Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 5

पर प्रशंसा निज निंदा ही अर्चा है

149 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

वस्त्र मैला हो जाए किन्तु मन मैला नहीं होना चाहिए।
मन
वातावरण के जहर से ज्यादा जहरीला है मन का जहर।
मन
मनुष्य का सबसे बड़ा नुकसान उसके मन में बुरे विचारों का आना है।
मन
वास्तव में मनुष्य जन्म ही सब जन्मों का आदि तथा अन्तिम जन्म है, यदि मनुष्य परमात्म प्राप्ति कर ले तो अन्तिम जन्म भी यही है और परमात्म प्राप्ति न करे तो अनन्त जन्मों का आदि जन्म भी यही है।
ज्ञान
मनुष्य पर्याय मौज-मस्ती करने को नहीं मोक्ष प्राप्ति को मिली है।
ज्ञान
सज्जनों को अपने रूप की नहीं अपने स्वरूप की चिन्ता करनी चाहिए क्योंकि रूप तो नश्वर है किन्तु स्वरूप शाश्वत है।
ज्ञान
मालिक गुलाम का भी गुलाम होता है क्योंकि मालिक को नौकर की पराधीनता झेलना पड़ती है।
अनासक्ति
अपनी मुक्ति अपने प्रयासों से होगी, दूसरा कोई तुम्हारा सहायक नहीं बन सकता है।
पुरुषार्थ
किसी चीज से प्रभावित न होना ही मुक्ति है।
अनासक्ति
समय का सदुपयोग करने वाला मोक्षमार्गी होता है।
समय
वाणी में स्याद्वाद, विचारों में अनेकान्त, आचरण में अहिंसा ही मुक्ति का द्वार है।
अहिंसा
मोही-ज्ञानी भी संसारी है जबकि निर्मोही अल्पज्ञानी मोक्षमार्गी होता है।
अनासक्ति
मोक्ष मार्ग में शरीर की शुद्धता से ज्यादा आचार-विचार और दिल-दिमाग की शुद्धता की आवश्यकता होती है।
चरित्र
जो हँसी-हँसी में भी मोक्षमार्ग की अवहेलना करता है, उसकी मुक्ति संभव नहीं है।
धर्म
मृत्यु से वे ही डरते हैं, जिसका जीवन पाप कर्मों में निकला है। मौत बड़ी नींद है, नींद छोटी मौत है।
समाधि
मृत्यु से भयभीत होना कायरों का काम है क्योंकि असली जीवन तो मृत्यु ही है।
समाधि
जब मृत्यु तय है जो उसका उल्लास से वरण करें क्योंकि मृत्यु प्रतिदिन निकट आ रही है।
समाधि
अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता और मित्र मोह; ये छह तीखी तलवारें देह धारियों की आयु को काटती हैं।
चरित्र
मनुष्य का बचपन कभी-कभी लौटता भी है अर्थात् वृद्धावस्था में भी बचपन जैसी दशा हो जाती है पर यौवन कभी वापस नहीं आता है।
समय
सिद्धशिला का रास्ता लंबा अवश्य है पर पहुँचना असंभव नहीं है।
पुरुषार्थ
मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य अपने में देवत्व को पहचानकर उसे प्राप्त करना है।
ज्ञान
अप्राप्त वस्तु को पाने की लालसा दुःख का कारण है, परन्तु वस्तु प्राप्त हो जाने पर उसकी सुरक्षा महादुःख का कारण है।
अनासक्ति
स्वर्ग नरक स्वयं के भीतर है जैसा सोचोगे वैसा पाओगे।
मन
दूसरे के प्रति बुरा विचार करके अपनी उपयोगी ऊर्जा का दुरुपयोग मत करो।
मन
विज्ञान सुविधा देता है समाधि नहीं, समृद्धि देता है शान्ति नहीं, साधन देता है साधना नहीं।
ज्ञान
विज्ञान की आँख पदार्थ को तो देख सकती है किन्तु परमात्मा को नहीं, परमात्मा को देखने के लिए अध्यात्म की आँख चाहिए।
ज्ञान
आन्तरिक विरक्तता के बिना बाह्य विरक्तता शव के शृंगार के समान है।
अनासक्ति
कल्याण का पथ प्रत्येक पदार्थ से विरक्त होना है।
अनासक्ति
वैराग्य से आत्म सुख प्राप्त होता है, वैराग्य से दुःख का नाश होता है, वैराग्य से शरीर में नीरोगता रहती है और वैराग्य से मोक्ष का सुख प्राप्त होता है।
अनासक्ति
स्वाभिमानी और पवित्र हृदय वाला पुरुष निर्धन होने पर भी श्रेष्ठ गिना जाता है।
चरित्र
किसी पर सन्देह करने से अपना चित्त मलिन होता है।
मन
जो ताकत आपको लक्ष्य की ओर ले जा सकती है वह आपके अन्दर है बाहर नहीं।
पुरुषार्थ
संसार में सबसे शक्तिशाली वही है जो आत्म निर्भर स्वाधीन है।
संयम
जैसे कुश्ती लड़ने से बल बढ़ता है वैसे ही परिस्थितियों से लड़ने से अर्थात् शान्ति से आत्मबल बढ़ता है।
पुरुषार्थ
‘‘जैसा मैं चाहूँ वैसा हो जाये’’ यह इच्छा जब तक रहेगी, तब तक शान्ति नहीं मिल सकती। चाहे साधु बनो, चाहे गृहस्थ बनो, जब तक कामना (कुछ पाने की इच्छा) रहेगी, तब तक शान्ति नहीं मिल सकती।
संतोष
जिसको अपने में ही शान्ति मिल गई उसके लिए सारा संसार शान्तिमय है।
संतोष
स्वयं शांत रहने वालों की शान्ति को कोई भंग नहीं कर सकता है।
संतोष
मन में शान्ति चाहिए तो व्यर्थ की भाग-दौड़ और उत्तेजनाओं से बचिए।
संतोष
दूसरों को न बदल सको तो स्वयं को बदल लीजिए, शान्ति के द्वार खुल जाएँगे।
संतोष
शान्ति मानव-जीवन के लिए एक परम पावन और वांछनीय निधि है।
संतोष
जगत् की अशान्ति देखकर अपनी शान्ति भंग मत करो।
संतोष
शान्ति मानव जीवन का चरम उद्देश्य है, संसार में जितने धर्म-कर्म हम करते हैं, उन सबके पीछे यही लालसा रहती है कि हम शान्तिपूर्वक जीवन बिताएँ।
संतोष
आज व्यक्ति के पास पर्याप्त धन-दौलत, वैभव सब कुछ है, पर शान्ति नहीं है और शान्ति नहीं है तो सब कुछ पाना और न पाना बराबर है।
संतोष
ऐसे जियो कि दुनिया में तुम रहो किन्तु दुनिया तुम में न रहे अर्थात् किसी वस्तु से राग न हो।
अनासक्ति
संसार में जो मिलता है, वह रुचता नहीं और जो रुचता है वह मिलता नहीं इसलिए सुख मिलता नहीं और दुःख मिटता नहीं।
संतोष
संसार के संयोग का वियोग तो अवश्यम्भावी है, पर वियोग का संयोग अवश्यम्भावी नहीं है अतः संसार का वियोग ही सत्य है।
अनासक्ति
सांसारिक पदार्थ, मान, बड़ाई, प्रशंसा, आराम, सत्कार आदि प्रिय लगना पतन का कारण है।
अनासक्ति
शरीर–बल से प्राप्त सत्ता मानव देह की तरह क्षणभंगुर रहेगी जबकि आत्मबल से प्राप्त सत्ता आत्मा की तरह अजर और अमर रहेगी।
संयम
दूसरों के निर्णय पर जीने वाला व्यक्ति कभी भी सत्य के दर्शन नहीं कर पाता है।
सत्य
सत्य की खोज करने वाले में निर्भयता का गुण होना ही चाहिए।
सत्य
आत्महत्या समस्या का समाधान नहीं अपितु एक नई समस्या है।
समाधि
जो समाधि में डूबता है वही मुक्ति का वरण करता है।
समाधि
समाधि आत्महत्या नहीं, आत्म जागरण है।
समाधि
सांसारिक सम्पदायें आँख खोलने से मिलती हैं लेकिन आध्यात्मिक सम्पदा आँख बन्द करने पर मिलती है।
ध्यान
शुद्ध आत्मा की प्राप्ति ही सच्ची सम्पत्ति है।
ज्ञान
देव-शास्त्र-गुरु के प्रति सच्ची अकाट्य श्रद्धा को सम्यग्दर्शन कहते हैं।
भक्ति
सत्पुरुषों का सम्यग्दर्शन के साथ नरक में भी निवास करना अच्छा है और सम्यग्दर्शन के बिना स्वर्ग में भी निवास शोभा नहीं देता है।
भक्ति
सम्यग्दर्शन के अभाव में जन्म मरण की पीड़ा सताती है।
भक्ति
सम्यग्दृष्टि स्वर्ग की सम्पदा को पाकर भी उदासीन रहता है।
अनासक्ति
सम्यग्दृष्टि का परिवार से अटेचमेंट तो होता है पर आसक्ति नहीं रहती है।
अनासक्ति