Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Dharma

धर्म

423 सूत्र · पृष्ठ 5 / 6

जिस प्रकार अन्न के विना शरीर, नेत्र के विना चेहरा, न्याय के विना राज्य, नमक के विना भोजन और चन्द्रमा के विना रात्रि की शोभा नहीं होती है, उसी प्रकार धर्म के विना जीवन की शोभा नहीं होती है।
धर्म
वस्तु का स्वभाव धर्म है, क्षमादि दस भेद धर्म हैं, रत्नत्रय धर्म है और जीवों की रक्षा करना भी धर्म है।
धर्म
धम्मो सुद्धस्स चेट्ठई- धर्म शुद्ध हृदय में ठहरता है।
धर्म
जो साधु वैराग्य को धारण कर लेते हैं उन्हे शौच धर्म होता है।
धर्म
सनतचक्रवर्ती के पास देव जब उनकी सुन्दरता के दर्शनार्थ आये थे तब उतना शौच धर्म नही था, जितना मुनि अवस्था में कोढ़ हो जाने पर था।
धर्म
बहिरात्मा देह की उज्ज्वलता, स्नानादि को शौच धर्म कहते हैं, शौच धर्म आत्मा को उज्ज्वल करने से होता है।
धर्म
इन्द्रिय विषय का त्याग, तप का धारण, ब्रह्मचर्य का पालन, मद का त्याग, श्रुत का अभ्यास, मिथ्यात्व और कषाय के त्याग से शौच धर्म होता है।
धर्म
गुणों की प्रशंसा, निरन्तर तत्त्वों का चिन्तन और पापों से भय होना शौच धर्म है।
धर्म
हिंसक, परधनहर्ता, परस्त्री गामी व्यक्ति यदि करोड़ों तीर्थों में स्नान, करे करोड़ों तीर्थ वन्दना करें, करोड़ों का दान करें, करोड़ों वर्ष तप करे, शास्त्रों का अध्ययन करे तो भी शौच धर्म नहीं हो सकता है।
धर्म
साफ़ और स्वच्छ दर्पण में उभरने वाला प्रतिबिम्ब स्वच्छ होता है, उसी प्रकार स्वच्छ हृदय में धर्म अवतरित होता है।
धर्म
मनुष्य जन्म बड़ी दुर्लभता से मिलता है और लोग सुलभता से नष्ट कर देते हैं।
धर्म
परिभोग, उपभोग, जीवन और इन्द्रिय विषय इन चार प्रकार के लोभ के त्याग से शौच धर्म होता है।
धर्म
लोभ अन्त में नष्ट होता है, अतः सभी कषायों के अभाव में शौच धर्म होता है।
धर्म
अस्नान व्रती को शौच धर्म होता है, नहाने वालों को नहीं।
धर्म
प्राणी ब्रह्मचर्य, जप, तप, ज्ञान–ध्यान आदि से शुद्ध होता है, न की मात्र नहाने से।
धर्म
वस्तु का स्वभाव धर्म है, क्षमादि भाव धर्म है, चारित्र धर्म है और जीवों की रक्षा करना धर्म है।
धर्म
रत्नत्रय के प्राप्त होने पर जगत में सब वैभव प्राप्त हो जाता है, इसके विपरीत यदि रत्नत्रय नष्ट हो गया है तो लोक के सब रत्नों का सङ्ग्रह नष्ट हो गया है, ऐसा समझना चाहिए।
धर्म
उसी ने जन्म का फल व जीवन की सार्थकता को प्राप्त किया है, जिसने इस प्रशंसनीय पवित्र रत्नत्रय को प्राप्त किया है।
धर्म
जिन शासन में तीर्थंङ्कर भी क्यों न हो, वस्त्रधारी सिद्ध नहीं होते, नग्नता ही मोक्ष का मार्ग है, शेष सभी उन्मार्ग हैं।
धर्म
अव्रती रहकर नरक में जाने की अपेक्षा व्रती बनकर स्वर्ग में जाना अच्छा है, क्योंकि जैसे छाया और धूप में प्रतीक्षा करने वालों में बहुत अन्तर होता हैं वैसे ही नरक व स्वर्ग में रहकर मोक्ष की प्रतीक्षा करने वालों में बहुत अंतर होता है।
धर्म
त्याग के विना राग मिट नहीं सकता, जल के विना मल छूट नहीं सकता। तप संयम के विना भगवान् बनने वालों, साधु हुये विना मोक्ष मिल नहीं सकता।।
धर्म
जो मोही धर्म का विघात करके विषय सुख का अनुभव करते हैं वे पापी वृक्ष को जड़ से काटकर फल पाना चाहते हैं।
धर्म
डरना है तो पाप से डरो संयम से नहीं। मदिरालय की ओर जाने वाले हजारों कदम हैं, मन्दिर की ओर जाने वाले कम हैं।
धर्म
सोच विचार कर व्रत लेना चाहिये, लेकर प्रयत्न पूर्वक पालन करना चाहिये, अहंकार या प्रमाद से दोष लग जाने पर प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध कर लेना चाहिये।
धर्म
जहाँ पर ज्ञान आगे है, लज्जा साथी है, तप का सम्बल है, चारित्र की पालकी है, ठहरने का स्थान स्वर्ग है, गुण रक्षक हैं, सरलता रुपी मार्ग है, समता रुपी घनी शीतल छाया है और दया की भावना है उस वाहन पर यात्रा करने वाले मुनि विना विघ्न के मोक्ष प्राप्त करते हैं।
धर्म
छोटा सा नाला भी जब विना घाट के पार नहीं कर सकते, तब संसार-सागर पार करने के लिए मनुष्य जन्म रूपी घाट व जैन धर्म रूपी नौका आवश्यक है।
धर्म
सम्यग्दर्शन चारों गतियों में हो सकता है पर मुनि दीक्षा मनुष्य पर्याय में ही होती है।
धर्म
श्रावक के सत्रह नियम-1. कुगुरू, 2. कुदेव, 3. कुधर्म की सेवा, 4. अनर्थदण्ड, 5. पापयुक्त व्यापार, 6. जुआ, 7. मांस, 8. शहद, 9. वेश्या, 10. चोरी, 11. परस्त्री, 12.हिंसा के उपकरणों का दान, 13. शिकार, 14. स्थूल-त्रस की हिंसा, 15. असत्य वचन, 16.विना छना जल, 17. रात्रिभोजन, इन सत्रह चीजों का जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करना चाहिए।
धर्म
ससुर का तो जन्म ही नहीं हुआ- बहु ने मुनिवर से पूँछा आप इतनी जल्दी कैसे आ गये? मुनिवर ने कहा समय का क्या भरोसा, मुनिवर ने पूँछा तुम्हारी उम्र कितनी है? बहु ने कहा मेरी उम्र तीन वर्ष, पति की एक वर्ष, सासु की छः माह और ससुर का अभी जन्म ही नहीं हुआ, ससुर को सुनकर गुस्सा आया और बोला कि मेरे विना तेरा पति कहाँ से आया? और मुनि महाराज से इसका समाधान पाने के लिए गया, मुनि महाराज ने कहा जिसके जीवन में जब धर्म उतरता है तभी से उसका जन्म होता है इस अपेक्षा बहु ने ऐसा उत्तर दिया है।
धर्म
पार होने के लिए घाट चाहिये-जिस प्रकार छोटी सी नदी पार करने के लिए घाट की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार संसार समुद्र को पार करने के लिए द्वादशांग के घाट की आवष्यकता होती है।
धर्म
तप का अर्थ है तपना, कर्मों का क्षय करने के लिये जो तप किया जाता है वह तप धर्म है।
धर्म
उदर में भोजन विना जठराग्नि के नहीं पचता है। रोटी विना तवा तपे नहीं बनती है। मौसम तपे विना वर्षा ऋतु नहीं आती है। वृक्ष विना धूप के तपे फलता नहीं है। दूध तपे विना मावा बनता नही है। पेट्रोल वाष्प बने विनागाड़ी नहीं चलती है। सोलह ताप विना स्वर्ण शुद्ध नहीं होता है। उसी प्रकार तपे विना आत्मा शुद्ध नहीं होती है।
धर्म
संयम की सिद्धि, राग का अभाव, कर्मों का नाश, ध्यान और आगम की प्राप्ति के लिए तप धारण किया जाता है।
धर्म
दो तरह के मार्ग- एक साधनों का मार्ग और एक साधना का मार्ग, साधनों का मार्ग सुख-सुविधा का एवं साधना का मार्ग स्वाधीन तपश्चर्या का मार्ग है, अतः भारतीय संस्कृति ने धर्म के लिए साधन सम्पन्न नहीं, साधना सम्पन्न निरूपित किया है, यहाँ भोग को नहीं योग को, राग को नहीं त्याग को स्थान मिला है, सारा संसार विषयासक्त है, यहाँ विषय विरक्ति और आत्मानुरक्ति बड़ी दुर्लभ है, पर शुद्धि और सिद्धि का मार्ग एक तपश्चरण ही है, बुद्ध और महावीर की चिन्तन धारा का फर्क यही है कि बुद्ध ने कहा कि मन में उठे विकल्पों की पूर्ति करके मन को विश्राम भी देना चाहिए, इसलिए उन्होंने न अति भोग न अति त्याग, उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया, किन्तु भगवान् महावीर ने कहा, कि तृप्ति इच्छा की पूर्ति में नहीं त्याग में है। आत्मशान्ति के लिए त्याग और तप के मार्ग को अपनाना चाहिए। एक विचारक ने तो यहाँ तक लिखा कि जो लोग बीमार होने तक खूब खाते हैं, उन्हे ठीक होने तक उपवास और लङ्घन करने पढ़ते हैं, इन सभी विचार धाराओं में मन की कामनाओं पर नियन्त्रण बहुत जरूरी है, साकाङ्क्ष साधना खोखली मानी जाती है, सम्यक् तप आत्म शोधन में परम रसायन माना जाता है।
धर्म
धर्मसागरजी ने सागर में भुट्टा से कोई पड़गाहे तो आहार लेंगे ऐसी विधि ली थी, 4 दिन बाद विधि मिली।
धर्म
मोह का शमन होते ही आत्मा की शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं।
धर्म
अष्टमी अष्ट कर्मों का अन्त करने वाली है, चतुर्दशी सिद्धि प्राप्त कराने वाली है और पञ्चमी केवलज्ञान प्राप्त कराती है, अतः इन तीनों पर्वों के दिन उपवास करना चाहिए।
धर्म
भय, उदारता, कीर्ति, लज्जा और आशा इन पाँच कारणों से पञ्चम काल में जैन धर्म चल रहा है।
धर्म
पागल, आलसी, मदहोश, थका हुआ, क्रुद्ध, क्षुधातुर, लोभी, भीरु, उतावली करने वाला और कामी पुरुष धर्म को नहीं जानता है।
धर्म
मनुष्य रोते हुए जन्मता है, अपेक्षाओं में जीता है और निराश होकर मरता है, ऐसे में साधना और धर्म का मार्ग ही कल्याणकारी है।
धर्म
'अहिंसा, संयम व तप रुपी धर्म' मङ्गल और उत्कृष्ट कहा गया है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
धर्म
तप, महाव्रत, ध्यान और निर्वाण मनुष्य गति में ही प्राप्त किया जा सकता है।
धर्म
अकलङ्क और निकलङ्क-मान्यखेट के राजा शुभतुङ्ग के मन्त्री का नाम पुरुषोत्तम पत्नी का नाम पद्मावती इनके दो पुत्र थे अकलङ्क और निकलङ्क। एक वार अष्टान्हिक पर्व में मन्त्री और उनकी पत्नी ने आठ दिन का ब्रह्मचर्य व्रत लिया, साथ ही दोनों पुत्रों को भी व्रत दिला दिया। युवावस्था में जब पिताजी ने दोनों से विवाह करने को कहा, तो दोनों ने मना कर दिया। पिताजी ने उनको खूब समझाया कि व्रत की अवधि तो केवल आठ दिन की थी, अब विवाह करने में कोई परेशानी नहीं है। परन्तु दोनों ने कहा व्रत की अवधि आठ दिन थी, पर हमारे लिए आठ दिन की अवधि नहीं थी। यह बोलकर दोनों ने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और धार्मिक अध्ययन में तत्पर हो गये। दोनों बौद्ध धर्माचार्य के पास पढ़ने लगे, एक दिन बौद्धगुरु पढ़ाते-पढ़ाते किसी विषय को समझा नहीं सके और वे चिन्तित होकर बाहर चले गये। प्रकरण सप्तभङ्गी का था, अकलङ्क ने समय पाकर उसे हल कर दिया। बौद्ध गुरु ने उसे देखा, तो सोचने लगे की यहाँ कोई जैन विद्यार्थी है, जो भेष बदलकर पढ़ रहा है। उसकी खोज करने के लिए रात को सिपाहियों को भेजा और दोनों को पहचानकर जेल में बन्द करा दिया। समय पाकर दोनों जेल से भाग निकले तो किसी ने देख लिया और सैनिकों को उनके पीछे भेज दिया। दोनों भागते-भागते एक तालाब के पास पहुँचे वहाँ निकलङ्क ने भाई अकलङ्क से कहा कि आप यहाँ छिप जाइये आप एक पाठी हैं, आप सुरक्षित रहोगे तो जैन धर्म आगे चलता रहेगा। बहुत मनाने के बाद अकलङ्क वहाँ छिप गये, निकलङ्क आगे भाग गये। एक स्थान पर एक धोबी ने पूँछा की आप क्यों भाग रहे हो? तो उन्होंने बताया की मेरे पीछे सैनिक पकड़ने के लिए आ रहे हैं, तो डर कर वह धोबी भी साथ में भागने लगा। जब वे थक गये तो सैनिकों ने दोनों को अकलङ्क-निकलङ्क समझ कर मार डाला। जब अकलङ्क को यह पता चला तो बहुत दुखी हुए। उन्होंने बाद में मुनि दीक्षा लेली और तत्त्वार्थ राजवार्तिक सभाष्य, अष्टशती लघीयस्त्रय सविवृत्ति, न्याय विनिश्चय सविवृत्ति, सिद्धि विनिश्चय, प्रमाण सङ्ग्रह, स्वरूप सम्बोधन बृहत्त्रयम्, न्याय चूलिका, अकलङ्क स्तोत्र इत्यादि ग्रन्थों की रचना की। जिनशासन की प्रभावना के लिए आचार्य अकलङ्क देव ने अपने भाई निकलङ्क का महान त्याग किया था।
धर्म
अहो! बड़े आश्चर्य की बात है कि कलिकाल के होने पर और चित्त की चंचलता होने पर और शरीर अन्न का कीड़ा होने पर भी आज जिन लिंग के धारी जीवों का दर्शन हो रह है।
धर्म
पण्डित दौलतराम जी गरीब थे, छहढाला की रचना कर रहे थे, तभी बेटी ने आकर भोजन मांगा, तब उनके मुख से निकलता है, 'आतम को हित है सुख सो सुख आकुलता बिन कहिये, आकुलता शिव माहीं न तातें शिव मग लाग्यो चहिये' आत्मार्थी को हर परिस्थिति में मोक्ष मार्ग ही दिखाई देता है।
धर्म
जिसका धन दान के लिए, शरीर व्रतों के पालन के लिए और शास्त्र अध्ययन परम शान्ति के लिए नहीं है, उसका जन्म केवल जन्म-मरण की परम्परा के लिए ही है।
धर्म
पण्डित जगन्मोहनलाल जी मूर्ति खरीदने जयपुर गये, कृष्ण, राम, हनुमान आदि की मूर्ति चार हजार रुपये की थी, एवं महावीर भगवान् की चालीस हजार रुपये की थी, पण्डितजी ने कहा कि जैनियों को लूटते हो, शिल्पी ने कहा अन्य मूर्तियों के दोष को हम रङ्ग में ढँक देते हैं, पर वीतराग मूर्ति के दोष को कहाँ ढँके, जैनियों की मूर्ति दस-बीस पत्थरों में एक बनती है उसकी प्रकार आकिञ्चन्य धर्म में दोषों को स्थान नहीं होता है।
धर्म
बारह भावनाओं के चिन्तन से आकिञ्चन्य धर्म आ जाता है।
धर्म
धर्म किसी व्यक्ति विशेष का नहीं होता, जो पाले उसका होता है।
धर्म
यदि जैन धर्म का प्रवर्तन चाहते हो तो निश्चय और व्यवहार दोनों को नहीं छोड़ो, यदि व्यवहार को छोड़ोगे तो तीर्थ का उच्छेद हो जाएगा और निश्चय को छोड़ोगे तो आत्म तत्त्व की उपलब्धि नहीं होगी।
धर्म
सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र तीनों की एकता मोक्ष का मार्ग है जैसे अजवाइन का फूल, कपूर, पिपरमेंट की एकता अमृतधारा है।
धर्म
रत्नत्रय देव, नरक और तिर्यञ्च गति में नहीं है, उस रत्नत्रय को मानव पर्याय में हाँसिल कर लेना बुद्धिमानी है।
धर्म
रत्नत्रय- साईकिल में बैलेंस बनाना श्रद्धा है, सामने देखना ज्ञान है और पैडल मारना चारित्र है।
धर्म
दीपक में तैल श्रद्धा है, बाति ज्ञान है, अग्नि चारित्र है।
धर्म
मोक्ष मार्ग लक्ष्य है, दर्शन-ज्ञान-चरित्र आत्मभूत लक्षण हैं, लक्षणाभास नहीं हैं।
धर्म
जैसे वात-पित्त-कफ की हानि-वृद्धि होती है तो शरीर में विकार हो जाता है उसी प्रकार दर्शन-ज्ञान-चरित्र की हानि होने पर आत्मा में विकार हो जाता है।
धर्म
अन्धा- मिथ्यादर्शन, पङ्गू- मिथ्याज्ञान, आलसी- मिथ्याचारित्र है, इसके विपरीत तीनों की एकता रत्नत्रय है।
धर्म
जिस प्रकार बारात में वधू का स्वामी वर होता है, उसी प्रकार सम्यक्त्वी जीव सातिशय पुण्य व मोक्ष का अधिकारी होता है।
धर्म
इन्द्रभूति गौतम को मानस्तम्भ देखते ही निसर्गज सम्यग्दर्शन हुआ था, शेर को उपदेश से अधिगमज सम्यग्दर्शन हुआ था।
धर्म
मोटर अजीब तत्त्व है, सवारी जीव तत्त्व है, एक-एक का चढ़ना आस्रव है, सीट पर बैठना बन्ध है, सवारी का आना बन्द हो जाना संवर है, एक-एक करके उतर जाना निर्जरा है, सम्पूर्ण सवारी का उतर जाना मोक्ष है, इसी प्रकार सभा, नाव, रोटी आदि में घटाना एवं दार्ष्टान्त के रूप में आत्मा में घटाना चाहिए।
धर्म
नाम निक्षेप से लोगों द्वारा जैन साहब कहना, स्थापना निक्षेप से अष्ट मूलगुण धारी होना, द्रव्य निक्षेप से तत्त्वाभ्यासी होना, भाव निक्षेप से सम्यग्दर्शनादि से सहित होना।
धर्म
जब राम ने सीता को जङ्गल में छोड़ा तो सीता ने अपने भावों को सम्भाला और श्रीराम को सन्देश भेजा धर्म को नहीं छोड़ना।
धर्म
संसारिणो मुक्ताश्च- बहुवचन का मतलब है मुक्त जीव दो भेद वाले हैं, जीवन मुक्त (केवली भगवान), शरीर मुक्त (सिद्ध भगवान), संसारी जीव भी एकेन्द्रियादि के भेद से अनेक प्रकार के हैं।
धर्म
गर्भ जन्म वालों को ही रत्नत्रय की प्राप्ति होती है, अन्य जन्म वालों को नहीं।
धर्म
सेनापति जय कुमार की दीक्षा- भरत चक्रवर्ती के सेनापति जयकुमार के साथ एक सौ आठ राजाओं ने दीक्षा धारण की और उनकी पत्नी सुलोचना ने अनेक सपत्नियों के साथ ब्राह्मी और सुन्दरी आर्यिका के पास दीक्षा ली। दीक्षोपरान्त जयकुमार शीघ्र ही द्वादशाङ्ग के पाठी होकर भगवान् के गणधर हो गये और आर्यिका सुलोचना ग्यारह अङ्गों की धारक हो गयी एवं नमि-विनमि भी छिहत्तर-सतत्तर वें गणधर हुये थे।
धर्म
जैन सिद्धान्त में उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य माना गया है, किन्तु दूसरे लोग मानते हैं, कि ब्रह्मा-सृष्टिकर्ता, विष्णु-रक्षक, महेश-संहारक हैं, जैसे शरीर में बुखार आया तो ऊष्णता का उत्पाद, ठण्डेपन का व्यय और शरीर ध्रौव्य है।
धर्म
चरणानुयोग बाह्य साधनों से अन्तरङ्ग परिणामों को सुधारने का तरीका बतलाता है।
धर्म
लड़की ने जिद की, कि मैं नए कपड़े पहनूँगी पुराने नहीं, वह ठण्ड में काँप रही थी, उससे पूँछा क्या हो गया? उसने बोला पुराने कपड़े पहनना नहीं है नए कपड़े माँ देती नहीं है इसलिए ठण्ड में काँप रही हूँ। इसी प्रकार पञ्चम् काल में शुद्धोपयोग होता नहीं है। शुभोपयोग से संवर-निर्जरा के साथ बन्ध भी होता है, यदि बन्ध के भय से शुभोपयोग को नहीं अपनायेंगे तो अशुभोपयोग ही हाथ लगेगा और उससे दुर्गति में जाना पड़ेगा।
धर्म
व्रत अङ्गीकार करना, याने आत्मा को हल्का बनाना है।
धर्म
जो व्रत पहली प्रतिमा में एक पैसे के बारबर होते हैं, वे ही व्रत ग्यारहवीं प्रतिमा में निन्यानवें पैसे के समान हो जाते हैं, क्षत्रिय तो महाव्रत लेते हैं, अणुव्रतों को लेना तो बनियों का काम है।
धर्म
व्रतों की पाँच-पाँच भावनायें- बिजली के खम्बे की मजबूती के लिये आजू बाजू में दो तार कस देते हैं ताकि गिरे नहीं इसी प्रकार व्रतों की मजबूती के लिये पाँच-पाँच भावनायें हैं।
धर्म
रत्नकरण्डक श्रावकाचार की वचनिका के अंतिम अध्याय में एक सौ आठ प्रकार की भावनाओं का वर्णन है जो पढ़ने योग्य है।
धर्म
व्रतों को अङ्गीकार करने वालों के अतिचार कहे हैं, लेकिन अव्रती तो सदा अनाचारी ही है।
धर्म
नागश्री ने अणुव्रत पिता की आज्ञा के विना ले लिये, पिता जी को मालूम चला, तो व्रत वापस करने मुनिराज के पास गये। रास्ते में एक व्यक्ति की पिटाई हो रही थी, कारण पूँछा, बताया कि इसने हिंसा की है इसलिये पीटा जा रहा है। नागश्री ने पिता से कहा कि यही व्रत तो मैंने लिया है इसको छोड़कर शेष वापस कर दो। आगे जिव्हा छेदन, हाँथ काटना, लिङ्ग छेदन, छापा मारी आदि प्रसङ्ग पाकर पाँचों व्रतों की स्वीकृति ले ली, पिता ने सोचा चलो मुनिराज को उलाहना तो दे आयें, विना पूँछे व्रत क्यों दिये? मुनिराज ने कहा ये मेरी पुत्री है इसलिए व्रत दिये, वह घबरा गया और राजा से शिकायत कर दी, राजा मुनिराज से नम्रता पूर्वक पूँछते हैं, तो मुनिराज ने उन्हे अपने भव एवं पहले के रिश्ते बताये, राजा गद-गद हो गया और पुत्री ने कहा वास्तव में आप मेरे जन्म दाता हैं।
धर्म
परिहार विशुद्धि चारित्र वाले साधु प्रश्नकर्ता का सन्देह निवारण हेतु, धर्म कार्य की अनुज्ञा हेतु एवं स्वयं प्रश्न करने हेतु तीन जगह बोलते हैं।
धर्म