Jain Quotes

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कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 1 / 41

धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति
णमोकारमन्त्र के एक अक्षर का भी भक्ति पूर्वक नाम लेने से सात सागर के पाप कट जाते हैं, पाँच अक्षरों का उच्चारण करने से पचास सागर के पाप कट जाते हैं तथा पूर्ण मन्त्र का उच्चारण करने से पाँच सौ सागर के पाप कट जाते हैं। सागर का दृष्टान्त– १. सुमेरु पर्वत पर कोई चिड़िया आकर चोंच घिसे और सौ-सौ वर्ष बाद पुनः आ-आकर चिड़िया एक-एक बार चोंच घिसे ऐसा करने पर जितने समय में सुमेरु पर्वत पूरा घिस जाये उससे भी बड़ा एक सागर का काल होता है। २. समुद्र के एक ओर जुआँरी डाली जाए और दूसरी ओर से सेल डाला जाये, जितने समय में लहराते-लहराते जुआँरी सेल में अपने आप घुस जाये उससे भी बड़ा एक सागर का काल होता है।
णमोकार
जिन्होंने पञ्चपरमेष्ठियों के नाम से उत्पन्न समस्त विघ्नों को हरने वाले एवं नित्य ऐश्वर्य के साधक नमस्कार मन्त्र का पूर्व में जाप किया था अथवा जो त्रिशुद्धिपूर्वक निरन्तर वर्तमान में उनका जाप करते हैं, वे ज्ञानवान् अतिशय धार्मिक पुरुष 'परलोक में त्रिलोकीनाथ' अवश्य होवेंगे।
णमोकार
जो भव्य प्राणी उठते समय, गिरते समय, विश्राम करते समय, शयन के समय, जाग्रत होने के समय, श्मसान एवं वन में, भय के अवसर पर, विकट मार्ग में, नूतन गृह प्रवेश में, हर कार्य में णमोकारमन्त्र का स्मरण करता है, उसके समस्त विघ्न दूर होकर इच्छित कार्य की सिद्धि नियम से होती है।
णमोकार
मन का ३३ प्रतिशत, वचन का ३३ प्रतिशत और काय का ३३ प्रतिशत पुण्य मिलता है, अगर जाप में मन नहीं लगता तो वचन और काय का ६६ प्रतिशत पुण्य मिलता है और संस्कार वश अँगुली चल रही है तो काय का ३३ प्रतिशत पुण्य मिलता है और ३३ प्रतिशत में विद्यार्थी उत्तीर्ण माना जाता है।
णमोकार
अर्हन्त, सिद्ध के समान आत्मा का चिन्तन करना पिण्डस्थ ध्यान कहलाता है, मन्त्र वाक्यों का ध्यान करना पदस्थ ध्यान कहलाता है, अर्हन्त का ध्यान करना रूपस्थ ध्यान कहलाता है और सिद्धों का ध्यान करना रूपातीत ध्यान कहलाता है।
ध्यान
घर में जाप करने से जितना पुण्य होता है, उसकी अपेक्षा वन में जाप करने पर सौ गुना ज्यादा पुण्य प्राप्त होता है, उसकी अपेक्षा पवित्र बगीचे एवं घने जंगल में जाप करने से हजार गुना ज्यादा लाभ होता है, उसकी अपेक्षा पर्वत पर दस हजार गुना ज्यादा लाभ होता है, उसकी अपेक्षा नदी किनारे जाप करने से लाख गुना ज्यादा लाभ होता है उसकी अपेक्षा जिनालय में करोड़ गुना ज्यादा लाभ होता है एवं भगवान् के निकट जाप करने से अनन्त गुना ज्यादा लाभ प्राप्त होता है, मुख्य रूप से जितनी श्रद्धा, विशुद्धि और एकाग्रता है उतना फल मिलता है।
णमोकार
हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति
पञ्च नमस्कार रूपी पूज्य देवता मेरी रक्षा करें, जो सुर सम्पदा को प्रदान करता है, मुक्ति लक्ष्मी को प्राप्त कराता है, चारों गतियों की विपदाओं को दूर करता है, आत्मा से पापों को दूर करता है, दुर्गति मे जाने वालों के लिए स्तम्भ के समान रोकता है और मोह को भी नष्ट करता है।
णमोकार
कदाचित् विष खाकर मरने वाला व्यक्ति यदि तत्काल सद्बुद्धि आ जाने से पश्चाताप करके पञ्च नमस्कार मन्त्र का जप करते हुए प्राण छोड़ता है, तो वह अपनी गलती का प्रतिकार कर लेता है, एवं अनन्त दुःख का भागी नहीं होता है।
णमोकार
णमोकार के स्मरण से– १. साता वेदनीय आदि पुण्य प्रकृतियों का बहुतायत से बन्ध होता है। २. जो पुण्य प्रकृतियाँ उदय में आने वाली हैं, उनमें अनुभाग वृद्धि होती है। ३. बंधे हुए पाप कर्मों की स्थिति-अनुभाग की हानि होती है। ४. नवीन पाप का बन्ध रुकता है। ये चार फल प्राप्त होते हैं।
णमोकार
जिस प्रकार महाव्रतों में ब्रह्मचर्य उत्कृष्ट है, मन्त्रों में कर्म को जीतने वाला णमोकारमन्त्र श्रेष्ठ है। अन्य मन्त्रों के फलदायक होने पर भी यही मन्त्र सेवनीय है क्योंकि यद्यपि वृक्ष अग्रभाग में फल देता है तथापि इसकी जड़ ही सींची जाती है अर्थात् यह मन्त्र सब मन्त्रों का मूल है तथा समस्त मंगलों में पहला मंगल है।
णमोकार
दुनिया माल वाले के पीछे घूमती है, पर प्रभु माला वाले के साथ होते हैं, साधक माला के लिए और संसारी माल के लिए बड़ा महत्त्व देता है, माला मालिक की प्रार्थना है नोट गिनने के लिए भी दो अँगुली ही चाहिए, फिर माला क्यों नहीं फेरते भाई, वरमाला के लिए जैसे उत्सुक रहते हैं, वैसे ही यदि करमाला के लिए उत्सुक रहें, तो मुक्ति वधु भी माला डालने को तैयार हो जाये, माला से ही व्यक्ति माला-माल होता है।
णमोकार
आश्चर्य की बात नहीं है कि मन्त्र की शक्ति से इस जगत् में धर्मात्माओं पर आई हुई समस्त विपदाएँ सम्पदा रूप हो जाती हैं और दुःख सुःख रूप परिणत हो जाते हैं। सप्त व्यसनों में आसक्त अञ्जन चोर आदि तथा क्रूर परिणाम वाले जो तिर्यञ्च थे, वे भी मृत्यु के समय इस मन्त्र को प्राप्त कर स्वर्ग और मोक्ष को प्राप्त हुए थे।
णमोकार
ग्वाले ने मुनि के दर्शन कर णमोकार मन्त्र पढ़ने का नियम ले लिया, घर आया पत्नी ने प्रश्न किया तो उसने णमोकार मन्त्र ही पढ़ा, दो चार बार पत्नी ने कुछ पूछा ग्वाले ने हर बार णमोकार मन्त्र ही पढ़ा, पत्नी ने गुस्से में आकर जलती हुई लकड़ी मार दी, णमोकार मन्त्र के प्रभाव से सारे अंगारे मोती बन गये थे।
णमोकार
सुभग ग्वाले ने मुनि से णमोकार मंत्र पढ़ने का नियम लिया था अगले भव में सेठ सुदर्शन बने एवं पटना गुलजार बाग से मोक्ष पधारे। इनकी कथा पुण्यास्रव कथाकोश क्र.१७ पृ. ८९ पर देखें।
णमोकार
यह मन्त्रराज ज्ञानावरणादि कर्मसमूह को दूर करने वाला है, भव-भ्रमण का नाशक है, स्वर्ग और निर्वाणपुरी को प्राप्त कराने वाला है, भव्य जीवों के विघ्नों का निवारक है, मोहरूप सघन अन्धे गड्ढे में पतित जीवों को हस्तावलम्बन देने वाला है, प्राणिमात्र को जीवन दान देने वाला है, ऐसा यह मन्त्र समस्त त्रस व स्थावर जीवों की रक्षा करे।
णमोकार
णमोकार मन्त्र के प्रभाव से चन्द्रमा सूर्यरूप, सूर्य चन्द्रमारूप, पाताल आकाशरूप और समस्त पृथ्वी स्वर्गरूप हो जाती है, अधिक कहने से क्या ? तीनों लोकों में जो-जो विषम स्थितियाँ हैं वे सभी अनुकूल हो जाती हैं।
णमोकार
संसार-शरीर-भोगों से विरक्त साधुजन भी मन्त्रराज के जाप के बिना मुक्ति को नहीं प्राप्त कर सकते, तब दीन संसारीजन तीनों लोकों के जीवों का उद्धार करने वाले मन्त्रराज के जाप के बिना कैसे स्वर्ग/मोक्ष के सुखों को प्राप्त कर सकते हैं ?
णमोकार
इस लोक में हिंसक, असत्यभाषी, परधनहर्ता, परस्त्रीरत इत्यादि तथा अन्य भी अनेक लोक निन्दित कुकर्म में रत रहने वाले प्राणिगण मरणकाल में श्रद्धापूर्वक मन्त्रराज के जाप के प्रभाव से अपने दुष्कर्म की निन्दा करके स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।
णमोकार
इस मन्त्रराज की अधिक प्रशंसा क्या करें ? यह णमोकारमन्त्र कल्याणकारी धर्मरूप है, आराधने योग्य जिनदेव रूप है, स्वर्ग/मोक्ष सुखदायी व्रत रूप है, अतः प्रत्येक प्राणी को इस मन्त्रराज की नित्य उपासना करनी चाहिए।
णमोकार
प्रत्येक प्राणी को शयन से पहले, जागने के बाद, किसी स्थान पर निवास करते समय, गमन के अवसर पर, गृहप्रवेश के समय, यहाँ-वहाँ भ्रमण के अवसर पर, आमोद-प्रमोद के अवसर पर, वन प्रवेश के समय, पर्वत पर चढ़ते-उतरते समय, समुद्र से पार होने के अवसर पर इत्यादि अवसरों पर मन्त्रराज का जाप अवश्य करना चाहिए।
णमोकार
यह णमोकार मन्त्र संसार में सारभूत है, तीनों जगत् में अनुपम है, समस्त पापों का शत्रु है, संसार को नष्ट करने वाला है, विषम विष को हरने वाला है, कर्मों को निर्मूल करने वाला है, सिद्धि को देने वाला है, मोक्षसुख को उत्पन्न करने वाला है, केवलज्ञान को उत्पन्न करने वाला है, हे भव्यजनों ! इस मन्त्र का बार-बार जाप करो क्योंकि जपा हुआ यह मन्त्र संसार से निर्वाण प्राप्त कराने वाला है।
णमोकार
जिस प्रकार सूर्य के द्वारा अन्धकार नष्ट हो जाता हैं, उसी प्रकार मन्त्र के ध्यान से बुद्धिमान पुरुषों के सैकड़ों अनिष्ट करने वाले बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं, मन्त्र लाखों करोड़ों मील दूर स्थित वस्तु और व्यक्ति को भी प्रभावित करता है।
णमोकार
इस जगत् में जो कुछ भी दुःसाध्य, दूरवर्ती अथवा अत्यन्त दुर्लभ वस्तु है, वह सब इस मन्त्रराज का ध्यान करने वाले मनुष्यों के हाथ में शीघ्र ही आ जाती है, मन्त्र की सिद्धि पुण्य, साहस और मन की एकाग्रता से होती है।
णमोकार
गणेशप्रसाद वर्णी जी के पिता जी जन्म से वैष्णव थे, उनकी णमोकार मन्त्र के प्रति बहुत श्रद्धा थी, उन्होंने वर्णीजी से कहा–तुम जैनधर्म नहीं छोड़ना, एक बार जंगल में बैल पर सामान लादकर जा रहे थे और शेर की आवाज आई, सामान उतार कर बैल को भगा दिया, स्वयं माला फेरने लगे, कुछ भी किए बिना ही शेर उनके पास से निकल गया।
णमोकार
चारुदत्त ने बकरे को णमोकार मन्त्र सुनाया, वह देव हुआ, रत्नगिरी पर्वत पर मुनिराज के निकट बैठे हुए देखकर बकरे के जीव देव ने पहले अपने उपकारी चारुदत्त को नमस्कार किया, बाद में मुनिराज को नमस्कार किया था।
णमोकार
जो बिना अर्थ जाने भी णमोकार को पढ़ता है, तो भी उसका भला होता है, जैसे कुत्ते को जीवन्धर स्वामी ने और बैल को पद्मरुचि सेठ ने सुनाया था, वे अर्थ नहीं जानते थे फिर भी उन्हें सद्गति की प्राप्ति हुई थी।
णमोकार
पञ्चपरमेष्ठी की वन्दना के नामान्तर जिस अक्षर समूह से या परिणाम से या क्रिया से आने वाले कर्मों का नाश होता है, उसे कृतिकर्म कहते हैं, जिससे तीर्थंङ्कर आदि पुण्य कर्म का सञ्चय होता है उसे चितिकर्म कहते हैं, जिससे अर्हन्त आदि की पूजा की जाती है, उसे पूजाकर्म कहते हैं, जिससे कर्मों का संक्रमण, उदय, उदीरणा आदि होकर निराकरण किया जाता है, उसे विनयकर्म कहते हैं, ये सब वन्दना के नामान्तर है, जो मुमुक्षु कर्मों की निर्जरा करना चाहते हैं, उन्हें मोक्ष हेतुक विनय अवश्य करना चाहिए।
णमोकार
मन में विकार उत्पन्न होने पर तत्क्षण सत्ताईस उच्छ्वास प्रमाण कायोत्सर्ग करना चाहिए प्राणी वध सम्बन्धी, झूठ, चोरी, मैथुन, परिग्रह सम्बन्धी दोष लगने पर एक सौ आठ उच्छ्वास प्रमाण कायोत्सर्ग अर्थात् छत्तीस बार णमोकार पढ़ना चाहिए।
णमोकार