Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 2 / 41

मन्त्र जाप के चार भेद हैं– १. बैखरी–जोर से बोलकर जाप करना, इसमें शब्द बाहर बिखर जाते हैं, इससे पच्चीस प्रतिशत लाभ होता है। २. मध्यमा–इसमें ओठ नहीं हिलते हैं जीभ हिलती है, इसे उपांशु भी कहते हैं। ३. पश्यन्ति–इसमें होठ और जीभ दोनों नहीं हिलते हैं, मन में चिन्तन होता है। ४. सूक्ष्म–मन से णमोकार भी छूट जाता है, उपास्य-उपासक आत्मा-परमात्मा का भेद समाप्त हो जाता है।
णमोकार
जिस प्रकार जल में असीम शक्ति है, एक लोटा पानी में विद्युत शक्ति का पता नहीं लगता, जब वह एकत्र होकर सरोवरों में पहुँचता है तो उसमें असीम शक्ति प्रकट हो जाती है, उससे कई मेगावाट बिजली बनने लगती है, जिससे बड़ी-बड़ी मशीने व रेल आदि चलने लगती हैं, बिजली की शक्ति उसमें छिपी है, इसी प्रकार मन की बिखरी शक्ति ध्यान से एकत्र होती है।
ध्यान
मणि, मन्त्र और औषधि में अचिन्त्य प्रभाव होता है, वनस्पति से बनी एक छोटी सी गोली व्यक्ति को जीवन दान दे देती है, मन्त्र में भी विद्युत की तरह शक्ति है, एक मन्त्र से व्यक्ति भस्म हो सकता है, शब्द की भी शक्ति होती है, जैसे–रेडिओ, टेलीविजन पर शब्द सुनते हैं, प्रचण्ड ध्वनि से इमारतें हिल जाती हैं, एक खेत में रसायन से सोलह किलो ककड़ी उत्पन्न की एवं मन्त्र से चालीस किलो ककड़ी उत्पन्न हुई।
णमोकार
मन्त्र जाप से शरीर और मन पर रक्षा कवच बन जाता है, बुरी शक्ति अनिष्ट नहीं कर सकती हैं। मन्त्र के प्रभाव से सोमासती के लिए सर्प भी माला बना, सुदर्शन की सूली सिंहासन बन गयी। पैंतीस अक्षर वाला णमोकार ३+५=८ आठ कर्मों का नाश करने वाला है।
णमोकार
श्रीपाल जी का कुष्ठ महामन्त्र के प्रभाव से दूर हुआ था, क्षुद्र देवों द्वारा कीलित पाँच सौ जहाज णमोकार के प्रभाव से चले थे, समुद्र में गिरने पर णमोकार के प्रभाव से जीवित बचे थे, बहुत समय से बन्द सहस्रकूट जिनालय के द्वार णमोकार के प्रभाव से खुले थे।
णमोकार
घटना जखौरा की है–एक मुसलमान भाई ने णमोकार मन्त्र के सहारे अनेक लोगों की विपत्तियाँ दूर कीं, वह सामायिक भी करता था, एक बार पलंग पर लेटा था, थोड़ी देर बाद सपना आया कि तेरे पलंग में सर्प है, उठकर दो-तीन बार ऊपर-नीचे देखा कहीं नहीं दिखा, पुनः णमोकार मन्त्र पढ़कर सो गया, प्रातः बिस्तर लपेटा बिस्तर में से सर्प निकल कर बाहर चला गया, उसका कुछ नहीं हुआ, यह मन्त्र का प्रभाव था, गाँव के मुस्लिम भाइयों को पता चला यह जैन धर्म मानता है, पञ्चायत बुलाई, भला-बुरा कहा, वह सब कुछ सुनता रहा, पर जैनधर्म छोड़ने को तैयार नहीं हुआ, जाति भाइयों ने उसे मार डालने का निर्णय लिया, जिससे दूसरा धर्म ग्रहण नहीं कर सके, सामायिक में बैठा विरोधियों ने वहाँ सर्प छोड़ दिया, वह चारों ओर घूमता रहा उसका कुछ नहीं हुआ, तीन दिन बाद सर्प छोड़ने वाले को ही सर्प ने डँस लिया, वह मर गया, दो दिन बाद उसके पिता को भी काटा, वह भी मर गया, यह था मन्त्र का प्रभाव।
णमोकार
अमेरिका में एक मुसलमान को णमोकार मन्त्र मिल गया, वह मन्त्र से ताबीज बनाता था, सौ डॉलर में बेचता था।
णमोकार
मन्त्र छोटा होता है, ग्रन्थ की तरह बड़ा नहीं होता, हीरा छोटा होता है, चट्टान की तरह बड़ा नहीं होता पर बड़ी चट्टान को काट देता है, अंकुश छोटा होता है पर मदोन्मत्त हाथी को वश में करता है, वट का बीज भी छोटा होता है पर विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है, इसी तरह णमोकार मन्त्र वट के बीज की तरह महान् फल देने वाला है।
णमोकार
वनमाला और लक्ष्मण का संवाद आगम सम्मत– लक्ष्मण ने कहा! ''मुझे छोड़ दो'' कार्य हो जाने पर मैं तुम्हें लेने आऊँगा, मुझे देव आदि की शपथ है, लेकिन वनमाला को उनके आने में संदेह हुआ, तब लक्ष्मण ने कहा कि, सुनो यदि मैं न आऊँ तो मुझे रात्रि भोजन का पाप लगे। (धर्म संग्रह श्राव. अधिकार-३] श्लोक २८/२९) रामचन्द्र जी को अच्छी तरह व्यवस्थित करके यदि मैं तुम्हारे पास न आऊँ तो मुझे (लक्ष्मण को) गौ हत्या, स्त्री हत्या आदि का पाप लगे। इस प्रकार अन्य शपथों के करने पर भी वनमाला ने लक्ष्मण से एक ही शपथ करायी कि आपको रात्रिभोजन का पाप लगे।
आहार
वर्षा ऋतु में जो रात्रिभोजन करता है उसकी सैकड़ों चन्द्रायण व्रतों से भी शुद्धि नहीं हो सकती है। कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कला की तरह एक-एक ग्रास घटाना शुक्ल पक्ष में एक-एक ग्रास बढ़ाना इस प्रकार एक माह में एक चन्द्रायण व्रत होता है। ''सूर्य के अस्त हो जाने से हृदय और नाभि में स्थित कमल भी बंद हो जाता है इसलिए रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।''
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुँआ जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य संसार में असह्य प्रताप से युक्त, नगरों के स्वामी, नाना प्रकार के वाहनों से सहित, सामन्तों से पूजित, भवनवासी देव, वैमानिक देव, चक्रवर्ती के वैभव से सहित और महान्-उत्कृष्ट लक्षणों से सम्पन्न होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य उन नगरियों में ऐसे विद्याधर राजा होते हैं, जो कलाओं में निपुण हैं, जिनके शरीर और नेत्र हृदय में स्नेह उत्पन्न करने वाले हैं, जो अमृतस्रावी वाणी से समस्त जगत् को आह्लादित करते हैं तथा उत्साह से युक्त होते हैं, दिन में भोजन करने से मनुष्य नारायण, बलदेव, चक्रवर्ती, बिजली और लाल कमल के समान कान्ति वाले दैदीप्यमान, सुन्दर कुण्डलों से युक्त एवं राजाओं से सम्बन्ध करने वाले होते हैं।
आहार
जिन्होंने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया था, वे स्त्रियाँ यान तथा हाथी आदि वाहनों पर लीलापूर्वक गमन करती हैं और सुन्दर भवनों में निवास करती हैं, वे स्त्रियाँ स्वर्ग में इच्छानुकूल भोगों को प्राप्त होती हैं तथा मस्तक पर हाथ रख आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाले परिवार से घिरी रहती हैं।
आहार
रात्रि में भोजन करने से स्त्रियाँ अनाथ सौभाग्यहीन, माता-पिता तथा भाई से रहित, शोक एवं दरिद्रता से युक्त होती हैं, जिनके हाथ-पैर आदि अंग रूक्ष तथा फटे हुए हैं, जिनकी नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि को उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़ से भरे हैं, जिनके लक्षण दुष्ट हैं, जिनके शरीर से दुर्गन्ध आती है, जिनके होठ कटे तथा मोटे हैं, जिनके कान विरूप है, जिनके केश पीले तथा रूक्ष हैं, जिनके दाँत तूमड़ी के बीज के समान हैं, शरीर सूखा हैं, जो कानी, लंगड़ी और कान्ति रहित हैं, विरूप हैं, कठोर चमड़ी वाली हैं, अनेक रोगों से सहित हैं, मलिन हैं, फटे वस्त्र वाली हैं खराब भोजन से जीवित हैं, दूसरों के कार्य पर आश्रित हैं, दुःखों के भार से दबी हुई हैं, बालावस्था में ही वैधव्य
आहार
रात्रिभोजन के पाप से जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं, लोक में जो रोगी, दरिद्र और क्रूर पुरुष दिखाई देते हैं, वे भी रात्रिभोजन के पाप से दिखाई देते हैं, जिनके हाथ पैर फटे हैं, जो दीन हैं, लकड़ी और घास ढोते हैं, मलिन वस्त्र वाले हैं तथा नीच कुल में उत्पन्न हैं, वे सब रात्रिभोजन करने से ही होते हैं, रात्रिभोजन के फल से मनुष्य रोग से पीड़ित, दूसरों के घरेलू नौकर तथा अपने बन्धुजनों से रहित होते हैं, रात्रि में भोजन करने वाला मिथ्यादृष्टि मनुष्य सूकर, भेड़िया, बिलाव, उल्लू तथा कौआ आदि की योनियों में उत्पन्न होता है।
आहार
जो रात्रिभोजन करता है, वह डाकिनी–शाकिनी तथा भूत–प्रेतादि निन्द्य प्राणियों के साथ खाता है। जो रात्रि में खाता है उसने कुत्ता, चूहा, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवों के साथ खाया अथवा व्यर्थ के विस्तार से क्या? इतना ही कहा जाता है कि रात्रि में खाने वाले ने सब अपवित्र पदार्थ खाये, रात्रि में दीपकों के ऊपर जो पिपीलिका आदि जीव पड़ते हैं, रात्रि में खाने वाले पुरुष ग्रासों के साथ उन्हें भी निगल जाते हैं।
आहार
एक बार रात्रि में लाइट में भोजन बना, खाने बैठा तो लाइट चली गयी, उसने सोचा उजाले में तो बनाया, अब अंधेरे में खाने से क्या बाधा है, इसलिए जिसे वह अचार समझकर खा रहा था इतने में लाइट आ गयी देखा तो वह मेंढक था। इसी प्रकार बारात में रात्रि में खीर बनी, उसमें एक छिपकली गिर गयी थी, उसी खीर को खाने से अनेकों की मौत हो गयी, रात में नहीं खाने वाले जिनकी हंसी उड़ाई जा रही थी केवल वे ही बचे थे।
आहार
एक व्यक्ति को मग से बिना देखे, बिना छना पानी पीने से, कुछ दिनों में पेट में तकलीफ होने लगी, तो एक्सरे करवाया डॉक्टर ने उपवास करने के लिए कहा–उसने कहा हम तो एक घंटे भी भूखे नहीं रह सकते, डॉक्टर ने कहा स्वस्थ होना है, तो उपवास करना ही होगा उसने जिस किसी तरह उपवास किया दूसरे दिन दस–पाँच चने के दाने खाने को दिए, जब चने की धंध पेट में पहुँची तो उल्टी की इच्छा हुई, डॉक्टर ने कहा उल्टी कर दो, उल्टी की तो साँप का बच्चा निकला यह अनछना पानी पीने का परिणाम था।
अहिंसा
जैसे बालक हर अवस्था में माँ को ही पुकारता है, ऐसे ही आप हर अवस्था में भगवान् को पुकारो। जो मन की शान्ति व संतोष पा लेता है, वही असल में जीवन जीता है, वही संग्राम विजयी है। फिर उसके पास मोटर, घर, धन-सम्पदा हो या न हो लेकिन यदि मन की शान्ति न रही तो सारे सुख-वैभव के बावजूद भी वह मनुष्य सुखहीन है।
संतोष
मारना चाहते हो तो बुरी इच्छाओं को मारो, जीतना चाहते हो तो तृष्णाओं को जीतो, खाना चाहते हो तो गुस्से को खाओ, लेना चाहते हो तो प्रभु का नाम लो, बोलना चाहते हो तो मीठे वचन बोलो, छोड़ना चाहते हो तो पाप और अत्याचार को छोड़ो, पहनना चाहते हो तो नेकी का जामा पहनो, देखना चाहते हो तो अपने दुर्गुण देखो कल्याण हो जाएगा।
संयम
जब त्यागी हुए तब आत्म कल्याण के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य का लक्ष्य नहीं बनाओ। लोग तो उद्धार, परोपकार और शुभोपयोग आदि शब्द कहकर राग की आग लगाकर अलग ही रहते हैं, जलना पड़ता है तुम्हें।
अनासक्ति
तुम कुछ बाह्य उपक्रम मत करो, बस इतना ही तो होगा की कोई तुम्हें जानेगा नहीं। सो परिचय उपक्रम में भी कोई तुम्हें जानता नहीं है बाह्य शरीर से परिचय हो जाने पर भी तुम्हें कुछ मिलता नहीं अथवा मिलता है तो विकल्पों का क्लेश/जानने वाले भी विनाशीक है, न जाना तो क्या? तुम तो तुम ही हो अपने में लीन होओ और अनंत सुखी होओ।
ज्ञान
मुझे लाभ नहीं, जो जनता मेरे समीप आवे, मुझे लाभ नहीं जो उपकार के कोई गुण गावे। कोई क्या कहेगा? यही तो कहेगा कि उपदेश दिये, इनका अच्छा प्रभाव है आदि। सोचो, जो पर पदार्थ के कर्तापन की बात लादे, वह ज्ञानियों की दृष्टि में सम्मान है या अपमान?
विनम्रता
गृहस्थों के चक्र में न पड़ना तथा निरपेक्ष त्यागी रहना, पत्थर पर सोना पर चटाई न माँगना, लँगोटी न मिले तो द्रव्य मुनि ही बन जाना, पर लगोटी न माँगना, सूखी रोटी मिल जावे तो खा लेना, पर घी की इच्छा न करना आदि, आत्म निर्मलता में ही तुम्हारा कल्याण है।
संयम
इच्छा करना अपनी आत्मा को दुःखी करना है। जिसकी इच्छा की जाती है उसका परिणमन उसके होनहार से होता है इच्छा से अपना बिगाड़ करने के अलावा और कुछ नहीं होता। कदाचित् इच्छा के अनुकूल उसी की होनहार से कुछ हो भी जावे तो भी राग रूपी कीचड़ लपेट देने के सिवाय आत्मा को और क्या मिल जाता है?
अनासक्ति
जगत् में केवल रोने वाले ही पापी नहीं है किन्तु हँसने वाले भी पापी समझिए क्योंकि जैसे उनके अरति शोक मोहनीय पाप का उदय है, इनके भी हास्य, रति, मोहनीय पाप का उदय है, पुण्यात्मा तो वे हैं, जिनकी रुचि परमात्मा या निज शुद्धात्मा में है।
कर्म
हे आत्मन्! तूने अनन्त भव बिता दिये, जिनमें विविध भोग भोगे, अब यह भव बिना भोग के ही सही, फिर बिना अहंकार ममकार का ही सही फिर तू अनन्तकाल सुख भोगेगा, दुःख की छाया भी न रहेगी।
अनासक्ति
पत्थर पर कितनी टाँकियों की चोट लगती है, यदि टाँकियों की चोट सहले तो पूज्य मूर्ति बन जाती है यदि टाँकी की चोट न सह सके और भग्न हो जावे तो वह पत्थर भी किसी काम का नहीं रहता इसी प्रकार नाना विपदाओं का सहन हो जावे तो आत्मा महात्मा बन जाता है, यदि न सह सके तो संसारी बन जाता है।
पुरुषार्थ
भगवान् को मन्दिर में सुमन न चढ़ाओ तो चलेगा पर अपने सु-मन को भगवान् की भक्ति में नहीं लगाओगे तो नहीं चलेगा। अरे भाई! जब कुरूप, निर्धन, अपंग को राज कन्या वरमाला नहीं डालती तो फिर कुरूप मन अर्थात् अशुद्ध मन वाले को मुक्ति लक्ष्मी कैसे वरमाला डालेगी।
भक्ति