता है वह चन्द्रमा का चुम्बन करना चाहता है, सूर्य को ग्रहण करना चाहता है, समुद्र को भुजाओं से तैरना चाहता है।
ज्ञान
प्रेम से बढ़कर प्रार्थना नहीं है।
भक्ति
जो व्याकरण के अध्ययन बिना सभा के बीच बोलना चाहता है वह वन में मदोन्मत्त हाथी को मृणाल सूत्र से बाँधना चाहता है।
ज्ञान
प्रार्थना और ध्यान इंसान के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि प्रार्थना में भगवान् भक्त की बात सुनता है और ध्यान में भक्त भगवान् की बात सुनता है। प्रार्थना प्राणों से होती है और ध्यान भावों से होता है। प्रार्थना प्रभु के साकार रूप की होती है और ध्यान प्रभु के निराकार रूप का होता है। प्रार्थना में भक्त भगवान् से जुड़ जाता है और ध्यान से भक्त भगवान् बन जाता है। गृहस्थ जीवन जीने वालों के लिए प्रार्थना और साधु जीवन जीने वालों के लिए ध्यान परमात्मा को पाने का सरल उपाय है।
ध्यान
छोटे से भी पाप का यदि प्रायश्चित्त नहीं किया तो वह एक दिन पहाड़ जैसे विशाल चारित्र को भी नष्ट कर देता है, जैसे छोटा सा बट का बीज यदि मुख से भी फूँक दें तो उड़ जायेगा लेकिन यदि वह अंकुरित होकर वृक्ष बना तो पहाड़ को भी फोड़ देता है।
कर्म
भेषधारी साधु को, गुरु को, ब्राह्मण को, राजा को, स्त्री को, मूर्ख को, बालक को और सर्प को पंडितजन कुपित नहीं करते हैं। समाधि निष्परिग्रही की होती है।
विवेक
यदि आपने ख्याति चाही तो नामकर्म की प्रकृति को ही माँगा अतः आप मुमुक्षु नहीं हैं।
अनासक्ति
ब्रह्मचर्य के बिना मोह नष्ट नहीं होता, मित्र के बिना दुःख, सूर्य के बिना अन्धकार, सन्तोष के बिना लोभ, पथ्य के बिना रोग, पुण्य के बिना दुःख नष्ट नहीं होता है पुण्य हीन को वस्तु मिलने पर भी सुख प्राप्त नहीं होता किन्तु जो पुण्यवान होता है उसे जंगल में भी सुख/सम्मान प्राप्त होता है।
ब्रह्मचर्य
बुद्धि का फल तत्त्व विचार, शरीर का फल व्रत धारण, धन का फल पात्र दान और वाणी का फल मनुष्यों में प्रीति उत्पन्न करना है।
विवेक
जैसे शादी का फल पुत्र है, शास्त्र का फल शान्ति है, सम्पत्ति का फल दान है, लक्ष्मी का फल कीर्ति है, श्रम का फल धन है वैसे ही ज्ञान का फल वैराग्य है, वैराग्य का फल दीक्षा और दीक्षा का फल मुक्ति है।
ज्ञान
बड़ा वह होता है जो छोटों को मिला लेता है, बड़ा वह नहीं होता जो छोटों को छोड़ देता है, समुद्र वह होता है जो अनेक छोटी नदियों को अपने में समा लेता है।
विनम्रता
मीठे वचन से मित्रता, विनय से गुण, दान से यश, अभ्यास से विद्या, उदारता से विश्वास, श्रृंगार से अनुराग, संसर्ग से प्रेम, उद्यम से लक्ष्मी, न्याय से राज्य, लोभ से मोह, क्रोध से अपराध और सेवा से सम्मान बढ़ता है।
चरित्र
डोर लम्बी हो तो मतलब यह नहीं कि पतंग ऊपर तक जायेगी उड़ाने का तरीका आना चाहिए, दौलत ज्यादा होने का मतलब सफल जीवन नहीं, जीने का तरीका आना चाहिए।
समृद्धि
इस तरह न कमाओ की पाप हो जाये, इस तरह न गमाओ की कर्ज हो जाये, इस तरह न खाओ की मर्ज हो जाये, इस तरह न बोलो कि क्लेश हो जाये, इस तरह न चलो कि देर हो जाये, इस तरह न सोचो कि चिन्ता हो जाये।
विवेक
छोटे लोग पैसों की बात करते हैं, बड़े लोग समय की बात करते हैं, महान् लोग बात ही नहीं करते वो सिर्फ लिखते हैं।
विविध
ढाईद्वीप सिद्धक्षेत्र है यहाँ पाप न करें।
धर्म
दूसरों को भी सुनेंगे तो कुछ नया सीखने मिलेगा।
विनम्रता
लोगों के लिए आप तब तक अच्छे हो जब तक आप उनकी उम्मीदों को पूरा करते हो और आपके लिए लोग तब-तक अच्छे हैं जब तक आप उनसे कोई उम्मीद न रखें।
संगति
क्षुद्र बातें क्षुद्र मस्तिष्क को प्रभावित करती है।
मन
बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो अच्छाई के सामने छोटी लगती है।
चरित्र
जिस दिन आपको यह पता चलेगा कि नेकी करने से शान्ति मिलती है तो आप बुरा काम करना छोड़ देंगे।
चरित्र
अकल कितनी भी तेज हो नसीब से जीत नहीं सकती बीरबल कितना भी अकलमन्द क्यों न था कभी बादशाह नहीं बन पाया था।
कर्म
विनयपूर्वक किया हुआ श्रुत का अध्ययन, यदि प्रमादवश भूल जाता है तो भी भविष्य में केवलज्ञान प्राप्त कराता है।
ज्ञान
ज्ञान का भूषण क्षमा है।
क्षमा
जो विकारी होते हैं वे भिखारी होते हैं और जो निर्विकारी होते हैं वे भिक्षु होते हैं।
संयम
जो खाने में विवेक नहीं रखते वे मरने के बाद चींटी बनते हैं क्योंकि चींटी दुनिया में सर्वभक्षी हैं, जो मिश्री से लेकर मांस तक सब खाती है, उसकी कषाय इतनी तीव्र होती है कि यदि वह चिपक जाये तो प्राण दे देंगी पर छोड़ती नहीं है।
आहार
चन्द्रनाड़ी में भोजन करने से बीमारी बढ़ती है, अतः सूर्य नाड़ी में भोजन और चन्द्र नाड़ी में भजन करना चाहिए।
आहार
जो काँसे के बर्तन में भोजन करता है उसकी आयु, बुद्धि, यश और बल की वृद्धि होती है।
स्वास्थ्य
पश्चिम दिशा में मुख कर भोजन करने से रोग होते हैं, पूर्व या उत्तर में मुखकर भोजन करें, दक्षिण दिशा में मुख करके भोजन करने से शीघ्रमरण होता है।
आहार
जैसे मधुर दूध को नींबू की बूँद खराब कर देती है, वैसे ही भगवान् आत्मा को भोगों की बूँद विकृत कर देती है।
अनासक्ति
मल-मूत्र वमन आदि के समान निन्दनीय मधु सेवन, जब भोजन में पड़ी हुई मक्खी को देखकर व्यक्ति उस भोजन को सेवन नहीं करता तो फिर मधुमक्खियों के घृणित वमन को कैसे खा सकता है?
आहार
महान् स्थान पर बैठकर आदमी महान् नहीं होता बल्कि महान् आदमी जहाँ बैठ जाता है वह स्थान महान् बन जाता है।
चरित्र
हर व्यक्ति को भगवान् सुबह से दो रास्ते दिखाता है—१. उठिये और मनचाहे सपने पूरे कीजिए, २. सोते रहिये और मन चाहे सपने देखते रहिए।
पुरुषार्थ
भगवान् सबके घर जाकर प्रेम नहीं दे सकता इसलिए उसने माँ बनाई, इसी तरह सबके घर जाकर सजा नहीं दे सकता इसलिए पत्नि बनाई है।
परिवार
मोक्ष जाना है तो मुनि बनकर मौन रहो, जैसे तीर्थंकर मुनि बनकर मौन हो जाते हैं। भोजन जल्दी वही पकता है जिस पर ढक्कन रखा होता है, जितना ढक्कन बंद रखोगे उतनी वाष्प बनेगी, उतनी ऊर्जा संचित होगी, उतने जल्दी मोक्ष में गमन होगा। मौन से धर्म और यश की वृद्धि होती है।
वाणी
जहाँ न सम्मान हो, न आजीविका हो, न बन्धुजन हो, न अपने धर्म की रक्षा हो, न धर्मात्मा, न दानी, न परोपकारी, न गुणवान हों और न विद्या प्राप्ति का साधन हो, न राजा हो अथवा बहुत राजा हों, जहाँ स्त्री राजा हो या बालक राजा हो या मूर्ख राजा हो वहाँ नहीं रहना चाहिए।
विवेक
रिश्ते खून के नहीं एहसास के होते हैं, अगर अहसास हो तो अजनबी भी अपने और अगर अहसास न हो तो अपने भी अजनबी होते हैं।
संगति
इंसान इसलिए मायूस होता है क्योंकि वह परमात्मा को राजी करने के बजाय लोगों को राजी करने में लगा रहता है।
भक्ति
भगवान् की नजरों में वो इंसान बड़ा नहीं जो करोड़ों रुपये कमाता है बल्कि वो इंसान बड़ा है जो करोड़ों के दिलों पर राज करता है।
चरित्र
इंसान सुखी होने के लिए घर बदलता है, कपड़े बदलता है, गाड़ी, मोबाइल नम्बर, पता और पता नहीं क्या-क्या बदलता है फिर भी वो सुखी नहीं हो पाता क्योंकि वो अपना स्वभाव नहीं बदलता है। खुद की नजरों में ईमानदार बनो।
चरित्र
पत्थर सिर्फ एक बार मंदिर जाता है तो भगवान् बन जाता है और इंसान प्रतिदिन मंदिर जाता है फिर भी पत्थर दिल बना रहता है।
भक्ति