Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 13 / 41

सुखी रहने का मूल मंत्र – C.A.R. (1) Change the changable (2) Accept the unchangable (3) Remove yourself from unchangable बदलने लायक है, बदलना आवश्यक है, बदल सकते हो तो बदल दो। जिसे बदल नहीं सकते हो उसे स्वीकार कर लो। जिसे बदल नहीं सकते एवं स्वीकार भी नहीं कर सकते, उससे दूर हो जाओ। उपरोक्त तीनों बिन्दुओं को अगर ठीक से आत्मसात कर लिया जाये तो जीवन में कुछ भी समस्या नहीं बचेगी।
संतोष
१६ वर्ष का भूखा बच्चा होटल पर गया, २५% कमीशन पर लगा, एक मिनी बस में गया बोला इमारत पुरानी है लेकिन स्वाद अच्छा है और सेवा भी अच्छी मिलेगी। धीरे-धीरे उस होटल का मैनेजर बना, आगे चाय बगान किराये पर लिए और पूरे देश में अपना चाय का साम्राज्य फैला दिया, उस बालक का नाम था Lipton यह था उसका कर्मयोग।
पुरुषार्थ
अमेरिका में एक युवक का विवाह २२वर्ष में हुआ, २४ वर्ष में तलाक, २७ वर्ष की उम्र में नगर अध्यक्ष का चुनाव हार गया फिर विधानसभा का चुनाव लड़ा, हार गया, कांग्रेस सीनेट का चुनाव लड़ा हार गया, ४६ वर्ष में उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ा हार गया लेकिन उस व्यक्ति ने हार नहीं मानी और ५२ वर्ष की उम्र में राष्ट्रपति का चुनाव जीता वह था अब्राहम लिंकन।
पुरुषार्थ
जब भी आप कुछ अच्छा या अलग कार्य करना चाहेंगे, लोग हँसेंगे मजाक उड़ायेंगे, आप अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहें, आपकी सफलता ही उन्हें जवाब देगी, जैसे ही आप सफल होंगे वही लोग पलट जायेंगे और कहेंगे कि आप सही थे, वे आपका गुणगान करेंगे।
समृद्धि
स्वभावदृष्टि, परमात्म स्मरण, शास्त्राभ्यास, दोषवाद में मौन, सद्वृत्त कथा, प्रियहित वचनालाप और सत्संग, इस प्रकार के क्रम से पुरुषार्थ करो अर्थात् पूर्व-पूर्व की और बढ़ो। यदि पूर्व में शिथिल हो जाओ या थक जाओ, तब उत्तर का आश्रय लो। सर्वप्रथम स्वात्म दृष्टि इसलिए है कि इससे भी चूक जाने पर कल्याण की आशा नहीं है।
धर्म
इक ले रहो तो निर्जन वन में, ग्राम रहो तो धर्मी गण में। मन न लगे तो लगो लिखन में, निर्मल मन हो तो लगो पठन में। कुमति रहे, चल गुरु चरणन में, हो विकल्प लग देव भजन में। काम समय लग मल (अशुचिभावना) वर्णन में, क्रोध करो तो निज कुमतिन में। मान करो निजशुचि गुण गान में, माया हो छुप शुद्धातम में। लोभ करो निर्मल निज गुण में, हो प्रसन्न निर्मल चिन्तन में। प्रेम करो केवल ज्ञानि में, कर विरोध मिथ्याभावन में। शोक करो कुत्सित कृत्यन में डर नित डरनित पाप करन में। घृणा करो तो पापीमन में, रह निःशंक नित आत्म मनन में। तन मन धन दो ज्ञान मिलन में, प्रिय हित वचन कहो सब जन में।
संयम
कठिनाइयों से, प्रतिकूलताओं से घिरे होने पर भी जीवन का वास्तविक प्रयोजन समझने वाले व्यक्ति कभी निराश नहीं होते हैं, वे हर प्रकार की परिस्थितियों में अपने लक्ष्य के लिए प्रेरणा प्राप्त करते हैं तथा श्रेष्ठ पथ पर क्रमशः आगे बढ़ते हैं।
पुरुषार्थ
हमें समय नहीं काटना, सोचो नर देह को काटने की बात कर रहे हो, कसाई छुरी से मूक प्राणियों को काटता है, आप नर देह को गप्पों में, टी.व्ही. देखकर, तास खेल कर, पेपर पढ़कर काट रहे हो, जिन्हें भविष्य की चिंता नहीं वे ही समय काटने की सोचते हैं, वे कभी श्मशान घाट या अस्पताल में जाकर नारकी हालात को देख आये होते तो फिर समय नहीं कर्म काटने की सोचते।
समय
सफलता तुम्हारा परिचय दुनिया से कराती है असफलता तुम्हें दुनिया का परिचय कराती है। कई विफलताएँ इसलिए होती हैं कि लोग सफलता के नजदीक पहुँचते ही प्रयास बंद कर देते हैं और लोगों को ये आभास नहीं होता कि जब उन्होंने प्रयास बंद कर दिये थे उस वक्त वे सफलता के कितने नजदीक थे।
समृद्धि
इन्द्र, मनुष्य, विद्याधर, चक्रवर्ती और धरणेन्द्रों ने भूत भविष्य और वर्तमान में जो सुख भोगा है उस सबको इकट्ठा किया जाये उस सुख से अनन्त गुणित सुख सिद्ध परमेष्ठी एक समय में भोगते हैं इसलिए हे भाई! यदि तुझे इष्ट हो तो एकाग्रचित्त होकर उस समीचीन सुख का उपाय कर।
समाधि
जो अपनी नम्रता से ही उन्नत होते जाते हैं, दूसरों के गुणों की प्रशंसा करते-करते ही अपने गुणों को विख्यात करते हैं, दूसरों के कामों को सिद्ध करने के लिए निरन्तर महान् उद्योग भी करते हुए ही अपने प्रयोजनों को सिद्ध करते हैं और अपनी क्षमा के द्वारा ही निंदा के नीरस अक्षरों से मुखरित मुख वाले दुर्मुखों को दुःखित कर देते हैं- ऐसे अद्भुत आचरण वाले किसके वंदनीय नहीं होते हैं?
विनम्रता
आचार्य कहते हैं तृष्णा को नष्ट कर, क्षमा को धारण कर, पाप में अनुराग मत कर, सत्य बोल, सत्पुरुषों के पीछे चल, विद्वानों की सेवा कर, माननीयों का आदर कर, शत्रुओं से भी प्रेम कर, पीड़ितों को प्रश्रय दे, कीर्ति बढ़ा और दुःखित पर दया कर ये ही सब कार्य सत् पुरुषों के होते हैं।
चरित्र
यदि तुम सच्चे सुधारक बनना चाहते हो, तो तीन बातों की आवश्यकता है प्रथम तो यह कि तुम्हारी हृदय भावना शील हो, दूसरी बात यह कि इन सबके लिए क्या तुमने कोई उपाय ढूँढ़ निकाला है या नहीं? तीसरा अटल अध्यवसाय यदि ये तीनों गुण आप में हैं तो वास्तव में आप एक सच्चे सुधारक मार्ग प्रदर्शक गुरु एवं मनुष्य जाति के लिए वरदान स्वरूप हैं।
चरित्र
जो स्वजनों पर उदारता, सेवकों पर दया, दुर्जन के साथ माध्यस्थता, सज्जन के साथ प्रीति, राजा के साथ नीति, विद्वानों के साथ सरलता, शत्रुजनों के साथ शौर्य, गुरुजनों के साथ क्षमा और स्त्रियों के साथ चतुरता का व्यवहार करते हैं और कला कुशल है, उन्हीं पुरुषों पर यह जगत् स्थित है।
चरित्र
मंगलवार को पूर्व दिशा में गमन लाभकारी है। सोमवार व शनिवार को दक्षिण दिशा में गमन से अर्थ लाभ होता है। बुधवार व बृहस्पतिवार को पश्चिम दिशा में गमन से कार्य सिद्धि होती है, रवि व शुक्रवार को उत्तर दिशा में जाने से अर्थ लाभ होता है।
विविध
माना कि आपके पास वो आँखें नहीं है, जो आकाश में बैठे भगवान् को पहचान सकें, पर आपके पास वो आँखें तो हैं, जो पड़ोस में बैठे इंसान को पहचान सकें क्योंकि जो पड़ोस में बैठे इंसान को पहचान लेता है वो भगवान् को पहचान लेता है और फिर आज का इंसान ही भविष्य का भगवान् होता है।
संगति
जब हम नेकी करके उसका एहसान जताने लगते हैं, तो वहीं जिसके साथ हमने नेकी की थी वह हमारा शत्रु हो जाता है और अगर वही नेकी करने वालों के दिल में रहे तो नेकी है, बाहर निकल आए तो बदी है।
दान
अगर पुण्योदय से आपको सम्पत्ति मिले तो स्वयं की सेवा के लिए भले ही नौकर रख लेना किन्तु माँ, महात्मा और परमात्मा की सेवा के लिए नौकर न रखें। प्रभु की प्रार्थना और माँ–बाप की सेवा स्वयं करना चाहिए।
दान
मदद करने के लिए सिर्फ धन की ही नहीं एक अच्छे मन की भी जरूरत होती है।''जो सादगी में महत्त्व है, भलाई है, वह दौलत में नहीं'' जो हम प्राप्त करते हैं उससे हमारा जीवन बनता है तथा जो हम देते हैं उससे दूसरों का जीवन बनता है अत: अपने साथ–साथ दूसरों का जीवन भी बनाएँ।
दान
जिन्दगी, धन और सत्ता के संचय का नाम नहीं है, बल्कि आशीर्वादों के मोती एकत्रित करने का नाम है, जहाँ धन और सत्ता की प्राप्ति के लिए शोषण और जुल्म अनिवार्य है वहाँ आशीर्वादों के मोती बटोरने के लिए किसी को पीड़ित करने की नहीं बल्कि दूसरों की पीड़ा हरने की जरूरत है।
दान
अभ्यास की शक्ति तो देखो–निरन्तर अभ्यास से किसी विषय का अज्ञ उस विषय का ज्ञाता हो जाता है, पर्वत भी धीरे–धीरे घिसकर चूर्ण बन जाता है और बाण भी अपने सूक्ष्म लक्ष्य तक पहुँच जाता है। मनुष्य जिस–जिस वस्तु का लगातार चिन्तन करता है, अभ्यास वश उसी–उसी की ओर मन का झुकाव हो जाता है।
पुरुषार्थ
स्त्री का फल पुत्र है, शास्त्र का फल शान्ति है, सम्पत्ति का फल दान है, लक्ष्मी का फल कीर्ति है, श्रम का फल धन है, वैराग्य का फल दीक्षा है, दीक्षा का फल तपस्या है, तपस्या का फल कर्म नष्ट कर मोक्ष प्राप्त करना है और सद्गृहस्थ होने का फल प्रतिदिन श्री जिनेन्द्र देव के चरण कमल की भाव सहित पूजा करना तथा सत्पात्र को दान देना है।
धर्म
मनुष्य का शरीर भारत की लोकसभा जैसा है, इस शरीर में सभी मंत्रालय हैं–प्राण प्रधानमंत्री है, सिर शिक्षामंत्री है, कान दूरसंचार मंत्री, जुबान सूचना व प्रसारण मंत्री है, पेट खाद्य मंत्री है, हाथ श्रम मंत्री है, पैर यातायात मंत्री, नाक स्वास्थ्य मंत्री है, आँख कानून मंत्री, दिल वित्तमंत्री है, फेफड़े गृह मंत्री और आत्मा राष्ट्रपति है। इतना सब कुछ तो आपके पास है फिर क्यों आप लाल–पीली बत्ती माँगते–फिरते हो? अरे! प्रभु के नाम लगाने को सिर्फ समय माँगों बस।
भक्ति
जिसकी बुद्धि में जड़ता (सांसारिक भोग और संग्रह) का ही महत्त्व है, ऐसा मनुष्य कितना ही विद्वान् क्यों न हो, उसका पतन अवश्यम्भावी है, परन्तु जिसकी बुद्धि में जड़ता का महत्त्व नहीं है और भगवत्प्राप्ति ही जिसका उद्देश्य है, ऐसा मनुष्य विद्वान् न भी हो तो भी उसका उत्थान अवश्यम्भावी है।
भक्ति
हे भगवन्! मेरा बोलना आपकी जाप हो, मेरी चेष्टाएँ आपकी उपासना से सम्बद्ध मुद्राओं की रचना हो, चलना आदि प्रदक्षिणा लगाना हो, भोजन करना आपको विधिवत् दी गयी आहुतियाँ हो, भूमि में लेटना आपके लिए प्रणाम हों, इस प्रकार जितना भी मेरा विलास और चेष्टाएँ हैं, वे सब आत्मार्पण की विधि से की गई आपकी पूजा के पर्यायवाची हो जाएँ।
भक्ति
किसी व्यक्ति ने हमारी आपत्ति में सहायता की हो ऐसे व्यक्ति की आपत्ति में हम भी सहायता कर दें तो यह कोई बड़ी बात नहीं है उपकारी पर उपकार करना यह तो सज्जनता का लक्षण है परन्तु है अपकारी पर भी उपकार करना यह तो महापुरुष का लक्षण है।
चरित्र
यद्यपि तुम्हें गुरु या शिक्षक के सामने उतना ही अपमानित होना और नीचा बनना पड़े जितना कि भिक्षुक को धनवान् के समक्ष बनना पड़ता है, फिर भी तुम विद्या सीखो, मनुष्यों में अधम वे ही लोग हैं जो विद्या सीखने से विमुख होते हैं।
ज्ञान
इंसान की जिन्दगी के हार जीत का फैसला उसकी सन्तान करती है, अगर संस्कारित और कमाऊ संतान है तो जीत है अगर आवारा बेकार है तो करोड़ों की कमाई हुई पूँजी होते हुए भी हार है। आने वाली पीढ़ी को महावीर के चित्र ही नहीं चारित्र भी सौंपने होंगे क्योंकि चित्र से चित्त और चारित्र से जीवन पवित्र होता है।
परिवार
आज पूरे विश्व में हमारी संस्कृति की अलग ही पहचान है तो संस्कारों से, हमारी शिक्षा पर तो पाश्चात्य संस्कृति ने कब्जा कर लिया है लेकिन हमारे संस्कारों को हमें जीवित रखना होगा।
चरित्र
मरणासन्न की जिस स्तुति पाठादि में रुचि है वही सुनाना चाहिए यदि जीवन में धर्म नहीं किया हो तो संसार का स्वरूप समझाते हुए विषय-कषाय का त्याग कराकर दानादि की प्रेरणा करना चाहिए।
समाधि