Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 67

मैं जो बंधन में पड़ा- इसका दोषी कौन?

117 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

विशुद्ध परिणामी नियम से संयम धारण करता है।
संयम
दुर्जनों पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि अग्नि मलयगिरि चन्दन को भी जलाती है।
संगति
दूसरों की बातें सुनकर अपनी विशुद्धि को मत खोओ।
संयम
ये अत्यन्त स्नेही है, ऐसा समझकर क्षुद्र मनुष्यों में विश्वास मत करो क्योंकि सरसों का स्नेह तेल भी आँसू गिरा देता है।
संगति
स्त्रियों का, नदियों का, राजकुल का, सर्प का, सींग वाले प्राणियों का, बड़े-बड़े नख वाले जीवों का, शस्त्र धारण करने वाले का, समान बल वाले का और शत्रु का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
विवेक
यह आयु 'वायु' के समान है, भोग मेघ के समान हैं, इष्टजनों का संयोग नष्ट हो जाने वाला है, शरीर पापों का घर है और विभूतियाँ बिजलीवत् चंचल हैं।
अनासक्ति
स्त्री का चारित्र और पुरुष का भाग्य किसी के द्वारा नहीं जाना जाता है।
Misc.
जीव तब तक ही सुखी रहता है जब तक स्नेह नहीं करता, स्नेह रूपी बंधन से बद्ध जीव को तो पद-पद पर दुःख ही होता है।
अनासक्ति
जहाँ स्नेह है वहाँ दुःख है, जीव मन को प्रिय लगने वाले जितने सम्बन्ध बनाता है उसके हृदय में उतनी ही शोक रूपी कीले गड़ जाती हैं।
अनासक्ति
विकास के लिए स्वतंत्रता प्रथम सोपान है।
समृद्धि
हम मरने के बाद स्वर्ग जाएँ, यह महत्त्वपूर्ण नहीं, पर मरने के पहले स्वर्ग बना जाएँ यह महत्त्वपूर्ण है।
धर्म
किसी का सरल स्वभाव उसकी कमजोरी नहीं होता संसार में पानी से सरल कुछ भी नहीं होता किन्तु उसका तेज बहाव बड़ी-बड़ी चट्टान के टुकड़े कर देता है।
विनम्रता
जो मिठास गन्ने और शक्कर में नहीं होती वह स्वभाव में होती है।
चरित्र
अच्छा महसूस करो क्योंकि क्षमता का स्रोत स्वयं में है।
मन
यदि भाव अच्छे हैं तो सदैव भाव मंगल आपके पास है और यदि भाव बुरे हैं तो मांगलिक द्रव्य, क्षेत्र, काल कुछ नहीं कर लेंगे। राजा श्रेणिक के भाव बुरे हुए तो यशोधर मुनिराज के गले में मरा सर्प डाला और नरक गति का बंध किया और जब भाव मंगल हुए तो उन्हीं से क्षमा माँगने लगा, मन में सोचने लगा अपनी गर्दन काटकर इनके चरणों में चढ़ा दूँ तब प्रायश्चित्त होगा, लेकिन उन्हीं मुनिराज के समझाने से मोक्षपुरी का रास्ता मिल गया, वही मुनिराज मंगल भूत हो गये, भाव परिवर्तन से भव परिवर्तन रुक गया।
कर्म
अविवेकी प्राणी धन के कमाने में तन को खराब कर लेता है फिर तन को सही करने के लिए धन को नष्ट कर देता है और मरते दम तक धन का सुख नहीं ले पाता है कभी अस्पताल में जाकर मरीज को देखना जो डॉक्टर से कहता है जितना पैसा चाहिए हो ले लो पर कुछ क्षण का जीवन बचा लो जबकि उसने पूरी पर्याय की कीमत ही नहीं की, अधिकतर समय गप्पों में, पेपर पढ़ने में, टी.व्ही. देखने में, बोलने में खो दिया, पूछा तो कहा समय पास कर रहे हैं।
समय
काँच को आइना बनाने के लिए उसके पीछे 'पारा' चढ़ाया जाता है, तभी तो जिसको आइना दिखाओ उसी का पारा चढ़ जाता है।
क्षमा
जैसे नदी बांधों से बँध जाती है तो सागर से नहीं मिल पाती है, वैसे ही नर किसी नारी से बंध जाता है तो सिद्धों से नहीं मिल पाता है। संयोग बाँध देता है और बँधा जीव परतंत्र होता है और परतंत्रता ही सबसे बड़ा दुःख है, अतः निर्बन्ध हो, स्वतंत्र हो, समुद्र बनो, सिद्धों से मिलो।
अनासक्ति
संसार स्वार्थ का है। जब तक पुण्य है, तब तक सब आपके साथ हैं, जैसे ही पुण्य क्षीण हुआ कि क्षणभर में सब छोड़कर चले जायेंगे। नारायण श्रीकृष्ण के वंश को देखो, जिसके यहाँ एक भाई तीर्थंकर हो, एक भाई बलभद्र हो, कामदेव हो, क्या वैभव होगा? क्या आनंद होगा? फिर भी उस क्षण को देखो जब द्वारिका जल रही होगी, वह क्षण कैसा होगा? कौन किसे बचा पाया?
अनासक्ति
इस संसार में मोह के समान कोई शत्रु नहीं, क्रोध के समान कोई अग्नि नहीं, ज्ञान के समान कोई सुख नहीं और काम के समान कोई व्याधि नहीं है।
अनासक्ति
संसार रूपी कटु वृक्ष के केवल दो फल ही अमृत के समान हैं, पहला सुभाषितों का रसास्वाद और दूसरा अच्छे लोगों की संगति।
संगति
इस संसार में प्यार करने लायक दो वस्तुएँ हैं, एक दुःख और दूसरा श्रम। दुःख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता है।
पुरुषार्थ
इन चार संज्ञाओं की तो सीमा है ये तो शरीर के कमजोर होने पर शान्त हो जायेंगी, पर नाम की संज्ञा इतनी खोटी है कि अंतिम श्वासों तक सताती है कि मेरा नाम हो जाये। इस जीव ने नाम के लिए जितना किया, उसका सौवाँ अंश भी धर्म के लिए किया होता तो नाम हो ही जाता और कर्मातीत हो जाता।
अनासक्ति
जिन्दगी के पाँच सच—१. माँ के सिवा कोई वफादार नहीं। २. गरीब का कोई मित्र नहीं। ३. लोग अच्छी सीरत (स्वास्थ्य) को नहीं अच्छी सूरत को महत्त्व देते हैं। ४. इज्जत सिर्फ पैसे की है इंसान की नहीं। ५. इंसान जिस व्यक्ति को दिल से चाहता है वो ही व्यक्ति दुःख देता है।
परिवार
जिन्दगी का सच एक ये भी है—एक गरीब रोज सुबह जल्दी निकलता है पेट भरने के लिए और एक अमीर आदमी रोज सुबह घर से जल्दी निकलता है पेट कम करने के लिए।
संतोष
पहले का रावण बोल रहा है—क्या मेरे बाद किसी ने कोई घोर अपराध नहीं किया इस सारी पृथ्वी पर? हजारों रावण खुलेआम घूम रहें हैं फिर बार-बार कब तक मेरा पुतला जलाते रहोगे?
चरित्र
दूसरों को जानना बुद्धिमानी है स्वयं को जानना सच्ची बुद्धिमानी है। दूसरों पर राज करना ताकत है, स्वयं पर राज करना सच्ची ताकत हैं।
संयम
दान गरीबी को खत्म करता है, अच्छा आचरण दुःख को मिटाता है, विवेक अज्ञान को मिटाता है, जानकारी डर खत्म करती है।
दान
इंसान और बकरे की आदत एक जैसी होती है, दोनों ही मरते दम तक, मैं-मैं करने से नहीं हटते हैं।
विनम्रता
कभी भी सफलताओं को दिमाग में और असफलता को दिल में जगह नहीं देना चाहिए, क्योंकि सफलता दिमाग में घमंड और असफलता दिल में हीनता पैदा करती है।
समृद्धि
आपका सम्मान उन शब्दों में नहीं जो आपकी उपस्थिति में कहे गये बल्कि उन शब्दों में है जो आपकी अनुपस्थिति में कहे गये हैं।
चरित्र
इंसान जीवन में दो चेहरे कभी नहीं भूलता—१. जो कष्ट के समय साथ दे, २. जो कष्ट के समय पर साथ छोड़ दे।
संगति
मुख का आभूषण प्रियवचन, वक्षस्थल का प्रेम, नेत्रों का जिनदर्शन, हाथों का पात्रदान, पैरों का आभूषण तीर्थ वंदना हैं, साधु का आभूषण समता है।
चरित्र
जो विनम्र है और नित्य ही ज्ञान, तप आदि से वृद्धों की सेवा करता है। उसके चार चीजों की वृद्धि होती है आयु, विद्या, यश और बल।
विनम्रता
संसार में वीतराग जैसा देव नहीं, निर्ग्रन्थ जैसा गुरु नहीं, अहिंसा जैसा धर्म नहीं, णमोकार जैसा मंत्र नहीं, अभय जैसा दान नहीं, सत्य जैस तप नहीं, ब्रह्मचर्य जैसा व्रत नहीं और संतोष जैसा सुख नहीं है।
धर्म
गरीबी को दान से हटाएँ, पुराने कपड़े स्वच्छ रखें, कुरूपता अच्छे व्यवहार से हटायें।
दान
आपको यदि देने में खुशी होती है तो आपको कोई उदास नहीं कर सकता है और यदि आपको सिर्फ लेने में खुशी होती है तो आपको कोई हमेशा खुश नहीं रख सकता है।
दान
सुखी जीवन की तीन बातें—अतीत की चिंता मत करो, भविष्य पर विश्वास मत करो और वर्तमान को व्यर्थ मत जाने दो।
संतोष
तीन को कभी नहीं भूलना—१. मुसीबत में मदद करने वाले को २. मुसीबत में साथ छोड़ने वाले को, ३. मुसीबत में डालने वाले को।
संगति
चार का गौरव न करो—ज्ञान देकर, दान देकर, सम्मान देकर, अपने को बेदाग रखकर।
विनम्रता
देशाटन, पण्डित जनों के साथ मित्रता, उत्तम स्त्री, राज सभा में प्रवेश और अनुकूल अनेक शास्त्रों का अवलोकन ये पाँच चतुराई प्राप्त करने के मूल कारण हैं।
ज्ञान
सुखी रहने के ६ सूत्र—यदि पूजा कर रहे हो तो विश्वास करना सीखो, बोलने से पहले सुनना सीखों, खर्च करना है तो कमाना सीखो, अगर लिखना है तो सोचना सीखो, हार मानने से पहले फिर से कोशिश करना सीखों, मरने से पहले खुलकर जीना सीखों।
संतोष
विद्या के समान नेत्र नहीं, सत्य के समान तप नहीं, राग के समान दुःख नहीं, त्याग के समान सुख नहीं, चिन्ता के समान संताप नहीं, शान्ति के समान आनंद नहीं, तृष्णा के समान रोग नहीं, संतोष के समान सुख नहीं।
संतोष
सफलता के तीन मंत्र—दूसरों से ज्यादा जानकारी प्राप्त करें, दूसरों से ज्यादा मेहनत करें, दूसरों की अपेक्षा कई गुना कम उम्मीद करें।
समृद्धि
दुनिया की हर वस्तु ठोकर लगने से टूट जाती है परन्तु एक 'सफलता' ही है जो ठोकरें खाकर मिलती है।
समृद्धि
असफलता के कारण—योजना का अभाव, अनुभव का अभाव, अनुशासन का अभाव, उत्साह की कमी, आत्म विश्वास की हीनता, नकारात्मक सोच, अनुत्साह प्रवृत्ति, विपरीत संगति, अनेकों से शत्रुता, अपनों के प्रति द्रोह, अवसर पर चूक, ईर्ष्यालु स्वभाव, पुरुषार्थ और भाग्य की हीनता, रीति-नीति की अनभिज्ञता, समय सूचकता का अभाव, दूसरों को दोष देने की आदत इत्यादि।
समृद्धि
सफलता के सूत्र—व्यवहार कुशलता, मिलनसार प्रवृत्ति, मधुरवाणी, विनयशीलता, प्रसन्न मुद्रा, समय की पकड़, क्षमाशीलता, लक्ष्य निर्धारण, आशावादी सोच, स्वयं को प्रोत्साहित करने की प्रवृत्ति, उपकारियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करें, प्रशंसकों को पूँजी की तरह आदर दें, किसी की निंदा न करें, सबका सहयोग लेने की कला, प्रबल पुरुषार्थ करें, सही योजना बनायें, धैर्य रखें, बुद्धि का सही उपयोग करें, रीति-नीति से काम लें, आत्म विश्वास से भर जायें, अशुभ विचारों की उपेक्षा करें इत्यादि।
समृद्धि
यात्रा पर निकला हूँ लोग बार-बार पूछते हैं, कितना चलोगे, कहाँ तक जाना है? मैं मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता हूँ किससे कहूँ मुझे इस बार जाना नहीं, अपितु अपने तक आना है।
ध्यान
साधु के नाम में भी सागर जुड़ा है अतः कभी अपनी मर्यादा नहीं खोना, जैसे सागर अपने अंदर के कचरे को किनारे पर फेंक देता है किन्तु अपने अन्दर के मोती को पास में रखता है वैसे ही आप भी अपने अंदर के विषय-कषाय को किनारे कर देना पर अपनी विशेषताओं को अपने मुँह से कहकर बाहर मत फेंकना।
विनम्रता
जितने ऊँचे पद पर पहुँच जाओ, उतना सँभल कर रहना पढ़ता है, ऊँचे भवनों पर सँभल कर चढ़ना क्योंकि जितने ऊँचे से गिरोगे उतनी ज्यादा चोट आयेगी, ऐसे ही जब प्रसिद्धि बढ़ने लग जाये तो सावधानी का जीवन जीना प्रारम्भ कर देना क्योंकि फिसलने के अवसर बढ़ जाते हैं।
विनम्रता
इतिहास कहता है कि कल सुख था, विज्ञान कहता है कि कल सुख होगा, लेकिन धर्म कहता है कि अगर मन सच्चा और दिल अच्छा है तो हर रोज सुख है।
धर्म
'सुख' आपको उतना मिलेगा जितना आपने पुण्य किया है, लेकिन शान्ति उतनी मिलेगी जितनी आप की घर वाली चाहेगी।
परिवार
सपेरे के शब्द सुन कालिया नाग निर्विष हो नाचने लगता है तब गुरु/प्रभु के शब्द सुन मिथ्यात्व क्यों दूर नहीं हो सकता है।
भक्ति
संसार में रहना चाहते हो तो माँ बनकर रहना और संसार से दूर होना चाहते हो तो महात्मा बनकर रहना सीख लो, बस क्षमा आपके रोम-रोम में बस जायेगी, जिससे जीवन स्वर्ग बन जायेगा, मन में कुछ भी आये उसे वचन से बोलना मत तो सारी दूरियाँ समाप्त हो जायेगी।
क्षमा
कोई भी क्षेत्र मंगल अमंगल नहीं होता, अतः किसी भी क्षेत्र को दोष मत दो जिस क्षेत्र में किसी को मंगल होता है उसी क्षेत्र में किसी को अमंगल होता है, हस्तिनापुर में पाण्डवों को विजयश्री मिली उन्हें मंगलभूमि रही और कौरवों के लिए अमंगल रही, पुण्यात्मा के लिए प्रत्येक क्षेत्र मंगल है।
कर्म
कोई भी काल अमंगल नहीं होता, जिस काल कहीं मंगलाचरण होता है उसी काल में कहीं शोक छाया होता है इसलिए यदि आपका पुण्य है तो प्रति क्षण मंगल है और पुण्यहीन को प्रतिक्षण अमंगल है।
कर्म
मृत्यु और मोक्ष में अन्तर—सांस खत्म हो जाये और तमन्ना बाकी रह जाये तो 'मृत्यु' और सांस बाकी रहे और तमन्ना समाप्त हो जाये तो 'मोक्ष'।
समाधि
कुछ वृक्षों में काँटे होते हैं, जो कहते हैं संभलकर चलो, तो कुछ घड़ियों में भी कांटे होते है जो कहते हैं समय पर चलो।
समय
कोई अच्छा 'इंजीनियर' मिले तो बताना मुझे इंसान को इंसान से जोड़ने वाला पुल बनवाना है, बहते आँसुओं को रोकने वाला बांध बनवाना है और सच्चे सम्बन्धों में पड़ती दरारों को भरवाना है।
परिवार
मुस्कुराकर देखो तो सारा संसार रंगीन नजर आता है वर्ना भींगी पलकों से तो आइना भी धुँधला नजर आता है।
मन