Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Self-control

संयम

447 सूत्र · पृष्ठ 6 / 6

यदि इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों का दमन कर लिया है, तो पुरुषों की शूरता, गम्भीरता, उदारता, ध्यान, अध्ययन और तप सभी सार्थक होते हैं।
संयम
व्याघ्री ने तन खाया- व्याघ्री ने सुकौशल स्वामी को खाया और कीर्तिधर मुनि का उपदेश सुनकर प्रायश्चित्त से रो–रो कर भीग गयी और संयम धारण कर स्वर्ग गयी, मुनि भक्षी व्याघ्री भी संयम के प्रभाव से स्वर्ग चली गयी तथा असंयम से क्षायिक सम्यग्दृष्टि श्रेणिक नरक गया था।
संयम
संयम आचरण के चारों ओर लगायी जाने वाली बाड़ी है।
संयम
बचपने में मुनिपना चल सकता है पर मुनिपने में बचपना नहीं चल सकता है।
संयम
सन्त लेटे-लेटे आतेहैं, और बैठे-बैठे जाते हैं, और श्रावक लेटे-लेटे आते हैं, और लेटे-लेटे ही जाते हैं, उनकी अर्थी कफन से इसलिए ढकी होती है, कि उन्होंने जीवन में संयम नहीं पाला इसलिए मुँह दिखाने लायक नही हैं, सन्त की अर्थी खुली होती है और वे बैठे-बैठे जाते हैं।
संयम
ऊँचे गिरि से जो गिरे, मरे एक ही बार। जो संयम गिरि से गिरे, बिगड़े जन्म हजार।।
संयम
बालपने में ज्ञान जो लहे, तरुण समय संयम रत रह्यो। जब आवे बूढ़ा पनो, तब रूप लखो आपनो।।
संयम
रेशम के वस्त्र, क्रीम, लिपिस्टिक, चमड़े के जूते आदि स्पर्शन इन्द्रिय के असंयम हैं।
संयम
सुन्दर-सुन्दर भोजन, पान-मसाला, कोकोकोला, चाट-पकोड़ी गाली-हँसी आदि रसना इन्द्रिय के असंयम हैं।
संयम
हड़बड़ी में अधूरी सांस लेना, खुशबू लेना, तास खेलने के लिए समय हैं शुभ कार्य के लिए समय नहीं हैं यह घ्राण इन्द्रिय का असंयम है।
संयम
ऐसे देखो जैसे माँ बेटे को, भाई बहन को, गाय बछड़े को देखती है, कुत्ता बिल्ली की तरह देखना आँख का असंयम है।
संयम
मन्त्र, भजन, प्रवचन सुनना संयम है, गाली, निन्दा एवं अश्लील कथाएँ सुनना कर्ण इन्द्रिय का असंयम है।
संयम
यदि खेत में वाड़ी न हो तो लहलहाते खेत चौपट हो जाते हैं, इसी प्रकार संयम वाड़ी है संयम न हो तो शेष गुण भी स्थायी नहीं रहते हैं।
संयम
संयमी को देखकर आनन्द नहीं आना, असंयम है।
संयम
तीन गति तेरासी लाख, निन्यानवे हजार, नौ सौ निन्यानवे योनियों में संयम नहीं होता है।
संयम
दुर्जेय इन्द्रियों द्वारा ठगाया गया जो दीन पुरुष जिह्वा को जीतने में असमर्थ रहता है, वह कामादिक उद्दण्ड शत्रुओं को कैसे नष्ट कर सकता है।
संयम
जो सबको भक्षण करने वाली शाकिनी रूप जिह्वा को वश में नहीं कर सकता है, वह दीक्षा लेकर तप करता हुआ लज्जित क्यों नहीं होता है।
संयम
जिस असंयम से आज तक सुख नहीं मिला, अज्ञानी वहीं सुख खोज रहा है।
संयम
आचार्यों ने लिखा है- अगर तू इन्द्रियों का दमन नहीं कर पाया तो फिर परमार्थ की दुकान क्यों लगा रखी है। बाहर से धुला हुआ है और अन्दर से मलिन है ऐसे में तेरे हाथ में कुछ भी नहीं लगेगा।
संयम
जो स्वयं पर अनुशासन नहीं कर सकता वह दूसरों पर क्या अनुशासन करेगा।
संयम
भिक्षा से भोजन करो, जङ्गल मे निवास करो, भोजन थोड़ा करो, ज्यादा मत बोलो, दुःख सहन करो, निद्रा जीतो, और प्राणी मात्र के प्रति मित्रता रखो एवं वैराग्य धारण करो।
संयम
वाहन में ब्रेक, घोड़े में लगाम, नदी में तटों का बन्धन जनोपयोगी बनकर सुरक्षित गन्तव्य पर पहुँचाकर सागर सा विराट रूप दिलाता है।
संयम
इन्द्रियों मे रसना, कर्मों मे मोहनीय, व्रतों मे ब्रह्मचर्य और गुप्तियों में मनोगुप्ति, ये चारों कठिनाई से जीते जाते हैं।
संयम
संयम की वृद्धि स्वाध्याय एवं वैराग्य से होती है।
संयम
इन्द्रियाँ धोखेबाज हैं साधक को साधना के मार्ग में सदा सावधान रहना चाहिए।
संयम
छब्बीस दिन डनलप के गद्दे पर तो चार दिन चटाई पर भी सोने का अभ्यास करो।
संयम
उपवास के विना मनुष्य काम का मर्दन करने में समर्थ नहीं हो सकता है, क्योंकि सिंहों के द्वारा ही मदोन्मत्त हाथी विदीर्ण किये जाते हैं।
संयम
वृतिपरिसंख्यान- वृतिपरिसंख्यान में गृहस्थ भी प्रतिज्ञा लेता है कि जिनधर्म पाया है, अतः दर्शन, ज्ञान, चरित्र नष्ट न हो जाय, इसलिए जिसमें पाप अधिक हों ऐसे व्यापार नहीं करता है, भोगोपभोग का परिमाण करता है, माँगकर नहीं खाऊँगा यह प्रतिज्ञा करता है, कोई कहेगा तो भोजन करूँगा इत्यादि प्रतिज्ञा करता है।
संयम
आचार्य शान्तिसागर जी घड़ी पहने हुए लोगों से आहार नहीं लेते थे, लेकिन सन् 1928 में कटनी चतुर्मास के दौरान नियम लिया कि जो हाथ में घड़ी लेकर पड़गाहन करेगा तब आहार लेंगे, आचार्य श्री पण्डित जगन्मोहनलाल जी के सामने से निकल गये थे, पण्डितजी ने सोचा कि अब पड़गाहन नहीं मिलेगा इसलिए उतारी हुई घडी पुनः हाथ में ले ली, आचार्य श्री लौट कर आये और घड़ी देखकर पड़गाहन हो गया, एक बार नियम लिया कि बैल के सींग में गुड़...
संयम
द्वितीय पाण्डव भीमसेन मुनि ने भाले से आहार लेने का नियम लिया था।
संयम
रसपरित्याग- दूध, घी, आदि षट् रस में से कोई रस का त्याग करना साधु और गृहस्थ दोनों रस परित्याग करते हैं।
संयम
कायक्लेश-एकाशन से बैठना, एक करवट से सोना, मौन रहना, ग्रीष्म काल में पर्वत पर रहना।
संयम
जो साधु वैयावृत्ति में कुशल, विनयी, सर्वसङ्घ का पालक, वैरागी और जितेन्द्रिय होता है उसे प्रज्ञाश्रमण कहा जाता है।
संयम
पाँच समितियों का पालना, मन-वचन-काय को चलायमान नहीं होने देना, रागद्वेष रहित आत्मानुभव करना तप है।
संयम
सब शुद्धियों में तप की शुद्धि प्रशंसनीय है, देव तप शुद्धि से शुद्ध मनुष्यों के सेवक होते हैं।
संयम
जो सज्जन विषयों को विष के समान देखकर तपश्चरण करते हैं, वे पुण्यशाली हैं, महोत्साही हैं और वे परम उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त होते हैं।
संयम
शरीर में क्षमता न होने के कारण चिरकाल तक तपस्या नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, किन्तु मन से वश में करने योग्य कषाय रूपी शत्रुओं को नहीं जीता तो यह तुम्हारी अज्ञानता है।
संयम
वह बाह्य तप माना जाता है जिससे मन दूषित न हो, योगों में हानि न हो तथा श्रद्धा बनी रहे।
संयम
वन में वास, कायक्लेश, मासोपवास, अध्ययन, मौन इत्यादि समता से रहित श्रमणों का क्या कर लेंगे? अर्थात् समता के विना ये सभी मोक्ष प्राप्त नहीं करा सकते।
संयम
मोक्षमार्ग में जिसने जितने अंशों में अथवा जितने समय तक इन्द्रिय, कषाय और संज्ञा को वश में किया है उसने उतने अंशों में अथवा उतने समय तक पाप आस्रव को रोका है।
संयम
चाणक्य के पैर में काँटा लगा, चाणक्य ने काँटे को जड़ से उखाड़कर उसकी जड़ में मट्ठा डाल दिया, जिससे दोबारा न उगे, इसी तरह काम-क्रोध आदि अन्तरङ्ग शत्रुओं को जड़ से उखाड़ देना चाहिए।
संयम
हमारे साथ कभी मनुष्यों की, कभी काम क्रोधादि विकारों की भीड़ हमेशा रहती है।
संयम
एक व्यक्ति मुनि महाराज के पास गया और बोला हमारे कुंए का पानी गन्दा हो गया आप कोई मन्त्र दे दीजिये, पन्द्रह दिन जाप करने के बाद देखा तो कुंए का पानी और ज्यादा गन्दा था, महाराज को उलाहना देने के लिए आया, तो महाराज ने पूँछा, आपके कुंए का पानी गन्दा कैसे हुआ है? तब उसने कहा एक दिन चार कुत्ते लड़ते हुए आये और कुंए में गिर कर मर गये, महाराज ने कहा कुत्तों को बाहर निकाला कि नहीं? उसने कहा नहीं, तो फिर आपके कुंए का पानी स्वच्छ कैसे होगा? उसी प्रकार अनादिकाल से आत्मा रूपी कुँए में पड़े हुए चार कषाय रूपी कुत्ते यदि नहीं निकाले तो आत्मा रूपी कुंआ साफ नहीं हो सकता है।
संयम
मोह के भेदों को अपना व अपने रूप मानता है, इसलिए परिग्रह बन जाता है, पहले उसे उल्टा कर दें, जैसे पारसनाथ आदि के प्रति विशेष भक्ति रख अनायतन से बचना चाहिये, अनन्तर वस्तुस्वरुप का यथार्थ श्रद्धान कर मिथ्यात्व से बचना चाहिए, संसारी प्राणी कहता है, तुमने मेरे क्रोध को नहीं देखा, अर्थात् अज्ञान से क्रोध को अपना मानता है, पहले क्रोध पर क्रोध करना एवं ''क्षमा से क्रोध को जीतना चाहिए'', इसी तरह मान के उदय से कहता है, कि तुम मेरे को क्या समझते हो? जबकि पुण्य के उदय से कुछ शक्ति धन ज्ञानादि मिला है, अतः जैनत्व का स्वाभिमान रखकर आत्म कल्याण के विषय में सोचना चाहिए एवं ''विनय से मान को जीतना चाहिए'', इसी तरह दूसरे को ठग कर अपने आप को बुद्धिमान समझता है और कहता है मुझे किसी ने नहीं पकड़ पाया, पहले पाप से बचने के लिए मायाचारी करना चाहिए, और मायाचारी को तिर्यञ्चआयु का कारण समझकर ''सरलता से माया को जीतना चाहिए'', लोभ कषाय के उदय से पर पदार्थ को अपनाना चाहता है, जबकि लोभ को पाप का बाप कहा है, अतः पहले स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति का लोभ होना चाहिए, व ''सन्तोष से लोभ को जीतना चाहिए'', अज्ञानी प्राणी दूसरों की कमजोरियों की हँसी उड़ाता है, उसे ''स्वयं की कमियों पर हँसना चाहिए'', इसी प्रकार पहले ''पञ्च परमेष्ठी से रति होना चाहिए'' और विषयों से विरक्ति होना चाहिए, ''पाप के स्थानों से अरति होना चाहिए'', अपने द्वारा किये हुए ''पापों का शोक होना चाहिए'', नरक आदि ''दुर्गतियों में जाने का भय होना चाहिए'', अपने ''दोषों के प्रति जुगुप्सा (ग्लानि) होना चाहिए'', मुक्ति स्त्री की कामना रखते हुए, ''स्त्री मात्र से विरक्ति होना चाहिए'', ''गलत कार्य करने के विषय में नपुंसक बन जाना चाहिए'' एवं ''अपने को पुरुष अर्थात् आत्मा मानकर मोक्ष का पुरुषार्थ करना चाहिए'' और ''कषाय मात्र का त्याग करना चाहिए''।
संयम
जब परिस्थिति गम्भीर हो, तब भौतिक शक्ति उतनी काम नहीं आती, जितनी समझ और सहन शक्ति काम आती है।
संयम
इन्द्रियों को काबू में रखना वरना ये तुम्हें संसार सागर में डुबो देंगी।
संयम
नित्य नियम संयम का पालन करते हुए व्यवसाय करना।
संयम
स्वयं पर अनुशासन करके किसी भी विपत्ति में विकल्प की खोज कर शान्ति पाने का प्रयास करना चाहिये एवं तनाव वाली स्थिति से दूर रहकर ही जीवन का आनन्द ले सकते हैं।
संयम
उपयोग करना अपने अधीन है- बच्चे को पाँच रुपये दिये चाहे तो खर्च कर सकता है या दान कर सकता है अथवा विभाग करके उपयोग कर सकता है, उसी प्रकार पाँच इन्द्रियाँ मिली हैं, चाहे तो भोग करें अथवा संवर निर्जरा करें।
संयम
उपकरण संयोग- दूसरे के वस्त्र, पिच्छी, पेन आदि उपयोग नहीं करना चाहिए।
संयम
''स्त्री रागकथाश्रवण तन्मनोहराङ्गनिरीक्षण पूर्वरतानुस्मरण वृष्येष्टरस स्वशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च''-इस सूत्र से पाँचों इन्द्रियों का संयम हो जाता है।
संयम
मनोगुप्ति- राग-द्वेष, मोह के त्याग रूप अथवा आगम का विनय पूर्वक अभ्यास और धर्म्य-शुक्लध्यानरूप मनोगुप्ति है, तत्त्वों को जानने वाले के मन का रागादि के साथ नहीं होना मनोगुप्ति है, कालुष्य, मोह, आहारादि संज्ञायें राग-द्वेष आदि अशुभ भावों का परिहार मनोगुप्ति है।
संयम
कायगुप्ति- बाँधना, छेदना, मारण, हाथ-पैर का सङ्कोच विस्तार आदि काय क्रिया की निवृत्ति व्यवहार काय गुप्ति है, कायक्रिया निवृत्ति या कायोत्सर्ग कायगुप्ति है।
संयम
समितियों में भी गुप्ति का सद्भाव है, अतः अणुव्रती महाव्रती दोनों को आवश्यक है, उसके विना व्रती तो हो सकता है पर संयमी नहीं होता है।
संयम
जिस प्रकार बर्तन में पटका पड़ने पर अन्दर से चोट लगाना पड़ती हैं, इसी तरह आत्मविशुद्धि के लिए अन्दर चोट लगाना पड़ती है।
संयम
सर्वार्थसिद्धि जाने वाले मुनियों को वर्ष पृथक्त्व संयम के साथ में रहना ही पड़ता है।
संयम
जेठ तपै रवि आकरो, सूखे सरवर नीर। शैल शिखर मुनि तप तपै, दाझै नगन शरीर।। पावस रैन डरावनी, बरसै जलधर धार। तरुतल निवसै साहसी, चालै झंझा बयार।।
संयम
श्रावक के व्रतों को अङ्गीकार किया, कुछ दिन तक व्रतों का पालन किया बाद में कुसङ्गति के कारण व्रत छोड़ दिये, मिथ्यादृष्टि बन गया और भव-भव में दुःख उठाए, व्रत भङ्ग के कारण राज्य से च्युत होना पड़ा, अतः प्राणों के वियोग होने पर भी व्रत भङ्ग नहीं करना चाहिए।
संयम
जो विषयों की आशा से रहित हैं, आरम्भ परिग्रह से रहित हैं, ज्ञान-ध्यान-तप में लीन रहते हैं वे तपस्वी प्रशंसनीय हैं।
संयम
जिसका पिता धैर्य है, माता क्षमा है, स्त्री शान्ति है, पुत्र सत्य है, बहिन दया है, भाई मानसिक संयम है, शैय्या भूमितल है, वस्त्र दिशाएँ है और भोजन ज्ञानामृत है ये जिसके कुटुम्बी हैं, बोलो मित्र उस योगी को किससे भय होगा?
संयम
एकान्त में रहने वाला साधु असभ्य जनों के सहवास और दर्शन से होने वाले मोह, राग-द्वेष से पीड़ित नहीं होता है।
संयम
यह महातप रूपी तालाब गुण रूपी जल से भरा है, इसकी मर्यादा रूपी तटबन्धी में थोड़ी सी भी क्षति की उपेक्षा नहीं करना चाहिए, थोड़ी सी उपेक्षा करने से जैसे तालाब का पानी बाहर निकलकर बाढ़ ला देता है, वैसे ही उपेक्षा करने से महातप में भी दोषों की बाढ़ आने का भय रहता है।
संयम
शव और शिव- शव की यात्रा दूसरों के आश्रित होती है और शिव की यात्रा स्वयं के आश्रित होती है।
संयम
जैसे बकरे को सुगन्धित तेल पिलाने पर भी वह दुर्गन्ध रहित नहीं होता है, वैसे ही भ्रष्ट साधु संयमी होने पर भी विषय कषाय का त्याग नहीं करता, जैसे पशु को उत्तम भोजन मिलने पर भी वह घास ही खाता है, उसी प्रकार दीर्घ काल तक दीक्षित होकर भी भ्रष्ट साधु इन्द्रिय विषय और कषाय के परिणाम ही करता है।
संयम
दिगम्बर मुनि होने के लिये केवल तन के वसन नहीं उतारना पड़ते, बल्कि मन की वासनाओं को भी उतारना पड़ता है।
संयम
हम निन्दक के प्रतिकूल नहीं, हम पूजक के अनुकूल नहीं। हम अपनाते हैं फूल नहीं, और ठुकराते हैं शूल नहीं।।
संयम
बाह्य स्वतन्त्रता तो मिल गई पर, आन्तरिक स्वतन्त्रता तो इन्द्रियों के जीतने पर ही मिलेगी।
संयम
गुरु की भक्ति से और संयम से घोर संसार सागर को तैर जाते हैं, आठों कर्मों का नाश करके जरा-मरण रहित हो जाते हैं, जो नित्य ही व्रत मन्त्र एवं ध्यान रूपी अग्नि में कर्मों का हवन करते हैं, षट् कर्मों में रत रहते हैं और तप ही जिनका धन है, वे सम्यक् क्रिया वाले साधु होते हैं।
संयम
इन्द्रियों के विषयों को त्याग कर पुनः कितना भी कष्ट आये, सहते रहने वाले को सहिष्णु कहते हैं।
संयम
इन्द्रिय दमन और कषाय का शमन जहाँ होता है उसे दीक्षा कहते हैं।
संयम
दीक्षा एक लड़ाई है- दीक्षा एक लड़ाई है, जिसको लड़ने में ही भलाई है। जो खुले मैदान में, बाहर नहीं वालों से, भीतर वालों से लड़ी जाती है। गुरू चरणों में सिर कर, आत्म समर्पण अदृश्य कर्म शत्रुओं से लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है... दिगम्बरत्व को धार कर, अम्बर को त्याग कर। विषय सरिता पार कर, कटीले रास्ते को पार कर लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है... यह एक खुली किताब है, जिसमें अनन्त का हिसाब है। जो मौन होकर, चर्म चक्षुओं को बन्द कर, ज्ञान चक्षुओं से लड़ी जाती है। दीक्षा एक लड़ाई है...
संयम
आत्म कल्याण के लिये स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, शुद्ध भोजन आवश्यक है, एवं अपने गुणों-अवगुणों का चिन्तन करें।
संयम