Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 14 / 41

जो बुरा भला कहे जाने पर भी क्रोधित नहीं होता है, न हि अनुचित बोलता है धैर्य शौर्य आदि धर्मों से युक्त होने पर भी जो घमंड नहीं करता है, निरंतर विपत्तियाँ आने पर भी जो कातर नहीं होता है वह सज्जन कहलाता है।
क्षमा
अनेक तपस्या तथा साधना के फल से ही मनुष्य सरल तथा उदार बनता है। सरल हुए बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती है सरल और विश्वासी के समीप ही प्रभु अपना स्वरूप प्रकट किया करते हैं।
भक्ति
हम परिवार में सिर्फ एक-दूसरे की कमियाँ ही न देखें वरन् उनकी खूबियाँ भी स्वीकार करें। परिवार का हर सदस्य मुखिया न बने बल्कि बुजुर्ग को ही मुखिया रहने दें लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि मुखिया को हिटलर नहीं होना चाहिए।
परिवार
युद्ध जीतने से ही नहीं इन्द्रियों को जीतने से सच्चा शूरवीर होता है। वाक्पटुता से ही नहीं जो हितकर वचन बोले वही सच्चा वक्ता है और केवल धन का दान करने से ही नहीं जो दूसरों का मान सम्मान करे वही सच्चा दाता है।
संयम
किसी व्यक्ति की सभा में बैठकर तो उससे ईर्ष्या रखने वाले भी उच्च स्वर में उसकी प्रशंसा कर देते हैं परन्तु विद्वान् मनुष्य को उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। सच्चा सौहार्द वह होता है जब पीठ पीछे प्रशंसा की जाये।
चरित्र
महापुरुष घोर विपत्ति के समय भी धैर्य नहीं छोड़ते हैं, अधिक उन्नति होने पर क्षमाशील बने रहते हैं, सभा में बोलते हुए वाक पटु दिखते हैं, युद्ध के समय पराक्रम धारण किए रहते हैं, यश प्राप्त करने में अभिरुचि होती है, शास्त्रों के अध्ययन का उन्हें बड़ा चस्का होता है ये सभी गुण सज्जन पुरुषों में स्वभाव से ही पाए जाते हैं।
चरित्र
जिसने व्याकरण नहीं पढ़ा वह जन्मान्ध है क्योंकि वह जैसे श्वजन (कुक्कुर समूह) स्वजन (आत्मीजन), सकृत (एकबार), शकृत (विष्टा), सकल (सम्पूर्ण) शकल (खण्ड) आदि को नहीं समझ पाएगा। जो न्यायशास्त्र से रहित है वह गूंगा है, जो साहित्य से रहित है वह लंगड़ा है और जो कोष रहित है वह निर्धन है।
ज्ञान
संसार में लाखों ईसा, मुहम्मद, बुद्ध, महावीर या राम जन्म लें तो भी तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकते, जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने के लिए कटिबद्ध नहीं होते, तब तक तुम्हारा कोई उद्धार नहीं कर सकता इसलिए दूसरों का भरोसा मत करो।
ज्ञान
सिर्फ शास्त्र को पढ़ लेने से आत्मा पवित्र नहीं होती है, जैसे सन्दूक में साबुन बन्द रखने से कपड़ा साफ नहीं होता है, अतः जैसे साबुन का प्रयोग करना अनिवार्य है वैसे ही शास्त्रों के सूत्रों को आचरण में उतारना अनिवार्य होता है।
धर्म
अनाकुलता का मूल प्रसिद्धि नहीं आत्म विशुद्धि है, मंदिर की द्रव्य थाली भर चढ़ाते हैं, पुण्य झोली भर चाहते हैं और दान एक रुपया नहीं देना चाहते, जो ऐसा करते हैं वे मंदिर से लोन लेते जाते हैं किन्तु जमा कुछ नहीं करते हैं।
दान
प्रथम प्रहर में दुनिया, द्वितीय प्रहर में भोगी, तृतीय प्रहर में चोर, अंतिम प्रहर में योगी जागता है, देर से सोना, देर तक सोये रहना दरिद्रता का कारण है, जल्दी सोना, जल्दी उठना अच्छी हेल्थ और वेल्थ का कारण है, जो हर रोज उगते सूरज को देखते हैं, उनका पूरा दिन उगा हुआ रहता है, जो सूर्योदय के बाद भी सोये पड़े रहते हैं उनका भाग्य भी सो जाता है।
समय
यातायात नियम–ट्रैफिक के नियम और उन्हें क्यों पालन करना है, उससे हमारा और सभी का क्या फायदा है? १८ वर्ष के पहले वाहन क्यों नहीं चलाना ? लायसेंस बनाने के पश्चात् ही चलाना आदि की शिक्षा आवश्यक है।
विविध
वैसे तो सभी इन्द्रियज्ञान प्रायः समता के बाधक हैं किन्तु आँख द्वारा अवलोकन अधिक बाधक है अतः नेत्रोपयोग निजचर्या में ही करो यथा लिखने में, पढ़ने में, चलने में, उठने–बैठने में, चीज उठाने रखने में, दर्शन में, पूजन में, वंदन में, वैय्यावृत्य में, भोजन में, धर्मात्माओं से वार्तालाप में, दुखियों को समझाने में और नित्य क्रिया में।
संयम
हजार वर्ष पहले स्थिति बड़ी दयनीय थी। आतातायी राजाओं ने भारत के विभिन्न भागों पर कब्जा कर लिया और बौद्धों ने उन राजाओं को प्रभावित कर लिया।
विविध
साम्प्रदायिक द्वेष वशात् जैनों की पाठशालाओं, गुरुकुलों और मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया इसलिए अकलंक-निकलंक को बाहर से बौद्ध बनकर नालंदा के बौद्ध विश्वविद्यालय में जाना पड़ा।
विविध
मंदिर जी के गर्भगृह का वही महत्त्व है, जो हमारे शरीर में पेट का है, गर्भगृह में ऊर्जा संग्रहीत होती है, बिजली पानी को पहले संगृहीत किया जाता है फिर प्रवाहित किया जाता है उसी प्रकार मंदिरों और शिखरों में मंत्रादि से ऊर्जा संग्रहीत होती है अतः उन्हें पवित्र रखना चाहिए।
भक्ति
जैसे किसी कैदी को न्यायालय से बरी होने का आदेश प्राप्त हो लेकिन अभी वह जेल में है और ड्रेस भी जेल की पहने है उस समय वह जेल की नहीं बल्कि जेल से मुक्ति की अनुभूति करता है, उसी प्रकार अरहंत भगवान् को भाव मोक्ष होने से अनंत सुख है।
धर्म
देव-शास्त्र-गुरु समान होते हुए भी भगवान् के समान जिनवाणी की स्थापना नहीं होती गुरु को बिना नहाये भी छू लेते है पर स्त्रियाँ नहीं छूती हैं।
धर्म
एक व्यक्ति के पास सौ का नोट है वह न पुण्य रूप है न पापरूप, उस नोट को दान में दिया जा रहा है तो पुण्य रूप है, शराब खरीदी जा रही है तो पापरूप, उसी प्रकार वर्गणाएँ होती हैं, पाप भाव से पाप रूप पुण्य भाव से पुण्य रूप परिणमन कर जाती हैं।
कर्म
पंचक में मरण होने पर श्मशान में ५ श्रीफल रखें जलाये नहीं एवं ५ बार णमोकार मंत्र पढ़ें नैमित्तिक दोष दूर हो जायेगा।
णमोकार
जिन्दगी की आवश्यक वस्तु की कामना से यदि भक्ति की जाती है तो वह न तो नियम है, न मिथ्यात्व है, न सकाम भाव है, वह एक मजबूरी है यदि कोई घर में बीमार हो गया णमोकार नहीं पढ़े तो क्या करें? भक्तामर नहीं पढ़े तो क्या करें? भगवान् से भोग विलास की याचना करना निदान है।
भक्ति
जैसे धनी पुरुष पास में रखे हुए स्वर्ण में बढ़ा भाव सुनने के बाद घटता भाव सुनने पर, कुछ खर्च खराबी न होने पर भी दुःखी होता है, इसी प्रकार वास्तविक वैराग्य शून्य, ज्ञानी व त्यागी पुरुष प्राप्त ज्ञान व त्याग में बढ़े सम्मान की स्वीकारता कर चुकने के बाद सम्मान न होने पर, किसी के द्वारा कुछ हानि वा क्लेश नहीं दिये जाने पर भी दुःखी होता है अस्तु, उसके दुःख में उसकी ही तो मूल में भूल है।
अनासक्ति
कषाय करते समय यह तो विचार करो कि द्रव्य लिङ्गी साधु के अव्यक्त मिथ्याभाव मिथ्यात्व गुणस्थान सम्बन्धी सभी प्रकृतियों तक का बंध करा देता है तो क्या तेरे इस समय बंध नहीं हो रहा है? क्या इसका कुफल नहीं भोगना होगा?
कर्म
एक से अधिक कार्य करने के लिए शारीरिक क्षमता की आवश्यकता नहीं है, उसके लिए मानसिक क्षमता की आवश्यकता है जितनी चादर उतने पैर पसारो, सदा एक नाव में सवार होओ, जितना सँभाल सको उतना ही करो, ज्यादा करोगे तो दूसरों के लिए, पैसा ज्यादा हो तो बुरी आदतें लग जाती हैं।
संतोष
जूतों पर पॉलिश करने वाला अपाहिज पॉलिश कराने वालों को पहले पढ़ने पुस्तक देता था ताकि उतनी देर वह समय का सदुपयोग करें कुछ गुण ग्रहण करें और मेरी दयनीय दशा देखकर सहयोग न करें मैं कर्मयोग करूँ।
पुरुषार्थ
पैसा ही सबकुछ नहीं अन्यथा तीर्थंकर क्यों त्याग करते, वे जानते थे कि पैसे से भोजन खरीद सकते है भूख नहीं, पुस्तक खरीद सकते ज्ञान नहीं, सुविधाएँ खरीद सकते हैं सुख नहीं, मंदिर बना सकते भगवत्ता नहीं खरीद सकते हैं।
धन
शिक्षा प्रणाली में १. शारीरिक शिक्षा–योगासन प्राणायाम, पौष्टिक आहार–विटामिन मिनरल प्रोटीन की उपलब्धता शरीर की आवश्यकता, सात्विक खाने के फायदे और गुण, फास्ट फूड के अवगुण/नुकसान और खाने का समय बताना चाहिए।
स्वास्थ्य
जल संरक्षण—पानी की कितनी कमी है और इसका महत्त्व पानी को कम से कम उपयोग करना। किस तरह पानी बचाना, एक ही पानी को दो-तीन बार कैसे उपयोग किया जाए और भविष्य के लिए पानी कैसे बचाया जाय इसकी शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है।
प्रकृति
नैतिक शिक्षा—समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, हमें नैतिक मूल्यों की,
चरित्र
विभीषण रावण के राज्य में रहता था फिर भी नहीं बिगड़ा और कैकयी राम के राज्य में रहती थी फिर भी नहीं सुधरी, तात्पर्य सुधरना एवं बिगड़ना केवल मनुष्य के सोच और स्वभाव पर निर्भर है सिर्फ माहौल पर नहीं है।
चरित्र