Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

भोगे रोगभयं सुखे क्षयभयं, वित्तेऽग्नि भूभृद्भयं, दासे स्वामी भयं जये रिपुभयं, वंशे कुयोषिद्भयं। माने म्लानभयं गुणे खलभयं, काये कृतान्ताद्भयं, सर्वं नामभयं भवेदिदमहो वैराग्यमेवाभयं।।

भोग में रोग का भय है, सुख में क्षय होने का, धन में राजा का और अग्नि का, दास को स्वामी का, विजय में शत्रु का, कुल में खोटी स्त्री का, सम्मान में अपमान का, गुणों में दुष्ट का, शरीर में मृत्यु का सभी जगह भय है, 'केवल वैराग्य ही अभय है'।

In enjoyment lurks fear of disease, in comfort fear of loss, in wealth fear of the king and fire, for a servant fear of the master, in victory fear of the enemy, in a family fear of a bad woman, in honour fear of insult, in virtues fear of the wicked, in the body fear of death — fear is everywhere; only detachment is fearless.

— आराध्य सूत्र · #11

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति