Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 8

चारित्र-ज्ञान-श्रद्धान, ये ही मोक्ष प्रधान

230 सूत्र · पृष्ठ 3 / 4

सहज भाव से जीने वाला साधु ही स्वानुभूति का सही अनुभव कर पाता है। जिस साधु को देह से भी राग नहीं होता उसे नाम का भी राग नहीं होता है।
अनासक्ति
जो साधु श्री और स्त्री को महत्त्व देता है उसकी साधना समाप्त हो जाती है और लोकापवाद भी होता है।
अनासक्ति
आत्मसिद्धि के लिए कम बोलो, कम देखो और कम सुनो।
संयम
अज्ञानी इच्छा की पूर्ति होने से सुख मानता है और ज्ञानी इच्छा के अभाव को सुख मानता है।
संतोष
जब इन्द्रियों के भोग शान्त होने लगते हैं तब ज्ञान का सुख प्रारम्भ होता है।
ज्ञान
जीवन का निर्वाह पिता या गुरु के नाम पर नहीं होता, स्वयं के पुण्य-पाप से होता है, कोई किसी को सुखी-दुःखी नहीं करता, अपितु स्वयं का पुण्य-पाप सुखी-दुःखी करता है।
कर्म
अरहंत संसार पार नहीं लगाते, उनके प्रति आस्था पार लगाती है।
भक्ति
जब भी बुद्धि और श्रद्धा के बीच मतभेद होता है, तब श्रद्धा को महत्व देना चाहिए।
भक्ति
धर्म को समझने के लिए बुद्धि और आँखों की अपेक्षा श्रद्धा अधिक जरूरी है।
भक्ति
एकलव्य की आस्था थी तो पत्थर के गुरु से भी विद्या प्राप्त हो गयी थी।
भक्ति
दूसरे के घर से लाकर पत्नी को सब कुछ सौंप देते उसी प्रकार श्रद्धा रूपी पत्नी को सब कुछ देना पड़ेगा, तभी पूर्णानंद मिलेगा।
भक्ति
श्रद्धा अंक और ज्ञान चारित्र शून्य के समान हैं, अंक के बिना सारे शून्य बेकार है।
भक्ति
जो गृह में रहकर निमित्त-नैमित्तिक अनुष्ठान करता वही श्रावक कहलाता है।
धर्म
दूध की मीठी चम्मच बच्चे का मुख तो मीठा कर ही देती है दूध पियेगा तो पेट भरेगा, उसी प्रकार देशना के शब्द अन्दर गये तो कल्याण होगा ही बाहर रहे तो भी पुण्य बंध होगा ही एवं उतने समय पाप से बचेंगे।
धर्म
जिनवाणी विराजमान करने वाली चौकी पर बैठने से ज्ञानावरणीय कर्म का बंध होता है क्योंकि वह चौकी शास्त्र पीठ है, उसकी असादना जिनवाणी की असादना है।
ज्ञान
शिष्ट शिक्षा ही शिष्य को विशिष्ट बनाती है।
ज्ञान
जो आत्मा के स्वरूप की शुद्धि का घात करे उसका नाम अशुद्धि है।
धर्म
भावशुद्धि के लिए भोजन शुद्धि अनिवार्य है।
आहार
द्रव्य शुद्धि के बिना भावशुद्धि नहीं होती, कषायों के अभाव में भावशुद्धि होती है।
संयम
दुनिया आपको तब तक नहीं हरा सकती जब तक आप स्वयं हार नहीं मान लेते।
पुरुषार्थ
वह 'सुख' है जहाँ दुःख नहीं है, वह 'गति' है जहाँ से पुनः न आना पड़े, वह 'ज्ञान' है जहाँ अज्ञान न हो, इसलिए हे भाई! तू शाश्वत पद की भावना कर।
धर्म
धर्म धैर्य की अपेक्षा रखता है।
धर्म
एक छेद भी जहाज को डुबा देता है और एक पाप भी पापी को नष्ट कर देता है।
कर्म
जिसने अपने आप को जीत लिया वह अपने आपका बंधु है और जिसने अपने आपको नहीं जीता वह अपने आप का शत्रु है।
संयम
दूसरों के लिए रत्तीभर काम करने से भीतर की शक्ति जाग उठती है। दूसरों के लिए रत्तीभर सोचने से धीरे-धीरे हृदय में सिंह का बल आ जाता है।
दान
मेरी शक्ति दस लोगों के बराबर है क्योंकि मेरा हृदय पवित्र है।
चरित्र
नीच मनुष्य इस लोक के लिए ही कार्यारम्भ करता है, मध्यम श्रेणी का मनुष्य परलोक में फल पाने के लिए और विशिष्ट धर्म वाला उत्तम श्रेणी का मनुष्य पुनर्जन्म से मुक्ति के लिए ही कार्य करता है।
चरित्र
संसार में जो केवल भगवान् का ही भजन करते हैं वे बलवान हैं और जो किसी के द्वारा उद्विग्न नहीं किए जाते वे सन्त हैं।
भक्ति
महासागर पत्थर फेंकने से चंचल नहीं होता है उसी प्रकार जो साधक खिन्न हो जाये वह अभी थोड़े पानी में है।
संयम
साधना का लक्ष्य है–एक ओर तो वासनाओं का नाश करना और दूसरी ओर सद्वृत्तियों का विकास करना-वासनाओं के नष्ट होते ही हृदय दिव्य भावों से परिपूर्ण हो जायेगा और हृदय में दिव्य भावों के प्रवेश करते ही समस्त दुर्बलतायें भाग जाएंगी।
धर्म
अशुद्ध साधना का परिणाम अशुद्ध ही होता है।
धर्म
संसार में दुःख अनन्त है तथा सुख अत्यल्प है इसलिए दुःखों से घिरे सुखों पर दृष्टि नहीं लगानी चाहिए।
अनासक्ति
मौत को टाला नहीं जा सकता पर सुधारा अवश्य जा सकता है।
समाधि
हँसते हुए जीना एक कला है, हँसाते हुए जीना और भी बड़ी कला है पर हँसते हुए मरना सबसे बड़ी कला है।
समाधि
अपने हृदय में दया का अभाव हो तो अपने पूर्व कृत पुण्यों का फल भी प्राप्त नहीं होता है। तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ, पवित्र वस्तुओं में अति पवित्र वस्तु 'विशुद्ध हृदय' ही है।
अहिंसा
जो बड़ी कठिनता से मिलता है, बिजली की चमक की तरह चंचल है, ऐसे 'मनुष्य जन्म' को पाकर जो धर्म साधना में प्रमाद करता है, वह सज्जन नहीं दुष्ट एवं दूर भव्य है।
धर्म
उत्तम विचार और महान् चरित्र बल ही परम धन है।
चरित्र
जिस इन्द्रिय को संयमित करोगे उसमें ऋद्धि उत्पन्न हो जायेगी।
संयम
यदि पुत्र अच्छा हो तो सास-बहु क्यों लड़े ? यदि तवा भारी हो तो रोटी खराब क्यों हो? यदि सवार ठीक हो तो घोड़ा क्यों अड़े ? यदि नियत अच्छी हो तो व्यक्ति भूखा क्यों मरे?
चरित्र
यह दुर्भाग्य की बात है कि हम आत्मिक स्वतंत्रता खोकर सांसारिक सुखों को खरीदते हैं।
अनासक्ति
विद्वत्ता, विद्या और विद्वान् की कद्र विद्वान् ही करते हैं मूर्खों के बीच विद्वान् की दशा वैसी ही होती है जैसे अंधों के बीच किसी सुन्दरी की और नास्तिकों के बीच किसी धर्म ग्रन्थ की होती है। पुस्तकों के ज्ञान में तुम चतुर हो, फिर भी तुम्हें चाहिए कि तुम अनुभव जन्य ज्ञान प्राप्त करो और उसके अनुसार व्यवहार करो।
ज्ञान
अनुरक्त व्यक्ति जिस चीज की प्रशंसा करता है विरक्त व्यक्ति उसी की निंदा करता है और मध्यस्थ व्यक्ति उस सम्बन्ध में उदासीन रहता है।
अनासक्ति
राग-द्वेष की हानि से ही सारे गुण प्रकट हो जाते हैं।
अनासक्ति
वस्तु के प्राप्त न होने पर लोगों का उसमें अनुराग होता है तथा प्राप्त हो जाने पर वैराग्य होता है।
अनासक्ति
हेमन्त ऋतु में आग की कामना होती तथा ग्रीष्म में पुनः हिम की आवश्यकता होती है।
अनासक्ति
दुर्बल मनुष्य, मुनि और विषधर सर्प इन तीनों की दृष्टि अत्यन्त दुःसह होती है, इसलिए तुम इन्हें असंतुष्ट नहीं करना।
Misc.
वाक्शक्ति निःसन्देह एक बड़ा वरदान है क्योंकि वह अन्य वरदानों का अंश नहीं, अपितु स्वतंत्र वरदान है।
वाणी
कहना मुश्किल है कि राम और कृष्ण में कौन उन्नीस है और कौन बीस है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि स्वयं बृज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहाँ एक दूसरे को जय राम जी से नमस्ते करते हैं।
Misc.
धर्म का दान सारे दानों को जीत लेता है, धर्म रस सारे रसों को जीत लेता है, धर्म में प्रेम सब प्रेमों को जीत लेता है, तृष्णा का विनाश सारे दुःखों को जीत लेता है।
धर्म
भयंकर युद्ध में हजारों दुर्जय शत्रुओं को जीतने की अपेक्षा अपने मन को जीत लेना ही सबसे बड़ी विजय है।
मन
संसार में रहो परन्तु संसार अर्थात् राग-द्वेष को अपने अंदर न रहने दो यही विवेक का लक्षण है। विवेक वीरता का श्रेष्ठतर भाग है।
विवेक
मन को विश्राम देने का तरीका है मन के कार्य को बदलते रहना, सबसे अधिक विश्राम की सम्भावना निश्चल शांत वातावरण के अन्दर विद्यमान है।
मन
वृद्धावस्था से पूर्व मुझे भली प्रकार जीवित रहने की चिन्ता थी, वृद्धावस्था में भली प्रकार मरने की चिंता है।
समाधि
लक्ष्मी हिंडोले की तरह चंचल है। विषयों से उत्पन्न हुआ सुख अंततः दुःखप्रद है। देह विपत्ति का घर है। अत्यधिक धन मृत्यु का प्रचुर साधन है। संसार अत्यधिक शोकपूर्ण है। स्त्रियाँ अनर्थ की जड़ हैं। फिर भी लोग इस घोर संसार में ही रत रहते हैं। आत्मा में रत नहीं होते यह आश्चर्य है।
धन
भोग में रोग का भय है, कुल आचार में भ्रष्टता का भय है, धन में राजा का भय है, अभिमान में दीनता का भय है, सामर्थ्य में शत्रु का भय है, सौन्दर्य में वृद्धावस्था का भय है, शास्त्रज्ञान में तर्कशील विवादी का भय है, गुण में दुष्ट का भय है और शरीर में मौत का भय है, इस संसार में सभी वस्तुएँ भययुक्त हैं, वैराग्य ही अभय है।
अनासक्ति
व्यसन तो बहुत प्रकार के होते हैं परन्तु विद्याभ्यास और भगवत् सेवा ये दो व्यसन (आदतें) ही सच्चे व्यसन हैं।
चरित्र
'साधना' मात्र ही शक्ति की आराधना है।
धर्म
संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जो व्यक्ति युवावस्था में शान्त है, वही वास्तव में शान्त है। धातुओं के क्षीण हो जाने पर कौन शान्त नहीं हो जाता है ?
संयम
क्रोध से सब काम वैसे नहीं बनते, जैसे शान्ति से बनते हैं।
क्षमा