Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 15 / 41

सिक्के हमेशा आवाज करते हैं, पर नोट हमेशा शान्त रहते हैं इसलिए जब आपकी कीमत बढ़े तो शान्त रहिए, आपकी हैसियत का शोर मचाने का जिम्मा आपसे कम हैसियत वालों का है।
विनम्रता
हम किताबी ज्ञान अर्जित करते हैं लेकिन वास्तविक परिस्थितियों से दूर रहते हैं, प्रेक्टीकल शिक्षा नहीं दी जाती है, जीवन भर काम आने वाले आवश्यक विषयों को स्कूल या कॉलेज में कभी नहीं पढ़ाया जाता है।
ज्ञान
आपका घर बहुत बड़ा हो आवश्यक नहीं, लेकिन उस घर में आपके जरूरत की प्रत्येक चीज उपलब्ध हो और हर चीज सही जगह पर रखी हो यह आवश्यक है और सर्व सुविधा युक्त जगह में हो जो शान्ति सुकून दे सके।
परिवार
मनुष्य कितना मूर्ख है। प्रार्थना करते समय समझता है कि भगवान् सब कुछ सुन रहा है, पर निंदा करते समय यह भूल जाता है। पुण्य करते समय यह समझता है कि भगवान् देख रहा है, पर पाप के समय यह भूल जाता है। दान करते समय समझता है कि भगवान् सब में बसता है, पर चोर चोरी करते समय ये भूल जाता है। प्रेम करते समय यह समझता है कि पूरी दुनिया भगवान् ने बनाई है, पर नफरत करते हुए ये भूल जाता है और हम कहते हैं कि मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी है।
भक्ति
द्वन्द, दुःख संताप, विभाव, विपदा आदि सभी अनिष्ट बातें संयोग में है, अकेले रहने से तो उन सब अनिष्टों का सर्वथा अभाव हो जाता है, परन्तु मोही जीव संयोग को इष्ट मानता है।
अनासक्ति
संयोग आत्महित का नियत साधक नहीं है क्योंकि कर्म के संयोग से संसार के दुःख मिलते हैं, शरीर के संयोग से भूख-प्यास आदि के दुःख मिलते हैं, परिवार के संयोग से चिन्ता परिश्रम के दुःख मिलते हैं। संयोग सुख की चीज नहीं है, बल्कि क्लेशों का पिता है।
अनासक्ति
पशुओं का चाम तो मरने पर भी काम आता है, तेरे चाम का क्या होगा? अरे! जब तक आरोग्य है तब तक दीन दुःखियों की सेवा और महापुरुषों की वैय्यावृत्ति कर ले। तेरा शान्ति पथ प्रशस्त होगा। आगामी काल की चिंता सम्यक्त्व का अतिचार है। अतः क्या होगा? यह भय मत करो और न अतिभविष्य के प्रोग्राम बनाओ, वर्तमान परिणमन पर ध्यान दो। त्याग तृप्ति का और पर सम्पर्क असंतोष का कारण है।
पुरुषार्थ
कोई मुझे सम्पदा ऐश्वर्य का स्वामी समझे तो मुझे इससे क्या है? विपक्ष मलीन समझे तो मुझे क्या? मैं तो जैसा होऊँगा, वैसा ही फल पाऊँगा। किसी के जानने समझने आदि से क्या होता है?
कर्म
जहाँ अपवाद का बादल छा रहा हो, वहाँ घबराना मूर्खता है, वह वातावरण तो तुम्हारा उपकारक है धीर बनाने वाला है, अपने आत्म तत्त्व को देखो और प्रसन्न रहो।
संयम
मान लो तुम्हें दुनिया का कोई मनुष्य नहीं जानता, तुम अकेले एक जगह पड़े हो, कोई चर्चा करने वाला नहीं है तो ऐसी हालत क्या तुम्हें पसंद है? बुरी तो नहीं लगती? यदि विषाद नहीं है तो कल्याण के पात्र हो।
संयम
पैसा जेब में हो दिमाग में नहीं, दिमाग में पैसा रखोगे तो दिमाग होगा सातवें आसमान पर और तुम होंगे, सातवें नरक में और पैसा जेब में होगा तो दुनिया होगी तुम्हारी जेब में और तुम होंगे दुनिया की जेब में।
धन
परिवार व्यक्तियों के समूह से नहीं प्यार की अभिव्यक्तियों से बनता है, मीठा खाने को न मिले तब भी मीठा बोलें, जो मन में आये वह न बोलें अपितु जो औरों को भाये वह बोलें, मनचाहा बोलोगे तो अनचाहा सुनना पड़ेगा।
वाणी
जब तक मनुष्य या पशु की आँख में आँसू है तब तक अहिंसा और सत्य का सिद्धान्त अधूरा है। श्रावक की बंधी मुट्ठी लाख की साधु की खुली मुट्ठी आशीर्वाद की।
अहिंसा
जैसे पेट में छना हुआ जल डालते हैं वैसे मन में भी छने विचार डालें क्योंकि तन, मन नगरपालिका के कचरे का घर नहीं है प्रतिफल का विचार अवश्य करें। एक भी कड़वा फल नहीं आये तो मीठे फल की पहचान नहीं होगी।
मन
रास्ते पर कंकड़ ही कंकड़ हो तो भी एक अच्छा जूता पहनकर उस पर चला जा सकता है लेकिन यदि एक अच्छे जूते के अन्दर एक भी कंकड़ हो तो एक अच्छी सड़क पर भी कुछ कदम चलना मुश्किल होता है अर्थात् बाहर की चुनौतियों से नहीं हम अपनी अन्दर की कमजोरियों से हारते हैं।
विवेक
चक्रवर्ती के दशाङ्ग भोग—१. चौदह रत्न, २. नौ निधि, ३. सुन्दर स्त्रियाँ ४. नगर, ५ आसन, ६. शय्या, ७. सेना, ८. भोजन, ९. पात्र, १०. नाट्यशाला।
विविध
मन शान्त रखने के दस सूत्र—१. किसी के काम में तब तक दखल न दें जब तक की आपसे पूछा न जाये। २. उतना ही काम हाथ में लें जितना पूरा करने की क्षमता हो। ३. किसी भी काम को टाले नहीं और ऐसा कोई काम न करें, जिससे बाद में आपको पछताना पड़े। ४. दिमाग को खाली न रहने दें। ५. जो कभी बदल नहीं सकता उसे सहना सीखें। ६. स्वयं को माहौल में ढालने की चेष्टा करें। ७. जलन की भावना से बचें। ८. पहचान पाने की लालसा न रखें। ९. माफ करना और कुछ बातों को भूलना सीखें। १०. प्रतिदिन ध्यान करना सीखें।
मन
मदारी बन्दर को शिक्षित कर जैसा चाहे वैसा नचा लेता है, वैसे ही मन को शिक्षित करके अपना दास बना लें फिर जैसा आदेश देंगे मन वही करेगा।
मन
जो समय चिन्ता करते बीता वह समझो कूड़े दान में डाल दिया और जो समय चिन्तन में लगा समझो कि वह ब्याज सहित लौटाने वाली बैंक में जमा हो गया है।
समय
दुनिया के सभी देवी-देवता की प्रतिमा खिले कमल पर विराजमान है बन्द कमल पर नहीं अतः आप भी अपने हृदय कमल को प्रसन्न रखो जिससे परमात्मा विराजमान हो सकें।
भक्ति
कंडेक्टर बेचारा गाँव नगर के नाम चिल्लाता-चिल्लाता जीवन निकाल देता है। कुंजड़ा भटा-भाजी, आम-पपीता चिल्लाता है, अगर इतनी प्रीति से भगवान् का नाम लेता तो कल्याण हो जाता।
भक्ति
जन्म दूसरे ने दिया, नाम, शिक्षा, काम करने का तरीका दूसरे ने सिखाया, अन्त में श्मशान भी दूसरे ले जायेंगे, तुम्हारा अपना क्या है जो घमंड करते हो?
विनम्रता
नौ गोपनीय—१. आयु, २. धन, ३. घर का भेद, ४. मंत्र, ५. मैथुन, ६. औषधि, ७. तप, ८. दान, ९. अपमान।
विविध
खुद को बिखरने मत देना कभी किसी हाल में, गिरे मकान की ईंटें तक ले जाते हैं लोग तेरे गिरने में तेरी हार नहीं क्योंकि तू आदमी है अवतार नहीं।
पुरुषार्थ
णमोकार मन्त्र के प्रभाव से सर्प ने नागेन्द्र पद, अञ्जन चोर ने मोक्ष पद और सुभग ग्वाला ने अभीष्ट फल प्राप्त किया था।
णमोकार
किसी के मन की बात निकालना हो तो उत्तर मत देना, पहले पूरी सुनना बीच में टोकना नहीं क्योंकि समूह में अनुभव मिलता है एकान्त में आनंद मिलता है।
वाणी
यदि कम पुण्य में अधिक आकांक्षा करोगे तो विषय-कषाय के मच्छर और हीन भावना की ठंड लगेगी, जीवन नरक न हो इसलिए जितनी चादर उतने पैर फैलाओ।
संतोष
किसी गरीब की झोली में १ रुपया डाला तब पता चला कि मँहगाई के इस दौर में आज भी 'दुआएँ' कितनी सस्ती हैं और दुआएँ असंभव को संभव बनाती हैं।
दान
जलना छोड़ो प्रकाशित होना सीखो, प्रकाश में दुनिया प्रसन्न होती है, जलने वाला तो राख होने से पहले ही खोटी स्मृति रूपी दुर्गन्ध छोड़ जाता है। इतिहास कहता है उधार और वरदान नहीं देना चाहिए।
चरित्र
तीव्र कषाय में मरीचि समवसरण छोड़कर भाग गया था मन्द कषाय में शेर की पर्याय में श्रावक बन गया था।
कर्म