Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Dharma

धर्म

423 सूत्र · पृष्ठ 4 / 6

यदि शान्ति चाहते हो तो दूसरों को सुख शान्ति दो, न किसी का दोष देखो और न किसी की निन्दा करो और हरक्षण प्रभु के ध्यान में मग्न रहो।
धर्म
सुविधाओं में हर क्षण सुख मिल सकता पर शान्ति नहीं शान्ति तो धर्म से मिलती है।
धर्म
जिस प्रकार निर्गन्ध पुष्प, दन्तहीन मुख और सत्यहीन वचन शोभायमान नहीं होता उसी प्रकार धर्म शून्य मानव भी शोभायमान नहीं होता है।
धर्म
तीर्थंकर जैसे महायोगी जिन्होंने सभी कार्य करना छोड़ दिया पर उपदेश करना नहीं छोड़ा और तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि अशरीरी सिद्ध नहीं हो गये अत: जब तक शरीर में शक्ति हैं, जिह्वा में दम है, जब तक कण्ठ काम करना बंद न कर दे तब तक उपदेश देना बंद नहीं करना चाहिए।
धर्म
महाकुलों में जन्में जनों का पारस्परिक विरोध धर्मोपदेश के अधिकारी गुरुजनों के वचनों से शान्त हो जाया करता है।
धर्म
सत्य और समाज के प्रति निर्भीक होकर स्वतन्त्र जीने का नाम संन्यास है।
धर्म
साधु का नौ का अङ्क शाश्वत है, नौ का पहाड़ा पढ़ने से घटता नहीं है, नौ दूनी अट्ठारह 1+8=9। श्रावक का आठ का अङ्क आठ का पहाड़ा पढ़ने से घटता जाता है, आठ दूनी सोलह 1+6=7।
धर्म
अपने को अजर-अमर समझकर विद्या और अर्थ का सञ्चय करना चाहिये, और मौत ने बाल पकड़ ही लिए हैं, ऐसा समझकर के धर्म का आचरण करना चाहिये।
धर्म
शास्त्र में कहे हुए एक पद या अक्षर का भी जो श्रद्धान नहीं करता है, शेष का श्रद्धान करते हुए भी वह मिथ्यादृष्टि है।
धर्म
भगवान् (सुदर्शन केवली) ने सन्मार्ग की प्रवृत्ति के लिए धर्म तत्त्वादि समस्त पदार्थों का दिव्यध्वनि के द्वारा गणधरों को उपदेश दिया। अर्थात् सामान्य केवली के भी गणधर होते हैं, गन्धकुटी में भी मानस्तम्भ होता है।
धर्म
मनुष्य जन्म अरू जिनवचन, मिले न बारम्बार। पक्का फल जो गिर गया, लगे न दूजी बार।।
धर्म
सौ का नोट मैला भी हो, तो सौ में ही चलेगा, पर पाँचसौ का नया नोट हो, लेकिन गर्वनर के हस्ताक्षर न हों, तो पाँच रुपये में भी नहीं चलेगा, पकड़ा जावेगा तो जैल होगी इसी प्रकार अरहन्त की मुहर जिसमें लगी है, वही शास्त्र सत्य है।
धर्म
प्रत्येक व्रत की पाँच-पाँच भावनाओं का पालन नहीं करना चारित्र का मल है, सम्यक्त्व का मल शंकादि दोष हैं, ज्ञान का मल संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय है, तप का मल प्राणियों और इन्द्रियों के विषय में संयम का अभाव है।
धर्म
अमावस्या और पूर्णमासी को सिद्धान्त ग्रन्थों का स्वाध्याय गुरुघातक है, चतुर्दशी को स्वाध्याय शिष्यघातक है, अष्टमी का स्वाध्याय दोनों को घातक है और प्रतिपदा स्वाध्याय का ही घात करने वाली है। अत: सिद्धान्त ग्रंथों का अध्ययन इन तिथियों में वर्जित है आराधना ग्रंथों का स्वाध्याय किया जाता है।
धर्म
राहगीर मील के पत्थर को देखकर मञ्जिल पाते हैं, साधु शास्त्र रूपी मील के पत्थर को देखकर मोक्ष मार्ग में चलते हैं।
धर्म
गणेश प्रसाद वर्णीजी ने धर्म माता चिरोंजाबाई जी से कहा! हम शास्त्रपढ़ने नहीं जायेंगे, कुछ लोग आते हैं सोते रहते हैं, बाई जी ने कहा सारा कुँआ छानलोगे तो जिवानी कहाँ डालोगे? सभी लोग मोक्ष जानेवाले नहीं हैं, एक का भी कल्याण होता है, तो अच्छा है।
धर्म
मंगलाचरण का प्रयोजन-पुण्य प्राप्ति, निर्विघ्न कार्य सम्पन्न, नास्तिकता का परिहार, शिष्टाचार का पालन।
धर्म
जीवन में धर्म का लायसेंस नहीं, धर्म होना चाहिए।
धर्म
धर्मात्मा होने का सम्बध शास्त्रों से नहीं, स्वयं के आचरण से है।
धर्म
शरीर में निर्ममत्व, गुरु में विनय, नित्य श्रुताभ्यास, उज्ज्वल चारित्र, अत्यन्त शान्ति, संसार से वैराग्य, अन्तरङ्ग बहिरङ्ग परिग्रह का त्याग, धर्म का ज्ञाता, साधु का साधुओं ने यह संसार का नाश करने वाला लक्षण बताया है।
धर्म
जहाँ ग्राम ही नहीं है तो उसकी सीमा कहाँ से होगी, स्त्री ही नहीं है तो पुत्र कहाँ से होगा, बुद्धि ही नहीं है तो विद्या कहाँ से होगी और धर्म ही नहीं है तो सुख कहाँ से प्राप्त होगा?
धर्म
छोटी सी नदी पार करने के लिये घाट की जरूरत होती है, संसार समुद्र को पार करने के लिए मनुष्य पर्याय, उच्च कुल एवं धर्मरूपी घाट को पकड़ना पड़ता है।
धर्म
सत्य से धर्म उत्पन्न होता है, दान से दया बढ़ती है, क्षमा से धर्म स्थापित किया जाता है एवं क्रोध और लोभ से धर्म का नाश होता है।
धर्म
सम्यग्दर्शन, दया, दान, तप, सन्तोष, संयम और परोपकार का स्वभाव होना ये उत्तम धर्मात्माओं के चिन्ह हैं।
धर्म
रावण विद्याधरों का अधिपति था और श्रीराम भूमिगोचरी थे, फिर भी राम के द्वारा रावण जीता गया, ठीक कहा है, जहाँ धर्म है वहाँ विजय है?
धर्म
कल्पवृक्ष माँगने पर देता है, चिन्तामणी रत्न चिन्तन मात्र से देता है, पर धर्म विना माँगे और विना चिन्तन के ही सब कुछ दे देता है।
धर्म
धर्म के स्वरूप को समझें- धर्म शास्त्रों को पढ़े विना आप धर्म नहीं समझ सकते हैं, और धर्म को समझे विना आप अपना भविष्य उज्ज्वल नहीं कर सकते हैं।
धर्म
जिस देश में तीर्थ, प्रतिमाएँ और धार्मिक लोग न हों, धर्म की रक्षा करने वाले पुरुषों को उस देश में नहीं जाना चाहिए।
धर्म
दान, दया, इन्द्रिय दमन, देव दर्शन, देवपूजन, इन पाँच दकारों से दुर्गति नहीं होती है।
धर्म
काम, अर्थ व यश के विषय में किया गया पुरुषार्थ निष्फल हो सकता है, परन्तु 'धर्म कार्य का संकल्प निष्फल नहीं होता है।'
धर्म
वर्तमान के षडावश्यक- लोग देवपूजा नहीं डॉक्टर पूजा करते हैं, मन्दिर परिक्रमा नहीं अस्पताल की परिक्रमा करते हैं, गुरु उपासना नहीं टी.वी. की उपासना करते हैं, स्वाध्याय के नाम पर समाचार पत्र पलटाते हैं, संयम जेल या अस्पताल में करते हैं, तप पैसा कमाने के लिए मेले में या बाज़ार में धूप में बैठकर करते हैं, दान के नाम पर टेक्स या घूस देते हैं।
धर्म
जो साधर्मी पर आपत्ति आने पर भी सोता रहता है, कुछ प्रतिकार नहीं करता है, वह समस्त सम्पत्ति से वञ्चित रहता है, क्योंकि अर्हन्तदेव ने वैय्यावृत्य को बाह्य और अभ्यन्तर तपों का हृदय कहा है, अर्थात् शरीर में जो स्थिति हृदय की है वही स्थिति तपों में वैयावृत्य की है।
धर्म
प्रजा का पालन करना नहीं प्रतिज्ञा का पालन करना बड़ा धर्म है।
धर्म
धर्म केवल ग्रन्थों, पन्थों और सन्तों के पास नहीं बल्कि हर एक के दिल से होना चाहिए। धर्म का सम्बन्ध दीवारों से नहीं दिल से होना चाहिए। लोगों को प्रभावित नहीं प्रकाशित करें। सूर्य दिन में प्रकाश करता है और चन्द्रमा रात में लेकिन सन्त ऐसे ज्योति पुरुष हैं जो दिन-रात दोंनो को प्रकाशित करते हैं,
धर्म
धर्म बुढ़ापे की औषधि नहीं युवा होने का टॉनिक है, दो दिन ही जियें लेकिन सिर का ताज बनकर जियें या फिर महाराज बनकर जियें।
धर्म
जो धर्म का विकास करता है, वह नर से नारायण बन जाता है, जो धर्म का विनाश करता है, वह नर से वानर बन जाता है।
धर्म
व्रती की चिन्ता गुरुओं को भी होती है, जटायु जब व्रती बना तो उसकी रक्षा का भार ऋद्धिधारी मुनिराज ने सीता को सौंपा था।
धर्म
जिनवाणी इशारा है, गुरू सहारा है, धर्म कार्य में जो वाद-विवाद करता है वह बर्बाद हो जाता है।
धर्म
पिच्छी-कमण्डलु के विना मोक्ष नहीं, तथा रत्नत्रय के विना मात्र पिच्छी-कमण्डलु लेने से भी मोक्ष नहीं होता है।
धर्म
धर्म पुण्य के लिए नहीं आत्म शुद्धि के लिए करना चाहिए पुण्य स्वयं ही मिल जाएगा।
धर्म
प्रामाणिकता और पापभीरुता धार्मिकता की ये दो कसौटी हैं।
धर्म
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है अपने आप में रहना। धर्म शून्य समाज स्वयं मनुष्य के लिए आफत है।
धर्म
शुद्ध साध्य के लिए शुद्ध साधना की आवश्यकता होती है।
धर्म
धर्म के आठ मार्ग- 1.पूजन करना, 2.आगम अध्ययन, 3.दान, 4.तप, 5.सत्य बोलना, 6.क्षमा, 7.निर्लोभता, 8.सन्तोष।
धर्म
जिनका हृदय क्रूर है वे धर्मात्मा कैसे हो सकते हैं।
धर्म
दीक्षा भूमिका है, पूर्णता नहीं, अपना अपराध दूर करना मोक्ष मार्ग है।
धर्म
जो सुख चाहो आत्मा तज दो बातें चार। कुगुरू कुदेव कुधर्म अरु दुःख कर असदाचार।।
धर्म
न्याय पूर्वक धनोपार्जन करने वाला, गुणवानों की पूजा करने वाला, मिष्टवचन बोलने वाला, धर्म, अर्थ तथा काम पुरुषार्थ का एक दूसरे का घात न करने वाला, गृहस्थ धर्म के योग्य स्त्री, योग्य आवास, लज्जायुक्त, योग्य आहार-विहार वाला हो, सत्सङ्गति हो, बुद्धिमान हो, कृतज्ञ हो, इन्द्रियों को वश में रखने वाला हो, धर्मोपदेश सुनने वाला हो, दयालु हो, पापभीरु हो, ऐसा श्रावक होता है।
धर्म
दरिद्रता सज्जन स्वभाव का नाश करती है, दान दुर्गति का नाश करता है, बुद्धि अज्ञान का नाश करती है और सद् भावना भव का नाश करती है।
धर्म
देश और विदेश के भेद से संसार दो भागों में बँटा है- देश में भगवत्ता है, विदेश में भौतिकता है। देश में पवित्रता है, विदेश में पतन है। देश में वीतराग विज्ञान की शिक्षा दी जाती है, विदेश में भौतिक निर्माण की शिक्षा दी जाती है। देश धर्म को लेकर आगे बढ़ता है, विदेश धन के पीछे भागता है। देश में आत्मा को शुद्ध करने का उपदेश दिया जाता है, विदेश में देह को सम्भालने का उपदेश दिया जाता है। देश में मन्दिर हैं, जिससे संस्कार मिलते हैं, विदेश में सिनेमा घर हैं, जिनमें भौतिक जीवन जीने की शिक्षा मिलती है।
धर्म
सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी कल्याण को प्राप्त हों, कोई दुःखी न हो।
धर्म
स्त्री समागम, आहार, मल विसर्जन तथा आरम्भादि में लीन रहने वाला और अशुद्ध वस्तुओं को स्पर्श करने वाला गृहस्थ स्नान कर तथा धुले हुए पवित्र वस्त्र धारण कर ही जिनपूजा करें।
धर्म
पूजा के लिए स्नान करने से जीवघात होता है, ऐसा जो कहता है वह पसीना आदि मल को दूर करने के लिए स्नान करता हुआ लज्जित क्यों नहीं होता है?
धर्म
क्षमा आदिक दस धर्म, बारह व्रत, उत्कृष्ट श्रावक का आचार, बारह तप, समीचीन मुनि के लिए चार प्रकार का आहारादि दान देना, ज्ञान-ध्यान आदि का अभ्यास करना, जिनेन्द्र देव की पूजा करना, समीचीन धर्म के धारक पुरुषों का सम्मान करना, सद्गुरुओं की सदा सेवा करना, जिन प्रतिमाओं और जिन मन्दिरों का निर्माण कराना, जिन प्रतिमाओं की महान् अभ्युदय को सिद्ध करने वाली प्रतिष्ठा कराना, जिनेन्द्र प्रतिमाओं का महोत्सव के साथ अभिषेक करना, अनुप्रेक्षाओं आदि का चिन्तन करना, तप के लिए समीचीन पुरुषार्थ करना, अन्य जीवों का उपकार करना तथा मनुष्यों को धर्म आदि का उपदेश देना इन कार्यों से तथा रत्नत्रय आदि भावों से, श्री जिनेन्द्रदेव के स्मरण से एवं निर्ग्रन्थ साधुओं की भक्ति करने से ''भव्य जीव आश्चर्यकारी पुण्य को प्राप्त करते हैं''।
धर्म
छःद्रव्य, सात तत्त्व, पाँच अस्तिकाय, नौ पदार्थ, बन्ध-मोक्ष और मोक्ष के कारण रूप बारह अनुप्रेक्षाओं में, रत्नत्रय, शुभकर्म, दया आदि सद्धर्म इत्यादि में जो प्रवृत्ति करता है वह शुभ भाव है।
धर्म
नव देवताओं के प्रति प्रशस्त राग हो व जीवों के प्रति दया हो और तीव्र क्रोध-मान-माया-लोभ का अभाव होने से 'पुण्य का आस्रव' होता है।
धर्म
जिसके पुण्य और पाप दोनों की निर्जरा होती है पुन: आस्रव नहीं होता है उस योगी को निर्वाण प्राप्त होता है एवं वहाँ से पुन: संसार में आगमन नहीं होता है, इसके पहले पुण्य की नहीं पाप की निर्जरा होती है।
धर्म
धर्मयज्ञ में हवन विधि- आत्मा यजमान है, शरीर वेदी है, सन्तोष साकल्य है, शुक्ल ध्यान प्राणायाम है, सिद्धपद की प्राप्ति फल है, सत्य बोलना स्तम्भ है, तप अग्नि है, चञ्चल मन पशु है, इन्द्रिय समिधा है, यही धर्म यज्ञ कहलाता है।
धर्म
दीक्षोपरान्त उपवास- सुमतिनाथ और मल्लिनाथ भगवान् ने भोजन करने के बाद दीक्षा धारण की तथा दीक्षा के तीन दिन के बाद तीन दिन का उपवास लिया, पार्श्वनाथ और वासुपूज्य भगवान् ने दीक्षा के बाद एक दिन का उपवास धारण किया था और शेष तीर्थंकरों ने दो दिन का उपवास लिया था, किन्तु आदिनाथ भगवान् की दीक्षा लेने के बाद छह माह के अनशन की कथा सर्वत्र प्रसिद्ध है।
धर्म
लोग एक मुट्ठी चावल को निर्माल्य समझते हैं, मन्दिर के पैसे बिजली आदि को निर्माल्य नहीं समझते, जो निर्माल्य खाता है उसकी पीठ पर कूबड़ होती है, अगले जन्म में देवों के विमान को खींचता है।
धर्म
द्वादश तप दश धर्म जुत, पालें पञ्चाचार। षडावश्यक गुप्तित्रय, आचारज गुणसार।।
धर्म
अनशन ऊनोदर करें, व्रतसंख्या रस छोर। विविक्त शैयासन करें, काय क्लेश सुठौर।। प्रायश्चित धर विनय जुत, वैयावृत स्वाध्याय। पुनि उत्सर्ग विचार के, धरे ध्यान मन लाय।। हमने भगवान् के दरबार में बड़ी गजब बात देखी है। देते हुए उसके हाथ नहीं देखे पर झोलियाँ सबकी भरी देखी हैं।।
धर्म
विशुद्धि- व्रतों के पालन करने से सम्यग्दर्शन की विशुद्धि में वृद्धि होती है।
धर्म
पुष्पडाल मुनि का स्थितिकरण वारिषेण मुनि ने 12 वर्ष में किया था।
धर्म
फलटण में रहने वाले प्रतिमाधारी श्रावक के परिवार का लड़का दस साल से वेश्या के यहाँ रहता था, शादी के समय ताऊजी ने बुलाने का निर्णय किया, परिवार वालों ने आना-कानी की, फिर भी भाई पत्र देकर आया और बोला शादी में आना हो तो आ जाना, उसको गुस्सा आया तो मना कर दिया, अन्त में ताऊजी स्वयं वहाँ गये, नीचे खड़े होकर आवाज दी, लड़के की नींद खुली वहीं से झाँक कर देखा अरे! ताऊजी आये हैं, वह नीचे आया चरणों में माथा रखा, ताऊजी ने कहा! चलो बेटा घर में शादी है, उसने कहा ताऊजी! घर में सभी लोग तिरस्कार करेंगे, ताऊजी ने कहा बेटा! तुम्हारे विना शादी नहीं होगी और उसे घर ले आये, मन्दिर ले गए तिलक लगाया साथ में बैठकर भोजन कराया, शादी के बाद ताऊजी ने कहा! अब तुम जा सकते हो, तो वह चरणों में गिरकर रोने लगा, कि मैंने कुल को कलङ्कित किया, सबको कष्ट दिया, अब मुझे माफ़ करें, प्रायश्चित दें, उसने धीरे-धीरे व्रत धारण किये, मुनि बन गया, समाधि मरण किया, बोहरा गाँव में आज भी समाधि स्थल है, दर्शनार्थी आज भी दर्शन को जाते हैं।
धर्म
1978 में आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास जापान से एक दल आया, आचार्य श्री ने उन्हें एक पुस्तक दी उन्होंने पूँछा ये पुस्तक किस धर्म की है? आचार्य श्री ने कहा जैन धर्म की, उन्होंने कहा हम नौजवान हैं धर्म नहीं मानते, आचार्य श्री ने कहा! दुनिया में ऐसा कोई नहीं जो धर्म को न मानता हो, आप कैसे कह रहे हैं? तब आचार्य श्री ने कहा, आपके शिर में कोई लाठी मारे तो कैसा लगेगा, युवक बोला! बुरा लगेगा, और कोई पट्टी बाँधे तो कैसा लगेगा? युवक बोला! अच्छा लगेगा, आचार्य श्री बोले! बस यही तो अधर्म और धर्म है, तब युवक बोला कि धर्म ऐसा है तो हम मानते हैं, आचार्य श्री ने कहा धर्म विशाल है, मात्र विधि विधान को ही धर्म नहीं कहते हैं।
धर्म
जैसे बने तैसे अज्ञान रूपी अन्धकार को हटाकर जिनशासन का माहात्म्य फैलाना प्रभावना कहलाती है।
धर्म
रत्नत्रय की आराधना से निरन्तर आत्मा की प्रभावना करनी चाहिये एवं दान, तप, जिनपूजा और विद्या के अतिशय से जिनधर्म की प्रभावना करनी चाहिये।
धर्म
नाम की प्रभावना चाहने वाला आत्महित व धर्म की प्रभावना भी नहीं करता है।
धर्म
प्रभावक लोग धर्म के निर्मूल विध्वंस को सहन नहीं करते हैं, क्योंकि विना पाप के धर्म की प्रभावना सम्भव नहीं है।
धर्म
जिसमें हम दुनिया को आनन्द बाँटते हैं उसको कहते हैं त्यौहार, जो आत्मा को आनन्द देने वाला होता है उसे कहते हैं पर्व। त्यौहार में जोड़ना होता हैं और पर्व में छोड़ना होता है।
धर्म
पर्व तीन प्रकार के होते हैं- 1. अनादि निधन पर्व- दस लक्षण, सोलहकारण आदि, 2. घटनाविशेष से संबंधित पर्व- रक्षाबन्धन, अक्षय तृतीया आदि, 3. निमित्तविशेष से संबंधितपर्व- पञ्चकल्याणक आदि।
धर्म
संसार और मुक्ति के बीच मानव जीवन में साधना रूपी पर्व नहीं मनाया तो दीपावली जैसे अनेक पर्व निकल जायेंगे और अन्त में जीवन का दिवाला भी निकल जाएगा और हम कुछ भी नहीं कर पाएँगे।
धर्म
जैसे रोग किसी व्यक्ति विशेष को नहीं होता, दवाई किसी व्यक्ति विशेष के रोग को दूर नहीं करती, उसी प्रकार धर्म सभी के दुखों को दूर करता है।
धर्म
तीन तरह के धर्मात्मा- 1. जैसे पत्थर पानी को ग्रहण नहीं करता वैसे ही कुछ लोग धर्म को ग्रहण नहीं करते हैं, 2. जैसे मिट्टीपर जब तक पानी डालो तब तक कोमल रहती है, वैसे ही कुछ लोग जब तक उपदेश सुनते हैं तब तक कोमल रहते हैं, 3.जैसे रुई पानी को समाहित करके रखती है वैसे ही कुछ लोग धर्म को समाहित करके रखते हैं।
धर्म