Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Dharma

धर्म

423 सूत्र · पृष्ठ 6 / 6

वर्तमान में मुनि जिनालय में निवास करते हैं, जिससे श्रावकों के लिए धर्मोपदेश का दान हो जाता है।
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यदि मुनि घुटने तक जल में प्रवेश करें तो उसका प्रायश्चित्त एक कायोत्सर्ग है और घुटने से चार अङ्गुल ऊपर प्रवेश करें तो एक उपवास प्रायश्चित्त होता है, इसके आगे चार-चार अङ्गुल गहरे पानी में प्रवेश करने पर दूना-दूना प्रायश्चित्त होता है।
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प्रतिक्रमण- घर की सफाई प्रति दिन की जाती है फिर भी पक्ष आदि बीतने पर विशेष रूप से सफाई की जाती है वैसे ही प्रतिक्रमण भी प्रतिदिन किया जाता है पर पाक्षिक विशेष रूप से किया जाता है, जो साधु भाव प्रतिक्रमण से युक्त होकर और उसके अर्थ में मन लगाकर सदा प्रतिक्रमण सूत्र को पढ़ता है, वह कर्मों की महान निर्जरा करता है।
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प्रतिक्रमण विधान- आदिनाथ भगवान् व महावीर भगवान् के समय प्रतिदिन प्रतिक्रमण करने का विधान है, शेष बाईस तीर्थंकरों के समय सब व्रतों में आहार, विहार, दुःस्वप्न, ईर्यापथ आदि में दोष लगें तब प्रतिक्रमण करते थे, मध्यम तीर्थंकरों के समय शिष्यों के बुद्धिकौशल था, पराक्रम सुदृढ़ था, चित्त एकाग्र और स्वलक्ष्य में दृष्टि रहती थी, किन्तु प्रथम और ''अन्तिम तीर्थंकर के समय शिष्य अज्ञानी व चञ्चल चित्त हैं, अपने अपराधों की स्मृति नहीं रहती है, अतः सबका प्रतिक्रमण करते हैं''।
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मोक्ष के साधन में अनुपयोगी नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव का परमार्थ से सेवन नहीं करना चाहिए, परमार्थ से अर्थात् उपसर्ग आदि के कारण अयोग्य का सेवन होने पर भी प्रत्याख्यान में हानि नहीं होती है, शुद्धोपयोग में सहायक नामादि का सेवन मन को पवित्र करता और ''सदा अपराध की गन्ध से दूर रहने वाला साधु रत्नत्रय का आराधक होता है''।
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जैसे सूखे सरोवर से हंसों का समूह उड़ जाता है उसी प्रकार वैयावृति से रहित पुरूष के पास व्रतों का समूह नहीं ठहरता है।
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आठ प्रकार की मुक्ति- 1.मिथ्यात्व, 2.अंसयम, 3.प्रमाद, 4.स्थूल कषाय, 5.सूक्ष्मकषाय, 6.अज्ञान, 7.योग, 8.शरीर।
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त्रेपन भावों में से मोक्ष में तेतालीस भावों का अभाव एवं दस भावों का सद्भाव रहता है।
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तीनों कालों के समस्त संसारी जीवों के सुखों से अनन्तगुणा सुख सिद्धों को एक समय में होता है।
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सिद्ध परमात्मा द्रव्यकर्म भावकर्म नोकर्म मल से बाहर हैं, इस अपेक्षा से बहिरात्मा हैं और संसारी जीव अन्तरात्मा है।
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छः महीने आठ समय में छः सौ आठ जीव मोक्ष जाते हैं, अतः सुखियों की वृद्धि हो रही है एवं दुखियों की हानि हो रही है।
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जहाँ तक पटरी है वहीं तक ट्रेन जाती है, जहाँ तक पानी है वहीं तक मछली जाती है, इसी तरह जहाँ तक 'धर्मास्तिकाय' है वहीं तक सिद्ध परमात्मा जाते हैं।
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महावीर भगवान् के समवसरण में सात सौ केवली थे, वे सभी पञ्चमकाल में बासठ वर्ष के भीतर मोक्ष चले गये, तीन अनुबद्ध केवली, महावीर भगवान् के निर्वाण होने के बाद, गौतम स्वामी बारह वर्ष, सुधर्मा स्वामी बारह वर्ष जम्बूस्वामी अड़तीस वर्ष तक विहार करते रहे।
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क्षेत्र- सबसे कम लवण समुद्र से, उससे ज्यादा कालोदधि से उससे ज्यादा जम्बूद्वीप से उससे ज्यादा धातकीखण्ड से और सबसे ज्यादा पुष्करार्द्ध से सिद्ध हुये हैं।
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काल- भरत और ऐरावत में उत्सर्पिणी की अपेक्षा अवसर्पिणी काल में ज्यादा सिद्ध होते हैं।
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शुद्ध मनुष्य छठवे गुणस्थान से होते हैं, एकेन्द्रिय से असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक शुद्ध तिर्यञ्च होते हैं।
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समुद्घात- सभी केवली समुद्घात नहीं करते हैं, वर्ष पृथक्त्व में समुद्घात करने वालों की संख्या बीस होती है।
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यतिवृषभाचार्य- सभी केवली समुद्घात करते हैं, शेष अघातिया की स्थिति उसके विना बराबर नहीं होती है।
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तीर्थङ्कर के विहार में साढ़े बारह करोड़ बाजे बजते हैं और भगवान् चतुर्मुखी दिखते हैं पर चतुर्मुखी होते नहीं, होंगे तो समचतुरस्र संस्थान बिगड़ जायेगा।
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भगवान् की ऊँचाई से बारह गुना अशोक वृक्ष होता है अर्थात् पाँच सौ धनुष की काया वाले भगवान् के छः हजार धनुष ऊँचा वृक्ष होता है।
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समचतुरस्र संस्थान तीर्थङ्कर के होता है, इसलिये उनकी मूर्ति बनती है, शेष केवली छहों संस्थान वाले हो सकते हैं।
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चौदहवें गुणस्थान का काल वचनबल ऋद्धि वाले मुनि के उच्चारण से पाँच ह्रस्व अक्षर के बराबर होता है।
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जो संसार के दुःखों से निकालकर उत्तम सुख में पहुँचा दे, उसे धर्म कहते हैं।
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जघन्य भोगभूमि के काल में पल्य का आठवां भाग शेष रहने पर कुलकरों की उत्पत्ति हुयी थी, उन्होंने कर्मभूमि का परिचय कराया था, चौदहवें कुलकर नाभिराय के यहाँ प्रथम तीर्थंङ्कर सर्वार्थसिद्धि से पधारे थे।
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तेरह माह छः दिन व्यतीत हो गये थे, तब हस्तिनापुर के राजा श्रेयाँस को वैशाख शुक्ला द्वितीया के पिछले पहर में स्वप्न आया था, प्रातः काल मालूम हुआ कि आदिनाथ जी का चर्या हेतु नगर प्रवेश हो रहा है।
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शान्तिसागर जी ने दीक्षा के बाद आगम के अनुसार आहार लेने का नियम लिया था, चार दिन तक आहार नहीं मिला था, तब जनता ने उनके गुरू से पूँछ कर व्यवस्था बनायी थी, आदिनाथ जी के समय बताने वाला कोई नहीं था।
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वीरप्रभु के मोक्ष के बाद क्रमशः तीन केवली, पाँच श्रुतकेवली हुये जिनके नेतृत्व में जैन सङ्घ एक सौ बासठ वर्षों तक अविभाजित रहा।
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श्रावक श्रमण का सङ्घ वर्षा योग जिसमें ऊपर से बादल बरसते हैं, नीचे साधु देशना की वर्षा करते हैं, जिससे कई गुणी शीतलता हो जाती है।
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ठण्डी गर्मी में धनार्जन, वर्षा में धर्मार्जन, वर्षा में गली भवन धुलते हैं, वर्षा योग में दिल दिमाग धुलते हैं।
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शास्त्र पढ़ो, झुकना सीखो, श्रद्धा करो, आचरण में उतारो, आत्म कल्याण करो, पशुमय जिन्दगी से बाहर आकर प्रभुमय जिन्दगी व्यतीत करो।
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वर्षा योग की स्थापना प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी के दिन होती है यदि किसी कारण वश चातुर्मास स्थल पर नहीं पहुँच पाये तो पाँच दिन बाद तक वर्षायोग की स्थापना होती है अर्थात् श्रावण कृष्णा चतुर्थी तक हो सकती है।
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वर्षायोग की स्थापना के दिन उपवास होता है, भक्तियों का पाठ होता है। विशेष साधना का संकल्प होता है। चातुर्मासिक प्रतिक्रमण होता है।
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वर्षायोग निष्ठापन कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन होता है। इसके पूर्व चतुर्दशी को उपवास होता है, कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रातःकाल वर्षायोग निष्ठापन की भक्तियाँ होती है और वीर निर्वाण महोत्सव की भी भक्तियाँ होती है।
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कलिकाल है, मन चञ्चल है, शरीर अन्नादि का कीड़ा है, पर यह आश्चर्य है कि आज भी जिन लिङ्ग के धारी मनुष्य इस धरा पर हैं।
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जिन देशों में धर्म का उद्योत करने वाले दीपक तुल्य साधु नहीं होते, वहाँ धर्म का नाम भी नहीं होता, क्रिया कहाँ से होगी?
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व्रत ग्रहण करने वाला मुनि गुरु की बायीं ओर बैठता है तब गुरु व्रत धारण कराते हैं।
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वैशाख शुक्ला दशमी के दिन वीर जिन को केवलज्ञान हुआ था, गणधर के अभाव में देशना नहीं खिर रही थी, तब इन्द्र का आसन कम्पित हुआ, गणधर बनने योग्य व्यक्ति को इन्द्र ने अपने अवधि नेत्र से देखा, तब इन्द्रभूति गौतम के पास जाकर प्रश्न किया- तीन काल, छह द्रव्य, नौ पदार्थ, छह जीवनिकाय, छह लेश्या, पाँच अस्तिकाय, पाँच व्रत, पाँच समिति, चार गति, पाँच ज्ञान, पाँच चारित्र, ये जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे गए हैं, इनका जो श्रद्धान करता है वह सम्यग्दृष्टि होता है। इन्द्रभूति गौतम इनका उत्तर नहीं दे सके, अहङ्कार वश महावीर भगवान् के समवसरण में आये और मानस्तम्भ को देखकर सम्यक्त्व हो गया था।
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अहिंसा के 'अ' को हटाकर, सत्य के आगे जोड़ दिया, अचौर्य के अ' को ब्रम्हचर्य में जोड़ दिया, अपरिग्रह के अ' का लोप कर दिया और संसारी प्राणी पाँचों पापों में लग गये हैं।
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कल्पवासी के यहाँ घण्टा, ज्योतिष देव के सिंहनाद, भवनवासी देव के यहाँ शङ्खनाद, व्यन्तरों के यहाँ अनहद बाजे बजने लगे। जन्म कल्याणक के समय सौधर्मेन्द्र एक लाख योजन के ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर आता है। इन्द्र हजार हाथ, हजार पैर बनाकर ताण्डव नृत्य करता है एवं सुमेरूपर्वत पर आठ योजन गहरे, चार योजन चौड़े, एक योजन मुख वाले एक हजार आठ कलशों द्वारा क्षीरसागर के जल से अभिषेक करता है, बालक्रीडा के लिए देवों को नियुक्त करता है। इन्द्र ने जन्म के समय वीर और वर्धमान नाम रखे, सञ्जय-विजय मुनि का सन्देह दूर हुआ तो सन्मति नाम रखा, सङ्गम देव ने सर्प बनकर परीक्षा ली निर्भय रहे तो महावीर नाम रखा। भोजन-वस्त्र, वाहन सभी स्वर्ग से आते थे, तीर्थंङ्कर सत्ताईस लड़ी का हार पहनते हैं, जो चक्रवर्ती की सारी सम्पदा से भी अधिक कीमती होता है। आठ वर्ष में अप्रत्याख्यानावरण कषाय का क्षयोपशम हो जाता है जिससे वे देशव्रती हो जाते हैं, माँ ने आग्रह किया पुत्रवधु को देखना है, वीर ने कहा मुक्ति वधु का वरण करना है। मित्रों से पिता ने कहा वर्धमान नीचे है, माँ ने कहा ऊपर हैं, तब वीर ने बच्चों को अनेकान्त से समझाया कि बीच में होने से पिता की अपेक्षा नीचे माँ की अपेक्षा ऊपर है। तीस वर्ष में वैराग्य हो गया, लौकान्तिक देवों ने आकर वैराग्य की अनुमोदना की। चन्द्रप्रभ पालकी पर आरूढ़ हो षण्डवन में चले गये, एक बार उज्जयिनी के श्मशान में प्रतिमा योग धारण किया, तब महादेव रूद्र के द्वारा घोर उपसर्ग होने पर भी अचल रहे, तब अतिवीर नाम रखा गया था। राजा चेटक की बेटी 'चन्दना' (महावीर की छोटी मौसी) के यहाँ आहार हुआ, पञ्चाश्चर्य हुए, बारह वर्ष घोर तप कर अन्त में जृम्भिका ग्राम में ऋजुकूला नदी के तट पर वैशाख शुक्ला दशमी को केवलज्ञान हुआ।
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छियासठ दिन तक गणधर के अभाव में देशना नहीं हुयी, भगवान् महावीर को केवलज्ञान होने के पैंसठ दिन बाद, आज गौतम गणधर ने वीर प्रभु का शिष्यत्व स्वीकार किया था, इसलिए वीर शासन जयन्ती पर्व महावीर प्रभु की देशना से प्रारम्भ हुआ।
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हम दो हमारे दो के स्थान पर, देश और समाज होना चाहिये, अतः धर्म की रक्षा के लिये इन दो की जरूरत है।
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सिद्धों को, अर्हन्तों को और मुनियों को बार-बार नमस्कार करके आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी कहते हैं कि यदि दुःखों से छुटकारा चाहते हो तो मुनिपने को अङ्गीकार करो।
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आठ दर्शन, आठ ज्ञान, तेरह चारित्र, बारह तप मिलकर इकतालीस प्रकार की आराधना कहलाती है।
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भगवान् ने संसार के चार मार्ग पार कर पञ्चम गति को प्राप्त किया है।
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राष्ट्रीय, सामाजिक, आध्यात्मिक के भेद से त्यौहार तीन प्रकार के होते हैं। स्वतन्त्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस ये राष्ट्रीय त्यौहार हैं। जो समाज को वात्सल्य, सद् व्यवहार, नैतिकता, धार्मिक आचरण की ओर ले जायें उन्हें सामाजिक त्यौहार कहते हैं। दशलक्षण, आष्टान्हिक आदि अध्यात्मिक पर्व हैं।
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मान्यताएँ भले ही अलग-अलग हैं पर दीपावली पर्व सभी जाति के लोग मनाते हैं- प्रथम मान्यता- जैन परम्परा में प्रत्यूष बेला में महावीर भगवान् को निर्वाण प्राप्त हुआ था, उसके उपलक्ष्य में लड्डू चढ़ाते हैं, उसी दिन शाम को गौतम गणधर को केवलज्ञान हुआ था, इस कारण दीप प्रज्वलित करते हैं। द्वितीय मान्यता- हिन्दु परम्परा में रावण का वध करके रामचन्द्र जी अयोध्या लौटे थे, जनता को इच्छित राजा प्राप्त हुआ था, इसलिये दीप जलाते हैं। तृतीय मान्यता- आज कृष्ण जी ने नरकासुर का वध किया था और हजारों लोगों को उसके चङ्गुल से मुक्त किया था, इसलिए दीप जलाते हैं। चतुर्थ मान्यता- इस दिन समुद्र मन्थन हुआ जिससे लक्ष्मी जी प्रकट हुयी थीं, इसलिये देवताओं ने लक्ष्मी जी की पूजा की थी। पञ्चम मान्यता- सिक्खों के अनुसार उनके छठवें गुरू हरगोविन्ददास जी ने जेल से मुक्ति पायी थी।
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भगवान् पार्श्वनाथ जी वैशाख कृष्णा दूज के दिन प्राणत स्वर्ग से वाराणसी में राजा अश्वसेन-वामादेवी के गर्भ में आये, उग्रवंश में पौष कृष्णा ग्यारस को जन्म हुआ, इन्द्र ने अपने वैभव के साथ आकर पाण्डुक शिला पर अभिषेक किया, पौष कृष्णा ग्यारस पौर्वाण्ह बेला में दीक्षा ली, विमला पालकी से वन में पधारे, देवदारू वृक्ष के नीचे दो उपवास के साथ दीक्षा ली, साथ में तीन सौ राजा दीक्षित हुये, धन्यराजा के यहाँ क्षीरान्न का प्रथम आहार हुआ, धव वृक्ष के नीचे चैत्र कृष्णा त्रयोदशी को केवलज्ञान हुआ, सवा योजन का समवसरण, दस गणधर, प्रथम गणधर स्वयम्भू, प्रथम आर्यिका सुलोका, एक लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकाएँ, मुख्य श्रोता महासेन, श्रावण शुक्ला सप्तमी को स्वर्णभद्र कूट सम्मेदशिखर जी से छत्तीस मुनिराजों के साथ एक माह तक योग निरोध कर खड्गासन से मोक्ष पधारे थे।
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मयूर कार्तिक माह में पङ्ख स्वयं छोड़ता है, अतः साधु कार्तिक माह में नये पङ्ख ग्रहण करते हैं, पुराने छोड़ देते हैं।
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