यस्य त्रिवर्ग शून्यानि, दिनान्यायान्तियान्ति च। स लोहकार भस्त्रेव, श्वसन्नपि न जीवति।।
जिसके दिन धर्म-अर्थ-काम पुरुषार्थ से शून्य व्यतीत होते हैं वह लुहार की भस्त्रा के समान सांस लेता हुआ भी नहीं जीता है। अर्थात् धर्म को मुख्य रखकर प्रत्येक कार्य करना चाहिए।
He whose days pass empty of dharma, wealth and rightful desire, though breathing like a blacksmith's bellows, is not truly alive; hence every act should be done keeping dharma foremost.
— आराध्य सूत्र · #16
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