Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

दीपक में जब तक स्नेह/तेल रहता है तब तक उसे जलना पड़ता है और जब स्नेह/तेल समाप्त हो जाता है तब वह निर्वाण को प्राप्त हो जाता है-बुझ जाता है, इसी प्रकार संसारी जीव स्नेह-प्रीति के कारण दुःखी होता है और प्रीति त्यागकर निर्वाण-मोक्ष को प्राप्त होता है। स्नेह रहित को इष्टवियोग और अनिष्ट संयोग से उत्पन्न दुःख नहीं होता।

As long as there is oil (also 'affection') in a lamp, it must keep burning, and when the oil is spent it attains nirvana—it goes out; likewise a worldly soul suffers because of affection and attachment, and by renouncing attachment attains liberation. One free of affection feels no sorrow from separation from the loved or union with the unloved.

— आराध्य सूत्र · #732

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति