Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

जैसे धनी पुरुष पास में रखे हुए स्वर्ण में बढ़ा भाव सुनने के बाद घटता भाव सुनने पर, कुछ खर्च खराबी न होने पर भी दुःखी होता है, इसी प्रकार वास्तविक वैराग्य शून्य, ज्ञानी व त्यागी पुरुष प्राप्त ज्ञान व त्याग में बढ़े सम्मान की स्वीकारता कर चुकने के बाद सम्मान न होने पर, किसी के द्वारा कुछ हानि वा क्लेश नहीं दिये जाने पर भी दुःखी होता है अस्तु, उसके दुःख में उसकी ही तो मूल में भूल है।

Just as a wealthy man who has heard the rising price of the gold he holds becomes miserable when he hears the price fall, though he has suffered no actual loss, so too a learned and renunciant man devoid of true detachment, having once accepted the increased honour for his knowledge and renunciation, becomes miserable when that honour ceases, even though no one has caused him harm or distress; hence the fault at the root of his sorrow is his own.

— आराध्य सूत्र · #4987

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति