Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 23

समुद्र ने नहीं शराब ने लोगों को डुबोया।

86 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

चञ्चल मन से आठ घण्टे पढ़ने की अपेक्षा एकाग्र मन से दो घण्टे पढ़ना सार्थक है।
ज्ञान
ज्यादा न बोलें, विना मांगे सलाह न दें, ज्यादा टोका-टाकी न करें, व्यङ्ग भरी भाषा न बोलें तो झगड़े से बच सकते हैं।
वाणी
गुस्सा और तकरार से बिगड़ी बातें, प्रेम पूर्ण व्यवहार से सुधर जाती हैं, गुस्सा स्वर्ग को नरक बना देता है।
क्षमा
मरने के लिये चुटकी भर जहर काफी होता है और जीने के लिए स्वस्थ सन्तुलित आहार लेना जरूरी है।
स्वास्थ्य
चिन्ता जीवन की समस्या है, चिन्तन चिन्ता का समाधान है।
मन
व्यक्ति को मैत्री भाव सबसे रखना चाहिए पर मित्र का चयन पत्नि की तरह सावधानी से करना चाहिए।
संगति
बुढ़ापे में खाली बैठकर भुनभुनाने की अपेक्षा उत्साह पूर्वक कुछ गुनगुनाते रहना अच्छा है।
चरित्र
बालों को काला करके बुढ़ापे को ढाका तो जा सकता है पर बुढ़ापे से बचा नहीं जा सकता है।
समय
वृद्धों को भार समझने की अपेक्षा अपना भाग्य समझें, बूढ़ा वृक्ष फल दे या न दे पर सघन छाया तो देता ही है।
परिवार
रावण की बीस आँखें थी पर दृष्टि एक पर खराब थी, आज के मानव की दो आँखे हैं पर दृष्टि हजार पर खराब हैं, हमारी दुर्गति तो रावण से भी ज्यादा होगी।
ब्रह्मचर्य
दुराचारी कितने भी ऊँचे वंश का क्यों न हो सदा अनादर ही पाता है।
चरित्र
बुढ़ापे में सबसे बड़ी पीड़ा अपने अङ्गो के शिथिल होने की नहीं बल्कि सम्बन्ध शिथिल होने की होती है।
परिवार
स्पर्धा अपने विकास में होना चाहिये किसी के ह्रास में नहीं।
चरित्र
यदि शत्रु सता रहा हो तो भी विनम्रता मत छोड़ो, क्योंकि धनुष झुकता है तो बाण दूर तक जाता है।
विनम्रता
रत्नों में हीरा, वृक्षों में चन्दन, पशुओं में गाय, और धर्म में अहिंसा सर्वश्रेष्ठ है।
अहिंसा
चन्द्रमा रात में, सूर्य दिन में, पर साधु चैबीस घण्टे ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं।
ज्ञान
संकल्प लेना गाड़ी चालु करने जैसा है, चालु करने के बाद एक्सीलेटर दबाने से स्पीड बढ़ती है, इसी तरह विशुद्धि बढ़ाना ऐक्सीलेटर बढ़ाने की तरह है।
पुरुषार्थ
जो शरीर सुख में आसक्त है, वह आत्मा को ठगता है।
अनासक्ति
दीवाल बनाते हैं तो ऊपर की ओर जाते हैं, तोड़ते हैं तो नीचे की ओर आते है, इसी प्रकार संयम लेते हैं तो ऊपर के गुणस्थान में जाते है, संयम तोड़ते हैं तो नीचे के गुणस्थान में आते हैं।
संयम
जिनवाणी इशारा है, गुरू सहारा है, धर्म कार्य में जो वाद-विवाद करता है वह बर्बाद हो जाता है।
धर्म
सन्तोष स्वभाविक धन है, विलासता कृत्रिम दरिद्रता है सफलता संयोग से नहीं समर्पण से मिलती है।
संतोष
जहाँ आपका काम बोल रहा हो वहाँ आप न बोलें।
वाणी
कुछ प्रश्नों के उत्तर मौन से दिये जा सकते हैं।
वाणी
निर्णय एक बार, प्रयत्न बार-बार करना चाहिए।
पुरुषार्थ
विचारों की दरिद्रता हमें बेचारा बना देती है। अति खुशी के वक्त वायदा और अति गुस्से में कोई निर्णय न करें।
मन
हम रोते हैं कि हमारे पास जूते नहीं हैं, जरा उनके बारे में सोचो जिसके पास पैर ही नहीं हैं।
संतोष