Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 23

समुद्र ने नहीं शराब ने लोगों को डुबोया।

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गोरा रङ्ग कुछ दिन अच्छा लगता है पर अच्छा व्यवहार पूरे जीवन भर सुख और सुकून देता है।
चरित्र
उच्च आकाङ्क्षा वाले व्यक्ति को नीति का ज्ञान होना चाहिए।
चरित्र
मुस्कान देने वाला दरिद्र नहीं होता परन्तु पाने वाला माला-माल हो जाता है।
चरित्र
मुस्कान थके हुये का विश्राम है, प्रेम की भाषा है, गुलाब सुगन्ध से, स्त्री मुस्कान से वश में करती है।
चरित्र
मलिन वस्त्र वाले, गन्दे दाँत वाले, बहुत खाने वाले, कठोर बोलने वाले, सूर्योदय और सूर्यास्त होने के समय सोने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है।
धन
जिस प्रकार जवान स्त्री बूढ़े पुरूष का आलिङ्गन नहीं करना चाहती उसी प्रकार लक्ष्मी भी आलसी, भाग्यवादी और साहस हीन व्यक्ति को नहीं चाहती है।
धन
वक्त की धार बहुत तेज होती है, वक्त और सागर की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करती हैं।
समय
विना बुद्धि का वक्ता, विना लगाम के घोड़े की तरह होता है।
वाणी
लोभी को धन से, मानी को विनय से, मूर्ख को उसका मनोरथ पूरा करके, पण्डित को सच बोलकर, विनय से मित्र को, सम्मान से बाँधवों को, दान-मान से स्त्री व सेवकों को, तथा चतुराई से सबको वश में करना चाहिये।
विवेक
निर्लोभी व्यक्ति का सिर सदा ऊँचा रहता है, स्वभाव की नीचता वर्षों में भी मालूम नहीं होती है।
संतोष
एक पाठशाला खोलना अर्थात् एक जेलखाना एवं एक अस्पताल बन्द करना है।
ज्ञान
आजीविका का साधन शरीर और चारित्र निर्माण का साधन पाठशाला है।
चरित्र
प्रेम और खाँसी छुपाये नहीं छुपते, प्रेम आँखों से नहीं मन से देखता है।
भक्ति
बड़ा वही है जो अपने को सबसे छोटा मानता है, शूट-बूट और ठाट-बाट में बड़प्पन नहीं होता, जिसकी आत्मा पवित्र है वह बड़ा है। सच्ची बड़ाई उसी की है जिसकी शत्रु भी सराहना करते है।
विनम्रता
जो बदला लेने की सोचता है वह अपने ही घाव हरा-भरा रखता है।
क्षमा
नयी चीज सीखने की जिसने आशा छोड़ दी है, वह बूढ़ा है, बुढ़ापा देखता है और सोचता है, जवानी देखती है और करने को तैयार होती है।
ज्ञान
बुद्धिमान विवेक से, साधारण मनुष्य अनुभव से, आज्ञानी आवश्यकता से और पशु स्वभाव से सीखते हैं।
ज्ञान
माया जब आती है तो बुद्धि चली जाती है, माया वेश्या है बुद्धि सती है, दोंनो की सङ्गति कैसे?
विवेक
कुलीन कन्या कुरूप भी हो तो विवाह कर लो, सुन्दर होने पर भी असंस्कारित हो तो विवाह मत करो।
परिवार
जल्दवाजी के विवाह में जीवन भर पश्चाताप करना पड़ता हैं।
परिवार
समुद्र ने नहीं शराब ने अधिक लोगों को डुबाया है, जब शराब का प्रवेश होता है तो बुद्धि बाहर निकल जाती है।
आहार
संसार की सारी सेनायें मिलकर इतनी सम्पति नष्ट नहीं करतीं जितनी अकेली शराब नष्ट करती है।
आहार
शिक्षक मोमबत्ती की तरह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाशित करता है।
ज्ञान
मछली मांस को ही देखती है, उसके नीचे छिपे काँटे को नहीं, वैसे ही यह जगत विषयों के बाह्य आकर्षण को ही देखता है, उससे होने वाले दुःख को नहीं देखता है।
अनासक्ति
सत्य और तैल सदैव ऊपर रहते हैं, सत्य और गुलाब के चारों ओर काँटे होते हैं।
सत्य
स्त्रियाँ, राजा और लतायें, जो भी साथ में होता है उसी से लिपट जाते हैं।
Misc.
जो भोजन, निद्रा और व्यायाम चिन्ता रहित होकर करता है तथा सदा हँसमुख रहता है वह दीर्घायु होता है।
स्वास्थ्य
हँसी संक्रमण की बीमारी है, एक को हँसते हुए देखकर दूसरे को हँसी आ ही जाती है।
स्वास्थ्य
जब मैं स्वयं पर हँसता हूँ तो मेरा बोझ हल्का हो जाता है।
स्वास्थ्य
हास्य वह मिश्री है जो उपदेश की कड़वी कुनैन को भी इतना मीठा बना देती है कि बच्चों से लेकर बूढ़े तक उसे बड़ी रूचि से खा लेते है, हास्य पाचन क्रिया को ठीक करने की बहुत अच्छी दवा है।
स्वास्थ्य
अच्छा बनने के लिये अपना स्वभाव, संस्कार, आदतें, सिद्धान्त, आदर्श, बुद्धि, और भावनाओं का परीक्षण करें।
चरित्र
अच्छे व्यक्तित्व को प्राप्त करने के लिये मन लगाकर पढ़ो, विवेक शक्ति विकसित करो, अपने सिद्धान्तों को स्पष्ट करो, विचारों पर काबू रखो।
चरित्र
विचारों के अनुसार व्यवहार होता है, कसरत से शरीर बनता है, अभ्यास से मन विकसित होता है, दृढ़ मनोबल से व्यक्तित्व बनता है तथा आत्मविश्वास के विना मनुष्य लङ्गड़ा है।
चरित्र
वास्तविक दुःख की अपेक्षा कल्पित दुःख बड़ा होता है और देर तक चलता है, जैसे परीक्षा तीन घण्टे में हो जाती है किन्तु चिन्ता साल भर होती है।
मन
अन्धकार में रास्ता बदल ने वाले को और अशान्ति में निर्णय लेने वाले को मञ्जिल नहीं मिलती है।
विवेक
आदर देना भी जीवन देने के समान है, आदर में बनावटीपना नहीं होना चाहिये।
विनम्रता
भलाई करना एक व्यापार है, जिसका फल ब्याज सहित अवश्य मिलता है।
दान
जो धर्म का विकास करता है, वह नर से नारायण बन जाता है, जो धर्म का विनाश करता है, वह नर से वानर बन जाता है।
धर्म
जीभ का घाव जल्दी भरता है पर जीभ से किया घाव कभी नहीं भरता है।
वाणी
स्वयं पर अनुशासन करो, समस्या आने पर समाधान की खोज करो, तनाव वाली स्थिति से दूर रहो।
संयम
प्रति दिन यदि थोड़ा भी धर्म, धन और श्रुत का सञ्चय किया जाये तो वह समुद्र से भी अधिक हो जायेगा।
पुरुषार्थ
शरीर को भोजन दो वेतन जैसा, आत्मा को भोजन दो चिन्तन जैसा, अधिक खाने से चर्बी बढ़ती है, बुद्धि नहीं।
आहार
मकान ममता का घर है और मन्दिर समता का घर है। साधर्मी में नख और मांस की तरह स्नेह होना चाहिये।
संगति
मनुष्यता, मुमुक्षुता, महापुरूष का सत्सङ्ग ये तीन बहुत दुर्लभ है। साधु सुलभ है पर साधुता दुर्लभ है।
संगति
भावुकता का भूत विना अनुभव के नहीं उतरता है।
विवेक
व्रती की चिन्ता गुरुओं को भी होती है, जटायु जब व्रती बना तो उसकी रक्षा का भार ऋद्धिधारी मुनिराज ने सीता को सौंपा था।
धर्म
अधिक बैठे रहने से, अधिक भोजन से, अधिक विषय सेवन से, मलमूत्र रोकने से, अधिक जागने से, अभक्ष्य भक्षण से रोगों की उत्पति होती है।
स्वास्थ्य
पुरूषार्थी वह है जो दुर्भाग्य की रेखाएँ मिटा दे।
पुरुषार्थ
चैसठ प्रहरी पीपल- बाजार में नहीं मिलता, पीपल को चैसठ पहर तक घोटते रहो, उसके एक-एक कण को कई बार घोटने के बाद चैसठ प्रहरी बनता है, उसका सेवन करने से हड्डी का बुखार निकल जाता है, इसी तरह एक-एक भावना को बार-बार घोटने पर संसार का रोग समाप्त हो जाता है।
ध्यान
वात्सल्य से कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी मोम की तरह कोमल हो जाता है।
संगति
'अर्ध रोग हरी निद्रा, सर्व रोग हरी क्षुधा' सोने से आधा रोग दूर होता है और भोजन करने से पूरा रोग दूर होता है।
स्वास्थ्य
जिसे संसार रैन बसेरा लगता है, उसे परिग्रह रखने की आवश्यकता नहीं होती है।
अनासक्ति
आसक्ति का राक्षस यदि नष्ट हो गया तो दुनियाँ तुम्हारी पूजा करेगी।
अनासक्ति
दान परिग्रह का प्रायश्चित्त है इसमें अभिमान करने की क्या बात है। मन भर चर्चा से कण भर आचरण श्रेष्ठ है।
दान
जिनवाणी बही खाता नहीं, आचरण का शास्त्र है। जैसे ब्याज 24 घन्टे चलता है, वैसे ही कर्म बन्ध भी 24 घण्टे होता है।
कर्म
सन्त और बालक वर्तमान में जीते हैं, बाकी सब भूत-भविष्य में जीते हैं इसलिये अध्यात्म से रीते हैं।
समय
जीवन का ध्येय सत्य की उपासना होना चाहिये सत्ता की लालसा नहीं।
सत्य
जैसे कमरे की सफाई दिन में तीन बार करते हैं, वैसे ही पश्चात्ताप से आत्मा की सफाई भी करना चाहिए।
संयम
आपसे त्याग नहीं बनता तो कोई बात नहीं, पर त्यागी की निन्दा तो मत करो।
वाणी
कोई कितना भी मूर्ख क्यों न हो कोशिश करने वाले को बुद्धिमान बनते देर नहीं लगती।
पुरुषार्थ