Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संयम

गुरुभत्ति संजमेण य, तरंति संसार सायरं घोरं, छिण्णंति अट्टकम्मं, जम्मण मरणं ण पावेंति। ये नित्यं व्रत मन्त्र होम निरता, ध्यानाग्नि होत्राकुलाः, षट्कर्माभिरतास् तपोधनधनाः, साधु क्रियाः साधवः।।

गुरु की भक्ति से और संयम से घोर संसार सागर को तैर जाते हैं, आठों कर्मों का नाश करके जरा-मरण रहित हो जाते हैं, जो नित्य ही व्रत मन्त्र एवं ध्यान रूपी अग्नि में कर्मों का हवन करते हैं, षट् कर्मों में रत रहते हैं और तप ही जिनका धन है, वे सम्यक् क्रिया वाले साधु होते हैं।

By devotion to the Guru and by self-restraint one swims across the terrible ocean of worldly existence, and destroying all eight karmas becomes free of old-age and death. Those who daily offer their karmas into the fire of vows, mantra and meditation, are absorbed in the six duties, and whose only wealth is austerity, are the true saints of right conduct.

— आराध्य सूत्र · #3

इसी विषय के और सूत्र

सभी संयम →
मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और इन्द्रियाँ इसके घोड़े हैं। इसको वश में करके साधना करने वाला चतुर एवं धीर पुरुष काबू में किए हुए घोड़ों से सारथी की भाँति सुखपूर्वक यात्रा करता है।
संयम