Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 8

चारित्र-ज्ञान-श्रद्धान, ये ही मोक्ष प्रधान

230 सूत्र · पृष्ठ 2 / 4

स्वयं पर अनुशासन करने वाला तीन लोक पर शासन करता है।
संयम
वैराग्य को अहंकार कहाँ, अहंकारी को वैराग्य कहाँ?
अनासक्ति
अपनी हंस दृष्टि रखो, काग दृष्टि नहीं। कौआ मोती में भी मल को देखता है परन्तु हंस पानी में भी क्षीर को देखता है, ऐसे ही भेद विज्ञानी पुरुष मल के पिण्ड में लिप्त होने पर भी भगवान् आत्मा को ही देखता है।
विवेक
जब वैराग्य होता है तो एक लँगोटी भी भारभूत नजर आती है और रागी को चक्रवर्ती की विभूति में भी भार नहीं दिखता है।
अनासक्ति
संघ में स्वाध्याय गौण वैय्यावृत्ति प्रधान होती है क्योंकि वैय्यावृत्ति करने वाला उपगूहन, वात्सल्य, स्थितिकरण और निर्विचिकित्सा इन चार अंगों से मंडित होता है। यदि ये गुण नहीं है तो कोई वैय्यावृत्ति नहीं कर सकता, जो तीर्थंकर प्रकृति की सोलह कारण भावनाओं में से एक है।
धर्म
दीपक में जब तक स्नेह/तेल रहता है तब तक उसे जलना पड़ता है और जब स्नेह/तेल समाप्त हो जाता है तब वह निर्वाण को प्राप्त हो जाता है-बुझ जाता है, इसी प्रकार संसारी जीव स्नेह-प्रीति के कारण दुःखी होता है और प्रीति त्यागकर निर्वाण-मोक्ष को प्राप्त होता है। स्नेह रहित को इष्टवियोग और अनिष्ट संयोग से उत्पन्न दुःख नहीं होता।
अनासक्ति
आपने घी खाया, दूध पिया फिर भी सिर के बाल सफेद हो गये, आप अपने बालों को झड़ने से नहीं रोक पाये, तो फिर दूसरों को अपनी इच्छा से कैसे परिणमन करा सकते हो? जब निज देह का परिणमन अपने वश में नहीं है तो फिर पर का परिवर्तन कैसे कर सकते हो? क्योंकि कण-कण स्वतंत्र है।
अनासक्ति
शब्दों की सीमा है पर स्वभाव की सीमा नहीं है।
वाणी
जो रूप के पीछे स्वरूप को भूल जाता है वह लंकेश की तरह नरक जाता है।
अनासक्ति
राख होने से पहले राख होने वाले रूपों को देखना छोड़ दो। यदि रूपातीत होना है तो स्वरूप में लीन हो जाओ।
अनासक्ति
अगर आप को ३३ करोड़ देवी-देवताओं पर भरोसा है लेकिन स्वयं पर नहीं तो आपको मुक्ति नहीं मिल सकती है अतः स्वयं पर भरोसा रखें, अडिग रहें और मजबूत बनें।
पुरुषार्थ
जब आप स्वयं को नहीं बदल सकते, तो दूसरे को बदलने का प्रयास सार्थक नहीं होगा।
संयम
स्वाध्याय ही प्रगति का द्वार है।
ज्ञान
दृष्टि में अनेकान्त, वाणी में स्याद्वाद और चर्या में अहिंसा यही जैन दर्शन का मूल सिद्धान्त है।
धर्म
सेहत सबसे बड़ी सम्पत्ति है।
स्वास्थ्य
अनेकान्त की वैशाखी के सहारे व्यक्ति शान्ति की दिशा में प्रस्थान कर सकते हैं।
धर्म
सर्वज्ञ के स्तवन मात्र से सब रोग, सब भय और समस्त दुःखों की परम्परा नष्ट हो जाती है इसमें संशय नहीं है।
भक्ति
जो देव-शास्त्र-गुरु का भक्त है और संसार-शरीर-भोगों से विरक्त है वह सम्यग्दृष्टि है।
भक्ति
सम्यग्दृष्टि प्रभु के पास भिखारी नहीं भक्त बनकर जाता है।
भक्ति
जैसे दरिद्री व्यक्ति स्वर्ण/रत्न को देखकर उठाने के लिए दौड़ता है वैसे ही सम्यग्दृष्टि साधु/रत्नत्रयधारी को देखकर दौड़ पड़ता है।
भक्ति
सम्यग्दृष्टि अन्याय, अभक्ष्य और अनीति से दूर रहता है।
चरित्र
सम्यग्दृष्टि क्रम-क्रम से सप्त परम स्थानों को प्राप्त करता है– १. सज्जाति, २.सद्गृहस्थता, ३. मुनियों के व्रत, ४. सुरेन्द्र पद, ५. राज्य पद, ६. अरहंत पद, ७. सिद्ध पद।
धर्म
निःशंक हुए बिना निःसंग नहीं हुआ जा सकता है।
धर्म
उपगूहन अंग जिसके पास नहीं वह सम्यग्दृष्टि तो दूर भद्र परिणामी मिथ्यादृष्टि भी नहीं है। साधक की निर्मल साधना ही सच्ची प्रभावना है।
धर्म
असाता कर्म को साता में बदलने का एक मात्र उपाय वीतराग देव, शास्त्र, गुरु की शरण है।
कर्म
जिससे तत्त्व का बोध हो, चित्त का निरोध हो, आत्मा का शोध हो, हित की प्राप्ति अहित का निषेध भी हो उसको जिनशासन में सम्यग्ज्ञान कहा है।
ज्ञान
सम्मान पाने के लिए सम्मान देना जरूरी है।
विनम्रता
जो तीन लोक के नाथ के सामने, गुरु के सामने 'सम्मान' करवाता है वह सम्माननीय नहीं हो सकता है। जिस जगह खड़े होकर निर्वस्त्र होने के भाव होने चाहिए थे, उस जगह शाल ओढ़ रहा है, जिस भूमि पर बैठकर माला फेरने के भाव होने चाहिए थे, वहाँ पर माला पहन रहा है इसका तात्पर्य अभी भव-भ्रमण की माला बाकी है। जिन्होंने मान और मालायें छोड़ी हैं, उनके चरणों में भवसागर तिरने आना था वहाँ सम्मान कराने लगे हैं। अरे जब तक भव (शरीर) का सम्मान चलता रहेगा तब तक भवातीत नहीं हो सकते हैं। कहते हो आज अष्टमी को हरी का त्याग है और उन्हीं पुष्पों की जिसमें करोड़ों कीड़े भरे हैं, उनकी माला पहन रहे हो, भले ही प्लास्टिक के फूलों की हो, ध्यान रखना जब पाषाण के परमात्मा की वंदना करने से निर्बन्ध हो सकते हो, तो फिर फूलों के नाम पर प्लास्टिक के फूलों की माला पहनने से कर्म बंध क्यों नहीं होगा? क्योंकि संकल्प तो पुष्प माला का ही किया है।
विनम्रता
यदि आपने अपने अपमान के कारण धर्म छोड़ा तो भूल होगी क्योंकि अपमान द्रव्य का नहीं पर्याय का हुआ है अर्थात् आत्मा का नहीं शरीर का हुआ है।
धर्म
छोटे-छोटे संकल्प ही आत्मशक्ति को बढ़ाते हैं। संकल्प सर्वश्रेष्ठ शक्ति है।
पुरुषार्थ
असत्य आत्मा को खा जाता है और सत्य आत्मा को पुष्ट करता है।
सत्य
अशुभ से निवृत्ति शुभ में प्रवृत्ति का नाम संयम है।
संयम
वैराग्य और ज्ञान के अभाव में संयम निधि लुट जाती है।
संयम
जिसे संयम में आनंद आने लगता है, उसे सुलभ से सुलभ इन्द्रिय भोग रुचिकर नहीं लगते हैं।
संयम
संयम जीवन रूपी गाड़ी का ब्रेक है।
संयम
सबसे सरल संयम यह है कि दूसरों के बारे में अशुभ सोचना छोड़ दो।
संयम
संयम का अर्थ पराधीनता नहीं स्वयं का स्वयं पर अनुशासन है, जिसने स्वयं पर शासन नहीं किया वह दूसरे पर शासन कैसे कर सकता है, यदि करता है तो हँसी का पात्र होता है।
संयम
संयम से ज्ञान के क्षयोपशम में वृद्धि होती है।
संयम
जो विषमता के आने पर समता की छतरी ओढ़ लेता है वह कर्मों के जल से भीग नहीं पाता है।
संयम
समाधि की साधना जीवन भर चलती है।
समाधि
समतापूर्वक देह का त्याग करना ही समाधि है। समाधि का सबसे बड़ा शत्रु राग है।
समाधि
शरीर और कषाय को कृश करने का नाम समाधि है, यदि शरीर को सुखा डाला किन्तु कषाय नहीं सूखी तो समाधि नहीं होगी।
समाधि
स्वाध्याय का फल संयम और संयम का फल समाधि है।
समाधि
निन्दा, गर्हा, आलोचना किए बिना, प्रायश्चित्त लिए बिना समाधि मरण नहीं हो सकता क्योंकि अन्दर दोषों की शल्य बैठी है, परिणामों की शुद्धि के अभाव में समाधि होती ही नहीं है।
समाधि
जो साधक रत्नत्रय की निर्मल आराधना करता है उसकी सम्यक् समाधि होती है।
समाधि
सहजता संयम की सीढ़ी है और समाधि संयम का शिखर है।
समाधि
सम्बन्ध से संकल्प-विकल्प होते हैं जिससे अनेक प्रकार के कर्मों का बंध होता है, जिससे संसार में परिभ्रमण होता है अतः सम्बन्ध बनाने से बचें।
अनासक्ति
सुख से जीना है तो अपने पुण्य के अनुसार आचरण करो, अन्यथा दुःख मिलना प्रारम्भ हो जायेगा। हीन भावना के कारण संक्लेशता बढ़ती है।
कर्म
संसार के उच्छेद का कारण रत्नत्रय की आराधना ही है।
धर्म
संसार कषायों को कृश करने से समाप्त होता है।
संयम
पंच परावर्तन से बचना है तो पंच परमेष्ठी को भजो पाँचों पापों को तजो।
णमोकार
संसार में सिर्फ दो को देखो जिनदेव को या फिर, निजदेव को।
भक्ति
संतोष रहित मनुष्य को चक्रवर्ती, नारायण और बलभद्र की विभूति से भी तृप्ति नहीं होती है। शान्ति से बढ़कर कोई तप नहीं, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं, लालच से बढ़ा कोई रोग नहीं और दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं हैं।
संतोष
जिसके हाथों में जिनवाणी हो, पास में दिगम्बर गुरु हों और मन में जिनेन्द्र प्रभु हो तो उसके पास सब कुछ है ऐसा समझना चाहिए।
भक्ति
सद्भावना में शक्ति है, जो सोचता है कि मैं दूसरों के काम आ सकने के लिए कुछ करूँ, वही आत्मोन्नति का सच्चा पथिक है।
चरित्र
जो मन से संचालित नहीं अपितु अपने विचारों द्वारा मन को चलाता है, उसे 'मनीषी' एवं ऐसी प्रज्ञा को 'मनीषा' कहा जाता है।
मन
आगम के अनुसार चल न पाना कमजोरी है पर बोल भी न पाना अच्छा नहीं है।
ज्ञान
समर्पण का अर्थ पूर्णरूपेण प्रभु गुरु को हृदय से स्वीकार करना, उनकी इच्छा, प्रेरणाओं के प्रति सदैव जागृत रहना और जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे परिणत करते रहना है।
भक्ति
दुनिया से मौन लेकर निज में चर्या करने का नाम सामायिक है।
ध्यान
साधक की दृष्टि प्रतिक्षण कषायों को घटाने की रहती है।
संयम