Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

जैसे बहुत समय से दुर्गन्धित मल-मूत्र वाले घड़े से दुर्गन्ध नहीं छूटती, वैसे ही सम्यक्त्व रूपी जल से धोने पर भी ज्ञानामृत से पूर्ण होने पर भी अनादिकालीन दुर्वासना आसानी से नहीं छूटती है। जैसे खोटे बर्तन में खीर सुरक्षित नहीं रहती वैसे ही विषय-कषाय से खट्टी आत्मा में जिनवाणी नहीं रहती। विषयों में प्रवृत्ति भूल से नहीं राग से होती है।

Just as a pot long foul with filth does not lose its stench, so beginningless craving is not easily removed even when washed with the water of right faith and filled with the nectar of knowledge. Just as pudding does not keep in a defective vessel, the Jina's teaching does not stay in a soul soured by sense-passions. Engagement in sense-objects arises not from mistake but from attachment.

— आराध्य सूत्र · #712

इसी विषय के और सूत्र

सभी अनासक्ति →
किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति