Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Self-control

संयम

447 सूत्र · पृष्ठ 5 / 6

विवेक और संयम उद्दण्डता पर नियन्त्रण करते हैं।
संयम
भीतरी अनुशासन जागे विना जीवन बदल नहीं सकता। अपने अहं को आदर्शों और उद्देश्यों से ऊपर न उठने दें।
संयम
सङ्कट के समय धैर्य रखना ही आधी लड़ाई जीत लेना है।
संयम
छः बातों पर अमल करना- 1.समता बढ़ाना, 2.कषाय घटाना, 3.निज-पर का विवेक करना, 4.आत्म ध्यान करना, 5.मैथुन से डरना, 6.उत्साह से भरना।
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जिव्हा घी खाने से चिकनी और मीठा खाने से मीठी नहीं होती, अतः जिव्हा की तरह निस्पृह होना चाहिए।
संयम
पेट को दीजिये, जीभ को देने की जरूरत नहीं, आँख सुधरने से मन सुधरता है, जीभ सुधरने से जीवन सुधरता है।
संयम
ककड़ी का जहर निकल जाय तो मीठी लगती है, उसी प्रकार आत्मा का विभाव/विकार निकल जाए तो आत्मा में आनन्द आता है।
संयम
पठन कार्य में रसना की लम्पटता बाधक है।
संयम
घर के साथ-साथ कषाय भी छोड़ो, नहीं तो जहाँ जाओगे वहीं घर बसाओगे।
संयम
कषाय तीव्र होने पर संसार की कोई भी शक्ति दुर्गति में जाने से नहीं रोक सकती है, एवं कषाय मन्द होने पर कोई भी शक्ति दुर्गति में नहीं ले जा सकती है।
संयम
हँसी मजाक से व्रत भङ्ग हो जाता है।
संयम
क्या आप सभी प्रकार की बुरी आदतों से दूर रहते हैं?
संयम
क्या आपकी इन्द्रियाँ आपके नियन्त्रण में हैं?
संयम
जो सुख चाहो जीव तुम तज दो बातें चार। बहुभोजन बहुजागना बहुसोना बहुजार (मैथुन)।।
संयम
नदी की शोभा पानी से होती है रेत से नहीं, पर्वतों की शोभा वृक्षों से होती है पत्थरों से नहीं। वृक्षों की शोभा फलों से होती है पत्तों से नहीं, मानव जीवन की शोभा संयम से होती है विषय भोगों से नहीं।।
संयम
निकट में आये हुए मनोरञ्जक विषयों से भी जिनका धैर्य स्खलित नहीं होता है, वे ही विद्वानों के द्वारा गुणवान माने जाते हैं।
संयम
कम खाना कम सोवना, कम दुनिया से प्रीत। कम बोलो मुख से वचन, यह साधु की रीत।।
संयम
इच्छा झगड़ा ज्ञान अरु, विद्या निद्राहार। खुजली मैथुन अरु व्यसन, सेवन ते बढ़ जाय।।
संयम
इन्द्रियों को पशु बना करके, तपोमय वेदी बना करके और अहिंसा की आहूति बना करके आत्म यज्ञ करना चाहिए।
संयम
आत्मा में ही समीचीन भावना उत्पन्न होती है, आत्मा ही हित का ज्ञाता होता है, आत्मा स्वयं ही हित में लगता है इसलिए आत्मा का गुरु आत्मा है और यदि आत्मा पापों को कषायों को अवगुणों को नहीं छोड़ता है तो आत्मा स्वयं का ही शत्रु है।
संयम
भक्ति भाव भादों नदी, सभी चली थर्राय। सरिता वही सराहिये, जेठ मास ठहराये।।
संयम
अपना काम स्वयं करने से कषाय कम होती है।
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शान्ति, समता साधक पुरूषों का स्वभाविक धर्म है।
संयम
प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने विचार और व्यवहार को सम्भालना समर्थ और साधक पुरूष के लिए ही सम्भव है।
संयम
महाभारत के उपरान्त, पाण्डवों ने स्नान करके शुद्ध होने की भावना व्यक्त की, तब श्री कृष्णजी उपदेश देते हैं, कि आत्मा नदी हो, संयम का जल हो, सत्य का प्रवाह हो, ब्रह्मचर्य का तट हों, दया की लहरें हों, ऐसी नदी में हे पाण्डु पुत्रों! अवगाहन करो तो अन्तर आत्मा शुद्ध होगी, जल के स्नान से आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती है।
संयम
साधु का उपदेश– राजा के आग्रह से साधु ने उपदेश देने महल में आने को कह दिया। साधु महल में गये, राजा ने बढ़िया खीर आदि तैयार की, साधु के कटोरे में धूल थी, राजा ने कटोरे में खीर नहीं दी, साधु जङ्गल जाने लगे तब राजा ने कहा कि! आपने न उपदेश दिया न आहार किया, तब साधु बोला कि! राजन आपने कटोरे में खीर क्यों नहीं दी, राजा ने कहा! उसमें धूल थी कैसे देता, साधु ने कहा! इसी तरह तुम्हारी आत्मा में कषाय रूपी धूल है, तो उपदेश कैसे दूँ, 'पच्चीस कषाय राग–द्वेष में गर्भित हो जाती है' वे आपके अन्दर हैं।
संयम
जब तक घी में छाछ है तब तक कड़–कड़ की आवाज आती है, शुद्ध होने पर शान्त हो जाता है, उसी प्रकार जब तक जीव के अन्दर कषाय रहती है, तभी तक अशान्त रहता है, कषाय निकल जाने पर शान्त हो जाता हैं।
संयम
जिसका मन वश में होगा उसका वचन भी वश में होगा, अतः वचन को वश में करने के लिए मन को वश में करना चाहिए।
संयम
भोजन में लालसा रोकने से स्वाभिमान की रक्षा होती है, भोजन के समय मौन रहने से तप बढ़ता है और श्रुत की विनय होने से कल्याण होता है।
संयम
भोजन में लालसा के कारण हुङ्कार आदि सङ्केत नहीं करना, भोजन के आगे–पीछे संक्लेश नहीं करना, मौन पूर्वक भोजन करने से तप और संयम की वृद्धि होती है।
संयम
मौन धारण करने वाले को भोजन सम्बन्धी लालसा के लिये हुङ्कार, अङ्गुलि दिखाना, खांसी, भोंह चलाना, सिर हिलाना आदि से सङ्केत नहीं करना चाहिए।
संयम
जिसके द्वारा मौन धारण किया जाता है, उसके द्वारा सन्तोष धारण किया जाता है, वैराग्य प्रदर्शित किया जाता है और संयम पुष्ट किया जाता है।
संयम
भोजन में लालसा के त्याग से तप की वृद्धि होती है, स्वाभिमान की रक्षा होती है और तीनों लोकों में मन की सिद्धि होती है। ''श्रुत की विनय होने से कल्याण की प्राप्ति होती है, समृद्धि की प्राप्ति होती है और मनुष्य लोक को प्रसन्न करने वाली जिनवाणी की प्राप्ति होती है''।
संयम
लोक में जितने भी विद्वानों के द्वारा वन्दनीय पद हैं, वे सभी मौन धारण करने वाले प्राणी के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं।
संयम
मौन का नियम पूरा हो जाने पर एक महोत्सव करना चाहिए, जिनालय में एक घण्टा दान करना चाहिए और आजीवन मौन का निर्दोष पालन करना चाहिए।
संयम
जो पर दोष कहने में मूक रहता है, पर स्त्री के देखने में अन्धा रहता है, पर के धन हरण करने में लङ्गड़ा रहता है वह पुरुष तीनों लोकों में विजय प्राप्त करता है।
संयम
विना पूँछे न बोलें, दूसरे के द्वारा पूँछे जाने पर भी न बोलें, बुद्धिमान आत्म शान्ति के लिए जानते हुए भी मूर्ख की तरह आचरण करे।
संयम
यदि स्वयं अशान्त हो तो कभी मत बोलो क्योंकि अशान्त व्यक्ति के वचन सुनकर सभा में अशान्ति होगी।
संयम
जहाँ नदी गहरी होती है वहाँ जल प्रवाह शान्त तथा गम्भीर होता है, इसी प्रकार गम्भीर व्यक्ति शान्त होता है।
संयम
अपनी सुरक्षा- अमेरिका का एक व्यापारी हेनरी फोर्ड हीरे–जवाहरात लेकर दूसरे देश जा रहा था। रास्ते में गाड़ी खराब हो गयी, तो ट्रेन से गया, तब टी.टी. ने टिकिट पूँछा तो मौन रहे, टी.टी. ने उनको पुलिस के हवाले कर दिया, सुबह अधिकारी को टिकिट बता दिया, अधिकारी ने पूँछा कि आपने रात को टी.टी. के लिए टिकट क्यों नहीं बताया, तब हेनरी बोले कि रात को मेरी सुरक्षा हो गयी, अन्यथा में अपना माल कहाँ सुरक्षित रखता, इसी प्रकार आत्मा की सुरक्षा मौन से होती है।
संयम
मौन के वृक्ष पर शान्ति के फल लगते हैं, मौन निद्रा के समान है यह ज्ञान में नई स्फूर्ति पैदा करता है।
संयम
चुप रहो तो ऐसे जैसे सामयिक कर रहे हो और खाओ तो ऐसे जैसे दवा खा रहे हो।
संयम
मौनं सर्वार्थ साधनं- सात मील चलने में जितनी शक्ति क्षीण होती है, उतनी एक घण्टे बोलने में क्षीण हो जाती है।
संयम
मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक शक्ति होती है, मौन रहो और अपनी सुरक्षा करो।
संयम
मौन को ही अज्ञानता का ढक्कन बताया है इसमें और भी अनेक गुण हैं।
संयम
मौन अभिमान का रक्षक है, ज्ञान का साधन है, पुण्य को करने वाला है, पाप को हरने वाला है, देवादि को वश में करने वाला है, क्रोध को हरने वाला है, मन की शुद्धि और सुख को करने वाला है।
संयम
मौन रखने से संसार का आधा सम्बन्ध छूट जाता है।
संयम
मौन आत्म प्रशंसा व पर निन्दा से बचाता है, मौन से आन्तरिक शान्ति एवं एकाग्रता प्राप्त होती है।
संयम
विना मौन के साथ की गई साधना से मौन के साथ की गई साधना कई गुणी फलदायी होती है।
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मौन अन्तर विकारों को जीतने का प्रमुख साधन है, शान्ति व एकाग्रता के क्षणों में अपरिमित शक्ति प्रकट होती है।
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मौन से आन्तरिक क्लेशों का विनाश होता है, एवं विवेक प्राप्त होता है व चुप रहने से पछताना नहीं पड़ता है।
संयम
परिषह जय भी मौन की साधना से ही शोभा पाता है।
संयम
मौन का स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक पक्ष तो सबल एवं सामर्थ्यवान है ही, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, पर्यावरणीय सौन्दर्य एवं नैतिक सम्बन्धों में भी मौन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।
संयम
मौन आने वाले विघ्नों को हरने वाला है, मित्रता को करने वाला है, विवाद को हरने वाला है, रत्नत्रय का संरक्षण करने वाला है और समय पर अज्ञान का नाश करने वाला भी है।
संयम
मौनव्रत के फल से नर–नारी इस जन्म में सुखी होते हैं और नर परभव में मोक्ष को तथा स्त्री पुरुषत्व को प्राप्त होती है।
संयम
चींटी से अच्छा उपदेश कोई नहीं देता, वह सदा मौन रहती है, अपना काम करती है।
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भय से उत्पन्न मौन भीरुता और संयम से उत्पन्न मौन साधुता उत्पन्न करता है।
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मौन पवित्रतम विचारों का देवालय है।
संयम
मौन निद्रा की तरह चैन देता है, मौन तुम्हारे साथ कभी विश्वास घात नहीं करता है।
संयम
साधु, चोर, पापी, पुण्यवान, ईमानदार, बेईमान, धनी, निर्धनी, अनपढ़, गुणवान, भ्रष्ट, शीलवान, मूर्ख, ज्ञानी ''मौन'' कोई भी रह सकता है, सभी के काम, क्रोध, निन्दा कम होकर नियन्त्रित होते हैं।
संयम
व्रतों का धारण करना, समितियों का पालन करना, कषायों का निग्रह करना, मन–वचन–काय की कुचेष्टा का त्याग और इन्द्रियों का जीतना संयम कहलाता है।
संयम
पाँच इन्द्रिय और मन को वश में करना इन्द्रिय संयम कहलाता है और पाँच स्थावर और त्रस जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम कहलाता है।
संयम
संयम ब्रेक, लगाम, अङ्कुश या नकेल के समान है।
संयम
घर को छोड़ना व्यवहार चारित्र है, स्व में रमना निश्चय चारित्र है।
संयम
परिणामों की निर्मलता ही चारित्र है, घर को छोड़ने के साथ कषाय छोड़ने से कल्याण होता है। कषाय नहीं छूटी तो जहाँ जायेंगे वहीं घर बस जायेगा।
संयम
यद्यपि इन्द्रिय विजय कटुक है तत्काल में दुःखदायक मालूम होता है, तथापि नित्य सुख की इच्छा करने वाले सत्पुरुषों के द्वारा वह औषध के समान सेवन किया जाता है।
संयम
लता को बन्धन देते है तो ऊँचाइयों को प्राप्त होती है उसी प्रकार संयम का बन्धन आत्मा को ऊँचाई प्राप्त कराता हैं।
संयम
यदि बाह्य हिंसा का त्याग एवं इन्द्रियों के विषयों में मात्र प्रवृत्ति न होने का नाम संयम है, तो फिर देव गति में भी संयम होना चाहिए, क्योंकि सर्वार्थ सिद्धि में तेतीस सागर तक विषय सेवन का विकल्प भी नहीं आता, रसना इन्द्रिय के विषय में भी उन्हे तैंतीस सागर तक जिव्हा जूठी नहीं करनी पड़ती, अतः सङ्कल्प पूर्वक त्याग करने का नाम ही संयम है।
संयम
''अन्तरङ्ग में कषाय से आत्मा को मलिन नहीं होने देना, बहिरङ्ग में यत्नाचार पूर्वक प्रवृति करना संयम हैं।''
संयम
जिस प्रकार गंगा का जल सेव्य है, गंदा जल असेव्य है, नल का जल सेव्य है, नाली का जल असेव्य है, उसी प्रकार संयम सेव्य है और असंयम असेव्य है।
संयम
संयम के साथ ज्ञान भी मूल्यवान होता है।
संयम
संयमधर्म संसार के बन्धनों को काटकर प्राणियों को मुक्ति प्रदान करता है।
संयम
अनावश्यक कार्य छोड़ना आवश्यक कार्य ग्रहण करना मुक्ति का कारण है।
संयम
सिर मुण्डन की अपेक्षा मन मुण्डन कठिन है, स्वर्ण को जितना तपाओ, उतना खरा उतरेगा, उसी प्रकार जितना संयम है उतना मोक्ष के निकट है।
संयम
अठ्ठाईस इन्द्रिय विषयों के विरोधी, अठ्ठाईस मूलगुण संसार के बन्धन को छेदकर मुक्ति दिलाते हैं।
संयम