Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 8

चारित्र-ज्ञान-श्रद्धान, ये ही मोक्ष प्रधान

230 सूत्र · पृष्ठ 4 / 4

इच्छा पूर्ति में नहीं अपितु संयम में शान्ति मिलती है।
संयम
संसार का मूक शिक्षक 'श्मशान' क्या डरने का स्थान है? जीवन की नश्वरता के साथ ही सभी आत्माओं के उत्थान का ऐसा सुन्दर स्थल और कौन है ?
समाधि
सब कुछ अपने संकल्प द्वारा ही छोटा या बड़ा बन जाता है।
मन
इच्छा का मूल 'संकल्प' है। विधान, व्रत, यम, धर्म आदि संकल्प से ही होते हैं। संकल्प शक्ति तो मानसिक शक्तियों की शिरोमणि है।
मन
मनुष्य में शक्ति की कमी नहीं होती, संकल्प की कमी होती है।
पुरुषार्थ
मनुष्य के मन में संतोष प्राप्त होना स्वर्ग प्राप्ति से बढ़कर है।
संतोष
दरिद्र कौन? जिसे भारी तृष्णा है और धनवान कौन? जिसे पूर्ण सन्तोष है।
संतोष
क्या किसी को अपने मन के अनुसार सब सुख प्राप्त हो सकता है? जबकि सब कुछ भाग्य के अधीन है अतः सदा संतोष धारण करना चाहिए।
संतोष
संतोष रूपी अमृत से संतुष्ट मनुष्य के लिए सदा सुख शान्ति ही है।
संतोष
मनुष्य की संस्कृति क्या है? वह आत्म शोधन की, आत्मोद्धार की, अपने आपको मुक्त कराने की प्रक्रिया है।
धर्म
किसी भी संगठन में सम्मिलित होने का अर्थ है, अपने आप पर बंधन लगाना, अपनी स्वतंत्रता को सीमित करना।
Misc.
साधु पुरुष का हृदय समृद्धि में कोमल और आपत्ति के समय कठोर हो जाता है।
चरित्र
जो उपकारियों के प्रति सज्जन है, उसकी सज्जनता में क्या? जो अपकारियों के प्रति भी सज्जनता का व्यवहार करता है, सज्जन उसे ही साधु कहते हैं।
चरित्र
गुण का सच्चा मानदण्ड मन में स्थित है। जिनके सद्विचार हैं वे सत् पुरुष हैं।
चरित्र
जिससे प्राणियों का अत्यन्त हित होता हो वह वास्तव में असत्य सत्य है, इसके विपरीत जिससे किसी का अहित होता हो वो सत्य भी अधर्म है। धर्म की सूक्ष्मता देखो।
सत्य
झूठ से जो पाऊँगा वह पाना नहीं खोना है और सत्य से जो खोता है वह खोना नहीं पाना है।
सत्य
समय आये बिना वज्रपात होने पर भी मृत्यु नहीं होती है और समय आ जाने पर पुष्प भी प्राणी का प्राण हर लेता है।
समय
चित्त को वश में करने के लिए अध्यात्म विद्या का ज्ञान, सत्संगति, वासनाओं का भलीभाँति परित्याग तथा प्राणायाम ये प्रबल उपाय हैं।
मन
असावधानी विनाश को शीघ्र बुलाती है। सावधान रहो, जीवन महल के किसी भी दरवाजे से काम-क्रोध रूपी किसी भी चोर को अन्दर न घुसने दो और सावधानी के साथ जो पहले से घुसे बैठे हों, उन्हें दृढ़ता और शूरता के साथ निकालने की प्राणपन से चेष्टा करते रहो, सावधानी ही साधना है।
पुरुषार्थ
सौन्दर्य पवित्रता में रहता है और गुणों में चमकता है।
चरित्र
इन्द्रिय संयम न रखना आपत्तियों का मार्ग है और इन्द्रिय विजय सुखों का मार्ग है। दोनों में जो इष्ट हो वह करना चाहिए।
संयम
संत पुरुष के लिए एकान्त में रहकर विचार मात्र से भी सेवा कर सकना संभव है, ऐसा लाखों में एक कर सकता है।
ध्यान
सच्चे सौन्दर्य का रहस्य सच्ची सरलता है।
चरित्र
सौन्दर्य पर आधारित प्रेम सौन्दर्य की ही भाँति शीघ्र नष्ट हो जाता है।
अनासक्ति
मनुष्य स्वतंत्रता से सुख, शान्ति, परम तत्त्व एवं परमपद प्राप्त करता है। स्वयं अपने प्रति उत्तरदायी होना अर्थात् कर्त्तव्य करना ही स्वतंत्रता है।
धर्म
अपने कल्याण के इच्छुक व्यक्ति को स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिए।
संयम
क्रोध में किसी को कुछ बक दो तो अन्तःकरण की अदालत में स्वयं न्यायाधीश बनकर, स्वयं को खड़ा कर स्वयं को प्रायश्चित्त दो।
क्षमा
जीवन में और सब कुछ हो, सिर्फ मन की शान्ति न हो तो जीवन बेकार है।
मन
कोई कितना भी शुद्ध और उद्योगी क्यों न हो, लोग उस पर दोषारोपण कर ही देते हैं। अपने धार्मिक कार्यों में लगे हुए वनवासी मुनि के भी शत्रु, मित्र और उदासीन ये तीन पक्ष पैदा हो जाते हैं।
Misc.
पूजन, अध्ययन, दान, तप इन चार का तो कोई लौकिक प्रयोजन के लिए भी सेवन कर सकता है, परन्तु सत्य, क्षमा, दया, निर्लोभता ये चार तो जो सज्जन नहीं हैं उनमें रह ही नहीं सकते हैं।
चरित्र
जिसमें धर्म की रक्षा हो वही कार्य श्रेष्ठ मानना चाहिए।
धर्म
कामना, भय, लोभ अथवा जीवन रक्षा के लिए भी 'धर्म' का त्याग नहीं करना चाहिए, धर्म नित्य है जबकि सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है तथा बन्धन का हेतु अनित्य है।
धर्म
स्वदेश ही नहीं समूचे विश्व का व्यवहार जिसके बल पर सुचारू रूप से चलता है, उसे ही धर्म कहते हैं।
धर्म
किसी वस्तु को स्वीकार और किसी धर्म पर विश्वास उसके गुणों के आधार पर करो। स्वयं उसको परखो जाँचो उसका सूक्ष्म विश्लेषण करो।
विवेक
पृथ्वी पर खोटे स्थान भौमिक नरक हैं, खोटे भाव और उस सम्बन्धी यातनापूर्ण अवस्था मानसिक नरक है, माया-मोह में स्वरूप विस्मृति की अवस्था आध्यात्मिक नरक है।
मन
जीव का अपवित्र मन ही प्रधान नरक है एवं उसकी वेदना, चिन्ता और भय अशान्ति ही नारकीय यातना है।
मन
पराई स्त्री और पर धन जिसके मन को अपवित्र नहीं करते, गंगादि तीर्थ उसके चरण स्पर्श की अभिलाषा करते हैं।
ब्रह्मचर्य
पाप करने वाला मनुष्य अपने पाप को कह देने से, पश्चाताप करने से, तपस्या से, अध्ययन से और आपत्ति काल में दान देने से अपने पाप से मुक्त हो जाता है।
कर्म
मन से किया हुआ पाप ही पाप है, शरीर द्वारा किया हुआ नहीं क्योंकि जिस शरीर से पत्नि का आलिंगन करते हैं उसी शरीर से पुत्री का आलिंगन करते हैं भावों में अन्तर होता है।
मन
अन्य क्षेत्र में किया गया पाप पुण्य क्षेत्र में नष्ट हो जायेगा किन्तु पुण्य क्षेत्र में किया हुआ पाप तो वज्र लेप के समान स्थायी हो जायेगा अर्थात् उसका फल भोगना ही पड़ता है।
कर्म
अत्यन्त उत्कृष्ट पुण्य और पापों का फल तीन वर्षों में, तीन मास में तीन पक्षों में अथवा तीन दिन में यहीं मिल जाता है।
कर्म
प्रमाद से बढ़कर इस संसार में मनुष्यों के लिए दूसरी कोई मृत्यु नहीं। प्रमादी मनुष्य को सारे अर्थ सब ओर से त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं और ध्यान रहे आलस का अभाव अमर बनाने वाला है।
पुरुषार्थ
प्रसन्न चित्त रहने से मनुष्य के सब दुःख दूर हो जाते हैं, प्रसन्नचित्त वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है।
मन
प्रार्थना या भजन जीभ से नहीं हृदय से होता है इसलिए गूँगे, तोतले और मूर्ख भी प्रार्थना कर सकते हैं।
भक्ति
स्वार्थ के कारण विघटित हुए समाज के अनेक दल रूपी फूलों को गुलदस्ता बनाने के लिए प्रार्थना एक साधन है।
भक्ति
मानव को बंधन दूर करने के लिए आत्मा और अनात्मा का विवेक करना चाहिए। विवेक से स्वयं को सत्-चित्त-आनंद रूप जानकर आत्मा आनंदित हो जाता है। ''शुद्ध बुद्धि ही कामधेनु है।''
विवेक
बंधन दो प्रकार के होते हैं–पहला प्रेम का बंधन दूसरा द्वेष का बंधन।
अनासक्ति
धन बल नहीं है, साधुता एवं पवित्रता ही बल है।
चरित्र
यदि बुद्धि जीवी का समाज में कोई प्रकार्य है तो यह कि मानसिक आवेगों को सब प्रकार के प्रलोभन मिलने पर भी ठंडा रखें और पक्षपात रहित निर्णय बनाये रखें।
विवेक
जो मनुष्य निश्चय करके कार्य प्रारम्भ करता है, कार्य के मध्य में रुकता नहीं है, समय को नष्ट नहीं करता है और स्वयं के वश में रहता है, उसी को पंडित कहा जाता है।
पुरुषार्थ