Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
आहार

कोई कहता है कि मांस जीव का शरीर है और फल-शाक आदि भी जीव का शरीर है, फिर मांस अखाद्य है और फल आदि खाद्य क्यों है? इसके उत्तर में कहा गया है कि मांस तो जीव का शरीर है पर जीव का शरीर मांस हो, ऐसा नियम नहीं है, त्रस जीव का शरीर मांस है पर स्थावर का शरीर मांस नहीं है, जैसे पिता पुरुष ही है पर सब पुरुष पिता नहीं होते हैं।

Some argue that meat is the body of a living being and that fruits and vegetables too are the bodies of living beings, so why is meat forbidden while fruit is allowed? The answer is that although meat is the body of a living being, it is not a rule that every living being's body is meat: the body of a mobile (trasa) being is meat, but the body of an immobile (sthavar) being is not — just as every father is a man, but not every man is a father.

— आराध्य सूत्र · #8

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वनमाला और लक्ष्मण का संवाद आगम सम्मत– लक्ष्मण ने कहा! ''मुझे छोड़ दो'' कार्य हो जाने पर मैं तुम्हें लेने आऊँगा, मुझे देव आदि की शपथ है, लेकिन वनमाला को उनके आने में संदेह हुआ, तब लक्ष्मण ने कहा कि, सुनो यदि मैं न आऊँ तो मुझे रात्रि भोजन का पाप लगे। (धर्म संग्रह श्राव. अधिकार-३] श्लोक २८/२९) रामचन्द्र जी को अच्छी तरह व्यवस्थित करके यदि मैं तुम्हारे पास न आऊँ तो मुझे (लक्ष्मण को) गौ हत्या, स्त्री हत्या आदि का पाप लगे। इस प्रकार अन्य शपथों के करने पर भी वनमाला ने लक्ष्मण से एक ही शपथ करायी कि आपको रात्रिभोजन का पाप लगे।
आहार
वर्षा ऋतु में जो रात्रिभोजन करता है उसकी सैकड़ों चन्द्रायण व्रतों से भी शुद्धि नहीं हो सकती है। कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कला की तरह एक-एक ग्रास घटाना शुक्ल पक्ष में एक-एक ग्रास बढ़ाना इस प्रकार एक माह में एक चन्द्रायण व्रत होता है। ''सूर्य के अस्त हो जाने से हृदय और नाभि में स्थित कमल भी बंद हो जाता है इसलिए रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।''
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुँआ जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
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