Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 65

प्रशंसकों से निज को ना आँको

109 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

जो दारिद्र से पीड़ित होकर भी कभी विषयासक्ति को छोड़ने में समर्थ नहीं हैं, वे अधम हैं।
अनासक्ति
पापों का प्रायश्चित और हितकारी धर्म करने में बिल्कुल भी विलम्ब न करें।
धर्म
विषय वासना, बुरे विचार शत्रु हैं तथा दया, दान, दीक्षा, धर्म कार्य का निषेध करने वाले लोग शत्रु हैं।
संगति
प्रमाद आलस अनुत्साह ने आपको आगे नहीं बढ़ने दिया है अतः इन्हें छोड़े।
पुरुषार्थ
सर्वाधिक धारा प्रवाही वक्ता अथवा सर्वाधिक उपयुक्त तार्किक सदैव न्याय पूर्ण विचारक नहीं होते हैं।
विवेक
प्रसिद्धि चाहने वाले की आत्मसिद्धि नहीं हो सकती है।
अनासक्ति
प्रशंसा का रस परमात्मा के रसपान में साधक नहीं बाधक है।
अनासक्ति
प्रशंसा से ज्ञानी का विकास होता है और अज्ञानी का विनाश होता है।
विनम्रता
प्रशंसा की भट्टी में अच्छे-अच्छे पिघल जाते हैं।
विनम्रता
मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना उसे झूठी तारीफ सुनकर बर्बाद होना तो पसंद है, पर सच्ची आलोचना सुनकर सम्भलना पसंद नहीं होता है।
विनम्रता
सच्ची प्रशंसा वही है जो पीठ पीछे होती है।
चरित्र
उन्हीं चीजों के लिए प्रार्थना करें जिन्हें खुद हासिल नहीं कर सकते हैं।
भक्ति
प्रशंसा भी कभी-कभी व्यक्ति को महान् बना देती है।
विविध
निर्बल के बल राम, जो किसी की गुलामी नहीं करना चाहता, उसे ईश्वर की गुलामी करनी चाहिए।
भक्ति
पर के निर्णय पर चलना पराधीनता है।
संयम
हे भगवान् यदि मुझे कुछ बनाना ही है तो शून्य बना दे ताकि जिससे भी जुड़ जाऊँ वो दस गुना बढ़ जाये।
विनम्रता
कभी आप दूसरों के लिए भगवान् से कुछ माँग कर देखे, तुम्हें अपने लिए कुछ माँगने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
दान
गुरु आशीर्वाद देने में तब गूँगे रहते हैं, जब हमारा हृदय उनकी वाणी सुनने में बहरा रहता है।
भक्ति
हजार मूर्खों की अपेक्षा एक पंडित श्रेष्ठ होता है।
ज्ञान
इतिहास साक्षी है कि आज तक जितने महापुरुष उपहास को प्राप्त हुए हैं, वे सब धन, धरती और स्त्री के कारण पवित्र यश पताका को नष्ट करके गये हैं।
अनासक्ति
पिता की मौजूदगी सूरज की तरह होती है, सूरज गर्म जरूर होता है अगर न हो तो अँधेरा छा जाता है।
परिवार
ब्रह्मचर्य के बिना आत्मशुद्धि असंभव है।
ब्रह्मचर्य
बुराई नौका में छिद्र के समान है वह छोटी हो या बड़ी एक दिन नौका को डुबो देती है। हमारा व्यवहार और शब्द शत्रु और मित्र बनाते हैं।
चरित्र
आलसी, अज्ञानी, अविवेकी व्यक्ति ही कहते हैं कि भाग्य से अधिक और समय से पहले नहीं मिलता, जबकि वैज्ञानिक युग में जीने वाले पुरुषार्थी पुरुष कहते हैं समय से पहले भाग्य से अधिक मिलता है, आज किसान समय से पहले भाग्य से अधिक फसल पैदा करते हैं, बांझ स्त्री भी संतान सुख प्राप्त कर सकती हैं, यहाँ तक पुरुष स्त्री और स्त्री पुरुष बन सकते हैं।
पुरुषार्थ
दूसरों के बारे में भाव बिगाड़ने से स्वयं का भव बिगड़ता है।
मन
भाग्य देखो! कुछ पढ़े लिखे नौकरी कर रहे हैं और कुछ अनपढ़ राजा बनकर राज्य कर रहे हैं।
कर्म
वैराग्य तपस्वी का आभूषण है।
अनासक्ति
हर अक्षर मंत्र है गीत भी मंत्र है और गाली भी मंत्र है, मंत्र का तात्पर्य प्रभावित कर देना है, यदि आपने किसी मुस्कुराते व्यक्ति को गाली दी तो वह भी रोने लगता है और यदि रोते व्यक्ति की प्रशंसा की तो वह प्रसन्न हो जाता है, मंत्र अनेक प्रकार के होते हैं। जैसे आकर्षण, सम्मोहन, वशीकरण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषीकरण, मारण आदि।
णमोकार
मन को वश में करने का अर्थ है आकांक्षाओं को भौतिक प्रवृत्तियों से मोड़कर आत्मिक उद्देश्यों में नियोजित करना।
मन
तीर्थंकर भगवान् ने अपनी माँ के १६ स्वप्न साकार कर दिये तो आप माँ-बाप का एक स्वप्न पूरा करो बुढ़ापे में उनकी सेवाकर उनके ऋण से मुक्त हो जाओ।
परिवार
मध्यस्थ मनुष्य सभी को प्यारा होता है।
चरित्र
व्रतों में प्रशम गुण प्रधान है।
संयम
समुद्र खारा, चन्द्रमा कलंकित, सूर्य तीक्ष्ण, मेघ चपल, आकाश शून्य, कामधेनु पशु, कल्पवृक्ष काष्ठ, चिन्तामणि पाषाण है अतः सज्जनों की समानता किससे हो? अर्थात् सज्जन इन सबसे भी श्रेष्ठ होते हैं।
चरित्र
विकल्प मिलेंगे बहुत मार्ग भटकाने के लिए, संकल्प एक ही काफी है मंजिल तक जाने के लिए। अगर निगाहें हों मंजिल पर और कदम हों राहों पर तो ऐसी कोई राह नहीं जो मंजिल तक न ही जाती है।
पुरुषार्थ
अनुचित कार्यारंभ, आत्मीय जन से विरोध, बलिष्ठों से ईर्ष्या, स्त्रियों पर विश्वास ये ४ मृत्यु के द्वार हैं।
विवेक
जिसकी होनहार बिगड़ चुकी है, मरण नजदीक है उसे वीतराग भगवान् के चरण दिखाई नहीं देते, स्वयं की नासिका भी नहीं दिखती है।
समाधि
मंजिल मिल ही जायेगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो होते हैं जो घर से निकलते ही नहीं हैं। आज रोटी के पीछे भागता हूँ तो याद आता है कि मुझे एक रोटी खिलाने के लिए माँ मेरे पीछे भागती थी।
परिवार
बूढ़े माँ-बाप की आँखें घर का वैभव नहीं पारिवारिक एकता देखकर खुश होती हैं।
परिवार
यदि आपने नरक के दुःखों को नहीं देखा है, तो तिर्यंच गति के दुःखों को देख लो, तन पर छुरी चल रही है, तन को छीला जा रहा है, फिर भी मुख से आवाज नहीं निकाल पा रहा है, अपने आपको बचा भी नहीं सकता है, ये सब मायाचारी का परिणाम है।
कर्म
मुनि शापानुग्रह में समर्थ होते हैं अतः उनका अपमान दोनों लोको में दुःखदायी होता है।
धर्म
मौत को छोड़कर शेष के लिए 'कल' का ख्याल अवश्य आता है कि 'कल' क्या होगा, परीक्षा चार दिन की पर पाठ्यक्रम तो १२ महीने का, जज का फैसला आधा घंटे का पर १२ साल लड़ना पड़ता है, मंजिल छोटी पर रास्ता लम्बा होता है इसी तरह मौत चाहे एक पल की घटना है पर उसे सुधारने के लिए जिन्दगी भर सावधानी रखनी पड़ती है, संभव है, बिना पढ़े सिर्फ नकल करके कोई विद्यार्थी परीक्षा में पास हो जाए, रिश्वत देकर अदालत के चक्कर से बच जाए किन्तु बिना जागे मौत नहीं सुधर सकती, अतः जीवन में याद रखो शुभ कार्य आज अभी इसी समय और अशुभ कार्य फिर कभी किसी समय।
समाधि
मौत से बचने का शानदार तरीका है दूसरों के दिलों में जिन्दा रहना सीख लो वरना मर तो इंसान तभी जाता है जब याद करने वाला कोई न हो।
समाधि
डॉक्टर मुख पर पट्टी बाँधकर शल्यक्रिया करता है उसी प्रकार आप भी दूसरों की रक्षा करो अपनी सुरक्षापूर्वक।
अहिंसा
आप अपनी दो चीजों से रक्षा करो-एक कामना दूसरी कामिनी।
ब्रह्मचर्य
नीति से रहित नेता, विनय से रहित शिष्य, शील रहित साधु, शान्ति से रहित साधक, पुण्य रहित आत्मा और धन रहित गृहस्थ कुछ भी नहीं है।
चरित्र
संसार में धन, गुणों से उदार, सुन्दर, दीर्घायु, सम्यक् ज्ञान से सहित और प्रधान पद आदि दिन में भोजन करने वाले प्राप्त करते हैं।
आहार
रास्ते कहाँ खत्म होते हैं जिन्दगी के इस सफर में, मंजिल तो वही है जहाँ इच्छाएँ रुक जायें।
संतोष
राजनैतिक उन्नति के लिए पहले सामाजिक उन्नति आवश्यक है।
विविध
जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नहीं, पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है। 'याद करने से रिश्ते मजबूत हो जाते हैं।'
परिवार