मलबीजं मलयोनिं, गलन्मलं पूति गन्धि वीभत्सं। पश्यन्नङ्गमनङ्गात्, विरमति यो ब्रह्मचारी सः।।
शरीर रज-वीर्य रूपी मल से उत्पन्न हुआ है और मल को ही उत्पन्न करता है, मल को ही झराने वाला है, दुर्गंधित है, ग्लानि उत्पन्न करने वाला है, इस प्रकार शरीर को देखते हुए जो काम से विरक्त होता है, वह ब्रह्मचारी कहलाता है।
The body is born of the impurity of blood and semen, produces only impurity, discharges only impurity, is foul-smelling and disgusting; one who, seeing the body thus, turns away from lust is called a celibate.
— आराध्य सूत्र · #4
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