माता यस्य गृहे नास्ति, भार्या च प्रियवादिनी। अरण्यं तेन गन्तव्यं, यथारण्यं तथा गृहं।।
जिसके घर में माता नहीं हैं, प्रिय बोलने वाली स्त्री नहीं हैं, उसे जङ्गल में चले जाना चाहिये क्योंकि जैसा जङ्गल वैसा घर।
He whose home has no mother and no sweet-spoken wife should go to the forest, for such a home is no better than a forest.
— आराध्य सूत्र · #7
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