Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 5

पर प्रशंसा निज निंदा ही अर्चा है

149 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

वायु से ताड़ित, पत्थर तथा घटीयन्त्र से ताड़ित एवं सूर्य की किरणों से संतप्त वापिका के जल को मुनि प्रासुक मानते हैं, यद्यपि उपर्युक्त लक्षण वाला जल आगम में प्रासुक कहा गया है तथापि अत्यावश्यकता वश उससे स्नान ही करना चाहिए, उसे बिना छने पीना नहीं चाहिए। वस्त्र धोने तथा नहाने का पानी जलाशय में नहीं जाना चाहिए।
अहिंसा
जो वस्त्र छत्तीस अँगुल लम्बा और चौबीस अँगुल चौड़ा है, उसे दुहरा कर पानी छानना चाहिए। वस्त्र के मध्य आये हुए जीवों को जल के मध्य में स्थापित करना चाहिए, ऐसा कर जो पानी पीता है वह उत्कृष्ट गति को प्राप्त होता है।
अहिंसा
छना हुआ पानी १ मुहूर्त (४८ मिनट) तक, प्रासुक २ पहर (६ घंटे) तक और अत्यधिक गर्म किया हुआ पानी दिन रात अर्थात् २४ घंटे तक चलता है, पश्चात् उसमें सम्मूर्छन जीव उत्पन्न हो जाते हैं।
अहिंसा
एक मुहूर्त के बाद पानी को फिर से नहीं छानना अथवा सछिद्र या मलिन वस्त्र से छानना और जीवानी को अन्य जलाशय में डालना, जलगालन व्रत में योग्य नहीं माना गया है।
अहिंसा
इस प्रकार जो सदा पानी छानने में यत्न करते हैं, वे धर्मस्नेही भव्य जीव निरन्तर सुखी रहते हैं। जिस जलाशय से यत्नपूर्वक छानकर जल लाया गया है, ज्ञानी पुरुष जीवसहित जल को उसी जलाशय में स्थापित करें अर्थात् जिवानी उसी जलाशय में डाले।
अहिंसा
बिना छने जल में असंख्यात जीव होते हैं, अतः बिना छना पानी पीने वाला पुरुष पाप का अर्जन करता है।
अहिंसा
एक व्यक्ति को मग से बिना देखे, बिना छना पानी पीने से, कुछ दिनों में पेट में तकलीफ होने लगी, तो एक्सरे करवाया डॉक्टर ने उपवास करने के लिए कहा–उसने कहा हम तो एक घंटे भी भूखे नहीं रह सकते, डॉक्टर ने कहा स्वस्थ होना है, तो उपवास करना ही होगा उसने जिस किसी तरह उपवास किया दूसरे दिन दस–पाँच चने के दाने खाने को दिए, जब चने की धंध पेट में पहुँची तो उल्टी की इच्छा हुई, डॉक्टर ने कहा उल्टी कर दो, उल्टी की तो साँप का बच्चा निकला यह अनछना पानी पीने का परिणाम था।
अहिंसा
पाप की कालिमा को नदी समुद्र का पानी नहीं धो सकता, उसे तो पश्चाताप के आँसू ही धो सकते हैं एवं परमात्मा तक पहुँचने के लिए प्रायश्चित सबसे सरल मार्ग है।
क्षमा
पुण्य के उदय में रावण और पाप के उदय में राम मुस्कुराते हैं।
कर्म
यदि सचमुच ही तुम दुःख से डरते हो और तुम्हें दुःख अप्रिय है, तो फिर प्रकट या गुप्त किसी भी रूप में पाप कर्म मत करो।
कर्म
एक छेद भी जहाज को डुबा देता है और एक पाप भी पापी को नष्ट कर देता है।
कर्म
अज्ञानी तो बीते हुए को स्वप्न की तरह मानता है, पर ज्ञानी (विवेकी) वर्तमान को स्वप्न की तरह मानता है।
विवेक
आदमी को अपनी प्रसिद्धि के लिए अपनी विशुद्धि नहीं खोना चाहिए।
चरित्र
प्रभु से पद की नहीं परमपद की प्रार्थना करो।
भक्ति
संसार के काम में तो नफा और नुकसान दोनों होते हैं, पर भगवान् के काम में नफा-ही-नफा होता है, नुकसान होता ही नहीं है।
भक्ति
राजभवनों के मोह से मनुष्य आजीवन मानसिक कारावास भोगता है।
अनासक्ति
सुन्दर विचार जिनके साथ हैं, वे कभी अकेलेपन में नहीं रहते हैं।
मन
वैरागी की आत्मशक्ति के सम्मुख विश्व की समस्त शक्तियाँ असफल हैं।
अनासक्ति
हम हर बार शरीर का परिचय लेते रहे, पर शरीर ने हर बार धोखा दिया, यदि हम एक बार भी आत्मा का परिचय ले लेते तो वह हमें शाश्वत धाम तक पहुँचा देता।
ज्ञान
जिसमें शान्ति का निवास नहीं है, उसके सारे सद्गुण व्यर्थ हैं।
संतोष
शान्ति की विजय भी युद्ध की विजय से कम महत्त्व की नहीं होती है।
संतोष
तन की पवित्रता से नहीं मन की पवित्रता से परमात्मा प्रसन्न होते हैं।
मन
दूसरों की प्रशंसा और अपनी निंदा करना ही परमात्मा की अर्चना करना है।
विनम्रता
जैसे दूध में घी छिपा होता है वैसे ही शरीर में आत्मा छिपी होती है।
ज्ञान
विगत में जो किया, उसकी फसल वर्तमान में काट रहे हो, वर्तमान में जो बोओगे, उसकी फसल भविष्य में काटोगे।
कर्म
परिस्थिति नहीं बदल सकते तो अपनी मनःस्थिति बदल लो सब दुःख-सुख में बदल जायेंगे। जो परिणामों को विशुद्ध बनाये उसका नाम पर्व है।
मन
जो पापों को गलाये तथा पुण्य की वृद्धि कराये, वह पर्व है।
धर्म
जल से वस्त्र शुद्ध होते हैं, सत्य से मन शुद्ध होता है, अहिंसा से आत्मा पवित्र होती है और ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है।
सत्य
जो पुण्य कार्य करने से रोके वही पाप है और पाप कार्य न करने दे, वही पुण्य है।
धर्म
संसार में रहना पाप नहीं है, संसार में रमना पाप है अर्थात् पदार्थों के प्रति आसक्ति पाप है।
अनासक्ति
आज का श्रम कल का विश्राम है।
पुरुषार्थ
प्रायश्चित से पिछले पाप के प्रति विरक्ति उत्पन्न होती है और आगे के लिए सावधानी होती है।
क्षमा
भूल की पुनरावृत्ति न होने देना भी भूल का सबसे बड़ा प्रायश्चित है।
चरित्र
‘‘पहले पाप कर लें पीछे प्रायश्चित कर लेंगे’’ इस प्रकार जान–बूझकर किए गये पाप प्रायश्चित से नष्ट नहीं होते हैं।
क्षमा
जैसे बालक हर अवस्था में माँ को ही पुकारता है, ऐसे ही आप हर अवस्था में भगवान् को पुकारो। जो मन की शान्ति व संतोष पा लेता है, वही असल में जीवन जीता है, वही संग्राम विजयी है। फिर उसके पास मोटर, घर, धन-सम्पदा हो या न हो लेकिन यदि मन की शान्ति न रही तो सारे सुख-वैभव के बावजूद भी वह मनुष्य सुखहीन है।
संतोष
जीवन आज और अभी है, उसे कभी अतीत या भविष्य में न देखें, जिसने जीवन को अतीत या भविष्य में देखा उसने जीवन को जाना ही नहीं। हमेशा ध्यान रखें कि जो सामने है वही सच है। उसके बाद जो कुछ भी है वह सिर्फ संभावना है।
समय
राग के समान कोई आग नहीं, द्वेष के समान कोई अनिष्ट ग्रह नहीं, मोह के समान कोई जाल नहीं और तृष्णा के समान कोई नदी नहीं है।
अनासक्ति
मारना चाहते हो तो बुरी इच्छाओं को मारो, जीतना चाहते हो तो तृष्णाओं को जीतो, खाना चाहते हो तो गुस्से को खाओ, लेना चाहते हो तो प्रभु का नाम लो, बोलना चाहते हो तो मीठे वचन बोलो, छोड़ना चाहते हो तो पाप और अत्याचार को छोड़ो, पहनना चाहते हो तो नेकी का जामा पहनो, देखना चाहते हो तो अपने दुर्गुण देखो कल्याण हो जाएगा।
संयम
सुख चाहते हो तो रात में खाना नहीं, शान्ति चाहते हो तो दिन में सोना नहीं, सम्मान चाहते हो तो व्यर्थ में बोलना नहीं और निर्वाण चाहते हो तो धर्म को छोड़ना नहीं।
संयम
जिनके चित्त से राग द्वेष का नाश हो जाता है वे ज्ञानी, गुणी, दानी और ध्यानी हैं।
अनासक्ति
खोज करने पर कदाचित् अग्नि के मध्य शीतलता दिख सकती है परन्तु संसार में सुख किसी तरह और किसी समय नहीं दिख सकता है।
अनासक्ति
मनुष्य को किसी भी समय काम वासना से, भय से, लोभ से या जीवन रक्षा के लिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि धर्म नित्य है और सुख-दुःख और जीवन अनित्य है।
धर्म
जो बुद्धि का विषय नहीं है वहाँ श्रद्धा तथा विश्वास के बल पर ही मानव सफलता के मार्ग तक पहुँच सकता है।
भक्ति
परमात्म तत्त्व का अनुभव तभी होगा, जब ‘विषयभोग, निद्रा, हँसी, जगतप्रीत, बहु बात’; ये पाँचों सुहायेंगे नहीं।
ध्यान
भगवत् प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है–भोग और संग्रह की रुचि। दूसरों के सुख से सुखी होने पर ‘भोग’ की रुचि और दूसरों के दुःख से दुःखी होने पर ‘संग्रह’ की रुचि मिट जाती है।
अनासक्ति
संसार के त्याग में ‘विवेक’ काम आता है और भगवान् की प्राप्ति में ‘विश्वास’ काम आता है।
विवेक
परमात्मा के सम्मुख होने का उपाय है–संसार से सर्वथा विमुख होना।
अनासक्ति
जब यह शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है, तो फिर भय किसका और किसलिए?
समाधि
जो अध्यात्म से रहित होता है वही मौत से डरता है।
समाधि
सब प्रकार का भाग्य संकटपूर्ण होता है। सौभाग्य ईर्ष्या को लाता है और दुर्भाग्य लज्जा को।
कर्म
अपने भाव और भाग्य पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि भाव कब बिगड़ जायें और भाग्य कब रूठ जाए, इसका कोई भरोसा नहीं।
मन
भाव बिगड़ता है तो भव बिगड़ जाता है और भाग्य बिगड़ता है तो भविष्य बिगड़ता जाता है। अतः अच्छे भाव (परिणाम) और अच्छे भाग्य का सदुपयोग कर लो क्योंकि भाव सम्भलते ही भव सम्भल जाता है और भाग्य सँवरते ही भविष्य सँवर जाता है।
मन
खोटी भावना से किया गया अच्छा कर्म भी पाप को देने वाला होता है।
कर्म
भावना जल है, उस पर देश-काल-गति का प्रभाव बड़ी जल्दी पड़ता है।
मन
भावना के आधार पर कोई विचार स्थिर कर लेने में सदैव कष्ट होता है क्योंकि भावना स्थायी नहीं होती है। परिस्थियाँ बदलते ही मान्यताएँ बदल जाती हैं।
मन
मन, वचन, कर्म से जो कर रहे हो वही ब्याज सहित वापस मिलने वाला है।
कर्म
मन में किसी प्रकार की आसक्ति का न होना पवित्रता है।
अनासक्ति
मन पवित्र हो तो बुराई में भी अच्छाई दिखाई देती है।
मन
मन को मारने की नहीं मन पर विजय प्राप्त करने की आवश्यकता है क्योंकि मन पर विजय ही समस्त संसार पर विजय पाने जैसा है।
मन
जब तुम्हारा मन सत्य से विमुख होकर असत्य की ओर झुकने लगे तो समझ लो कि तुम्हारा सर्वनाश निकट ही है।
सत्य