Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 37

जैसे झालर की झंकार वैसे जीवन में संस्कार।

23 सूत्र

ऐसा कोई अक्षर नहीं है जो मन्त्र बनने की क्षमता नहीं रखता हो, ऐसी किसी वृक्ष की जड़ नहीं है जो किसी न किसी रोग के काम न आती हो, ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो अयोग्य हो लेकिन इन तीनों का संयोजन करने वाला दुर्लभ होता है।
ज्ञान
बुद्धिमान जनक ने सीता को कुलवधू के ये धर्म बतलायें कि पति के आने पर खड़े हो जाना, उनके साथ नम्रता से बात करना, उनके बैठ जाने पर चरणों में दृष्टि रखना, उनकी सेवा स्वयं करना, उनके सो जाने पर सोना, उनके उठने से पहले उठ जाना।
परिवार
सत्पुरुषों की मित्रता सात कदम साथ-साथ चलने अथवा सात पदों का वार्तालाप होने पर हो जाती है, सत्पुरुषों में भी जो सत्पुरुष हैं उनकी मित्रता तीन कदम साथ चलने से हो जाती है और जो सन्तों में सन्त हैं, उनकी मित्रता पद-पद पर होती है।
संगति
सत्पुरुष अपने असंख्य गुणों से भी सन्तुष्ट नहीं होते हैं पर दूसरों में स्थित अल्पगुणों से भी प्रसन्न रहते हैं, उनकी यह चेष्टा आश्चर्यकारी है।
विनम्रता
सज्जन पुरुष अपने गुण और दूसरों के दोष नहीं कहते हैं और किसी के कुछ माँगने पर मना नहीं करते हैं।
विनम्रता
कामधेनु पशु है, कल्पवृक्ष लकड़ी है पारसमणि पत्थर है और चिन्तामणि भी पाषाण है अतःसज्जनों की समानता किसी से नहीं हो सकती है।
चरित्र
जो किसी पर दोषारोपण कर प्रवचन नहीं करता, ईर्ष्या नहीं करता, अपनी स्तुति नहीं करता, दूसरे का उपहास नहीं करता, दूसरे की गुप्त बात नहीं कहता, क्रोध को मारता है, शान्ति को स्थिर रखता है, प्रीति से पीछे नहीं हटता तथा अहङ्कार रहित होता है उसे सत्पुरुष सदा 'सज्जन' कहते हैं।
चरित्र
न्याय पूर्वक धनोपार्जन करने वाला, गुणवानों की पूजा करने वाला, मिष्टवचन बोलने वाला, धर्म, अर्थ तथा काम पुरुषार्थ का एक दूसरे का घात न करने वाला, गृहस्थ धर्म के योग्य स्त्री, योग्य आवास, लज्जायुक्त, योग्य आहार-विहार वाला हो, सत्सङ्गति हो, बुद्धिमान हो, कृतज्ञ हो, इन्द्रियों को वश में रखने वाला हो, धर्मोपदेश सुनने वाला हो, दयालु हो, पापभीरु हो, ऐसा श्रावक होता है।
धर्म
एक-एक कदम चलते-चलते रास्ता पार हो जाता है, छोटे-छोटे कपड़ों को इकट्ठा कर सिलने पर ओढ़ने का वस्त्र बनता है जिसे कन्था कहते हैं, एक-एक सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते पर्वत की चोटियों पर पहुँच जाते हैं, एक-एक पद पढ़ते-पढ़ते विद्वान् बन जाते हैं और एक-एक कोंड़ी जोड़ते-जोड़ते करोड़पति बन जाते हैं, ये पाँच चीजें धीरे-धीरे प्राप्त होती हैं।
पुरुषार्थ
जो विना बुलाये किसी के घर में प्रवेश करता है, विना पूँछे बहुत बोलता है, अविश्वसनीय पर विश्वास करता है वह मूर्ख अधम नर है।
चरित्र
निषेध के छह भेद हैं- मौन हो जाना, उत्तर देने में देर करना, गमन कर देना, भूमि की ओर देखना, भृकुटी चढ़ाना, दूसरा प्रसङ्ग छेड़ देना।
विविध
जिसके घर में माता नहीं हैं, प्रिय बोलने वाली स्त्री नहीं हैं, उसे जङ्गल में चले जाना चाहिये क्योंकि जैसा जङ्गल वैसा घर।
परिवार
दुर्जन चलनि की तरह दोषों को यत्न पूर्वक ग्रहण करता है और गुणों को दूर से ही छोड़ देता है।
चरित्र
दुष्टों व काँटों के प्रति दो प्रकार की प्रतिक्रिया होती है, या तो उनका जूते से मुख भङ्ग कर दो, या दूर से छोड़कर चले जाओ।
संगति
मृत्यु के चार द्वार- अनुचित कार्य प्रारम्भ कर देना, आत्मीय जनों का विरोध करना, बलवान से स्पर्धा करना, स्त्रियों का विश्वास करना।
विवेक
भोग में रोग का भय है, सुख में क्षय होने का, धन में राजा का और अग्नि का, दास को स्वामी का, विजय में शत्रु का, कुल में खोटी स्त्री का, सम्मान में अपमान का, गुणों में दुष्ट का, शरीर में मृत्यु का सभी जगह भय है, 'केवल वैराग्य ही अभय है'।
अनासक्ति
वह माता शत्रु है, पिता बैरी है जिसने अपने बालक को नहीं पढ़ाया क्योंकि जैसे हँसों के मध्य बगुला सुशोभित नहीं होता है वैसे ही अशिक्षित पुत्र सभा में सुशोभित नहीं होता है।
ज्ञान
संतान और शिष्य को लाड़ करने से उनमें बहुत दोष उत्पन्न हो जाते हैं और प्रताड़ित करने से उनमें बहुत गुण उत्पन्न होते हैं इसलिए पुत्र और शिष्य को यथासम्भव प्रताड़ित करना चाहिए लाड़ नहीं।
ज्ञान
पाँच वर्ष तक लाड़-प्यार करना चाहिए, दस वर्ष डांटकर संस्कारित करना चाहिए और सोलह वर्ष के बाद पुत्र के साथ मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।
परिवार
बाल अवस्था में विद्या अर्जित नहीं की, युवा अवस्था में धन अर्जित नहीं किया, प्रौढ़ अवस्था में तपस्या नहीं की तो वृद्ध अवस्था में क्या करेगा?
पुरुषार्थ
जिसके दिन धर्म-अर्थ-काम पुरुषार्थ से शून्य व्यतीत होते हैं वह लुहार की भस्त्रा के समान सांस लेता हुआ भी नहीं जीता है। अर्थात् धर्म को मुख्य रखकर प्रत्येक कार्य करना चाहिए।
पुरुषार्थ
पिता का वंश निरर्थक है गुण ही सर्वत्र पूजे जाते हैं, लोग कृष्णजी को नमस्कार करते हैं उनके पिता को नहीं।
चरित्र
सज्जनों के दूर रहने पर भी गुण दूत की तरह काम करते हैं जिस प्रकार केतकी की गन्ध को सूंघकर भोरें स्वयं आ जाते हैं।
चरित्र