Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 67

मैं जो बंधन में पड़ा- इसका दोषी कौन?

117 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

भीड़ में समाधि नहीं होती, समाधि में भीड़ हो सकती है।
ध्यान
समाधि के समय कोई साधक से पूछता है कि किसी से मिलना है क्या? वह कहता है सबको जाने दो मुझे जिससे मिलना था वो मिल चुका है। ''सम्बन्धों में ही बंध है सम्बन्धों में ही कष्ट है।''
समाधि
सम्बन्ध व्यक्ति को छोटा बना देते हैं, जबकि स्वभाव विराट बनाता है।
अनासक्ति
लोग अब व्यवहारिक नहीं व्यवसायिक हो गये हैं अतः सम्बन्ध उनसे ही मधुर होते हैं जिनसे 'मुनाफा' ज्यादा मिलता है।
परिवार
'मैं' में आनंद है 'मेरे' में दुःख और तनाव है।
अनासक्ति
एक सिक्का हो तो आवाज नहीं आती जैसे ही दो हुए कि ऐसे ही घर में दो हुए कि महाभारत शुरू हो जाती है।
परिवार
संयोग के वियोग में आँसू गिराने पड़ते हैं।
अनासक्ति
खोटे भाव रखने वाले का मरण बिगड़ जाता है, जिससे भविष्य में दुःख ही दुःख भोगना पड़ता है, अतः हमेशा अच्छे भाव रखने से अच्छे भव मिलते हैं।
कर्म
संसार में सभी जीवों को शरीर की अपेक्षा मानसिक संताप अधिक होता है जो सही ज्ञान प्राप्त करने से खत्म हो जाता है।
मन
जो संसार पर राज्य करता है वह संसार में भटकता है और जो स्वयं पर राज्य करता है वह सिद्धालय में बसता है।
संयम
संसार में कोई भी द्रव्य नया नहीं है, प्रत्येक को अनंतों बार अपना शरीर बनाया है, प्रत्येक का अनंतों बार भोग उपभोग किया है।
अनासक्ति
जो जीते जी छोड़ देते हैं वे साधु और जो जोड़-जोड़ कर मर जाते हैं, वे संसारी होते हैं।
अनासक्ति
जगत् के लोग कहते हैं कि शत्रु को शत्रु की भाँति देखो, पर जैन संस्कृति कहती है कि शत्रु को भी मित्र की भाँति देखो।
अहिंसा
सभ्यता का स्वरूप-सादगी, अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिए उदारता।
चरित्र
भूल होना 'प्रकृति' है मान लेना 'संस्कृति' है सुधार लेना 'प्रगति' है।
विनम्रता
अगर आप यह मान लेते हैं कि आपके पास पर्याप्त है तो आप सच्चे धनवान हैं।
संतोष
जो संन्यासी नहीं होते हुए भी संन्यासी का वेश धारण कर अपनी आजीविका चलाता है, वह वास्तविक संन्यासी के पाप को प्राप्त होता है और मरकर तिर्यंच योनि में जन्म लेता है।
चरित्र
चारों गतियों में भ्रमण कराने वाली आहार, भय, मैथुन और परिग्रह ये चारों संज्ञाएँ हैं।
अनासक्ति
यह सच है कि अनाथाश्रम में बच्चे गरीबों के मिलते हैं और वृद्धाश्रम में बुजुर्ग अमीरों के मिलते हैं।
परिवार
पहले हर अच्छी बात का मजाक बनता है, फिर विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है।
चरित्र
एक बनो, नेक बनो, जुड़ गये तो शेर भी घबरायेगा, टूट गये तो गीदड़ भी डरायेगा।
संगति
बचपन में घड़ी नहीं थी पर समय था, आज घड़ी है पर समय नहीं है।
समय
माता-पिता, गुरु, अधिकारी और मूर्ख से विवाद न करें।
विनम्रता
ईमानदारी से पेट भर सकता है पेटी नहीं, शुद्ध छने जल से बर्तन भर सकता है समुद्र नहीं।
चरित्र
जीवन में छोटी-छोटी बातों से आनंद लेना चाहिए क्योंकि बड़ी-बड़ी बातें तो कुछ ही होती हैं।
संतोष
जो शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता में राजी नाराज होता है, वह हड्डी-मांस का भक्त है भगवान् का नहीं।
अनासक्ति
उत्तम विद्या से युक्त के लिए विदेश क्या है? मधुरभाषी को पराया कौन है?
ज्ञान
जिस जीव के अशुभ दिन आने होते हैं उसके अशुभ विचार और आचरण में हीनता हो जाती है।
कर्म
शांत, सरल स्वभावी का सब अनुसरण करते हैं।
चरित्र
पानी का रस शीतलता है, भोजन का रस आदर पूर्वक भोजन कराने में है, बन्धु का रस अनुकूलता है और मित्र का रस निश्छल प्रवृत्ति करना है।
संगति
धैर्य ही सब प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला है।
संयम
जहाँ व्यक्ति की आहार, मैथुन, परिग्रह संज्ञा की पूर्ति होती है वह स्थान व्यक्ति को प्रिय लगता है।
अनासक्ति
जंगल में रहकर महलों की चाह की अपेक्षा महलों में रहकर जंगल का चिंतन भी अच्छा है।
अनासक्ति
उतनी विषयों के सेवन में सुखानुभूति नहीं होती, जितनी विषयों की कल्पना करने में सुखानुभूति होती है।
अनासक्ति
सँभल के रहना पाप का उदय आते देर नहीं लगती, बुझते दीपक की लौ भी अंत समय तेज हो जाती है, यदि कोई गलत काम करने के बाद भी बढ़ता नजर आता है तो समझ लेना कि बुझने के दिन आ रहे हैं जैसे मरने के कुछ समय पहले प्राणी स्वस्थ हो जाता है।
कर्म
धर्म में बुद्धि रहे अधिक पढ़ने से क्या? जीवों पर दया रहे अधिक दानों से क्या? मन शान्त रहे असंतुष्ट रहने वाले कुपुरुषों से क्या प्रयोजन है?
धर्म
कार्य को सफल करने के लिए संकल्प आवश्यक है।
पुरुषार्थ
तीन चीजें जीवन के सबसे बड़े खजाने हैं—१. जीवन में सरलता, २. संघर्ष और कठिन समय में धैर्य, ३. दूसरों के प्रति सहानुभूति।
चरित्र
स्वार्थ, निद्रा और बुरी संगत से बचो।
संगति
तीन सबसे बड़ी उपाधि—१. शहीद, २. वीर, ३. संत।
चरित्र
चार अंधे कामांध, क्रोधान्ध, लोभान्ध, मदान्ध।
अनासक्ति
अधिक हँसना मूर्खता है।
संयम
सदाचारी व्यक्ति सर्वत्र विश्वास का पात्र होता है।
चरित्र
सम्पत्ति छल-कपट से नहीं लाभान्तराय के क्षयोपशम से मिलती है।
धन
समझदार की जुबान रक्षक और नासमझ की जुबान फाँसी बन जाती है।
वाणी
सफलता के लिए बड़ों का सम्मान करो, छोटो को स्नेह करो, ईश्वर के प्रति पूर्ण कृतज्ञ रहो और मेहनत व ईमानदारी से काम करो।
समृद्धि
जीवन में असली सफलता हम तभी हासिल कर सकते हैं जब हम दूसरों को सफल होने में मदद करना सीख लेते हैं।
समृद्धि
योग, उपयोग, संयोग तीनों निर्मल होना चाहिए।
संयम
मौन लेकर पेपर पढ़ना, टी.व्ही. देखना या कुछ अन्य सांसारिक कार्य करना सामायिक नहीं है।
ध्यान
साधक को स्त्री सबसे बड़ी बाधा है।
ब्रह्मचर्य
जनसंपर्क साधु का शत्रु है।
संयम
जो मोही मुनि राग के कारण मुनीम का कार्य करने लगता है उसे कभी मोक्ष नहीं मिलता है। मुनीम गिनता तो बहुत है पर उसे मिलता बहुत कम है। यश के पीछे अरहंत मुद्रा का अपयश करना माँ को वेश्या बनाने जैसा है।
अनासक्ति
तन और वस्त्र की तरह भावों को भी साफ रखो।
मन
पराधीनता दुःख का स्वाधीनता सुख का कारण है।
संयम
जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो, जिसकी पत्नी उसकी इच्छा के अनुरूप व्यवहार करती हो और जिसे अपने धन पर सन्तोष हो, वह व्यक्ति सबसे सुखी है। सुखी होना है तो पर का कर्त्तापन छोड़ दें।
संतोष
भगवान् किसी का भला-बुरा नहीं करते, यदि भगवान् भला करते तो मन्दिर के द्वार पर बैठा भिखारी जीवन भर क्यों हाथ फैलाता? रोज पूजा करने वाला पुजारी क्यों निर्धन रहता? और बुरा करते तो मंदिर मूर्ति को तोड़ने वाले क्यों महलों में सुख से रहते? अतः सत्य यह है सुख-दुःख स्वयं के भावों से किए कर्माधीन हैं।
कर्म
वर्तमान की पर्याय के सुख दुःख मत देखो क्योंकि वह पर्याय बहुत छोटी है भविष्य के बारे में सोचो क्योंकि वह बहुत बड़ा है।
समय