दोषान् गृह्णाति यत्नेन, गुणांस्त्यजति दूरतः। दोषग्राही गुणत्यागी, चालनिरिव दुर्जनः।।
दुर्जन चलनि की तरह दोषों को यत्न पूर्वक ग्रहण करता है और गुणों को दूर से ही छोड़ देता है।
Like a sieve, the wicked man carefully retains the faults and lets the virtues fall away.
— आराध्य सूत्र · #8
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