Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
आहार

रात्रिभोजन के पाप से जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं, लोक में जो रोगी, दरिद्र और क्रूर पुरुष दिखाई देते हैं, वे भी रात्रिभोजन के पाप से दिखाई देते हैं, जिनके हाथ-पैर फटे हैं, जो दीन हैं, लकड़ी और घास ढोते हैं, मलिन वस्त्र वाले हैं तथा नीच कुल में उत्पन्न हैं, वे सब रात्रिभोजन करने से ही होते हैं, रात्रिभोजन के फल से मनुष्य रोग से पीड़ित, दूसरों के घरेलू नौकर तथा अपने बन्धुजनों से रहित होते हैं, रात्रि में भोजन करने वाला मिथ्यादृष्टि मनुष्य सूकर, भेड़िया, बिलाव, उल्लू तथा कौआ आदि की योनियों में उत्पन्न होता है।

Through the sin of night-eating beings fall into evil births; the diseased, poor and cruel persons seen in the world are seen so because of the sin of night-eating; those with cracked hands and feet, the wretched, carriers of wood and grass, in dirty clothes and born in low families — all are so from night-eating. As its fruit people become disease-ridden, domestic servants of others, and bereft of kin; a wrong-believing person who eats at night is born in the wombs of pigs, wolves, cats, owls, crows and the like.

— आराध्य सूत्र · #23

इसी विषय के और सूत्र

सभी आहार →
वनमाला और लक्ष्मण का संवाद आगम सम्मत– लक्ष्मण ने कहा! ''मुझे छोड़ दो'' कार्य हो जाने पर मैं तुम्हें लेने आऊँगा, मुझे देव आदि की शपथ है, लेकिन वनमाला को उनके आने में संदेह हुआ, तब लक्ष्मण ने कहा कि, सुनो यदि मैं न आऊँ तो मुझे रात्रि भोजन का पाप लगे। (धर्म संग्रह श्राव. अधिकार-३] श्लोक २८/२९) रामचन्द्र जी को अच्छी तरह व्यवस्थित करके यदि मैं तुम्हारे पास न आऊँ तो मुझे (लक्ष्मण को) गौ हत्या, स्त्री हत्या आदि का पाप लगे। इस प्रकार अन्य शपथों के करने पर भी वनमाला ने लक्ष्मण से एक ही शपथ करायी कि आपको रात्रिभोजन का पाप लगे।
आहार
वर्षा ऋतु में जो रात्रिभोजन करता है उसकी सैकड़ों चन्द्रायण व्रतों से भी शुद्धि नहीं हो सकती है। कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कला की तरह एक-एक ग्रास घटाना शुक्ल पक्ष में एक-एक ग्रास बढ़ाना इस प्रकार एक माह में एक चन्द्रायण व्रत होता है। ''सूर्य के अस्त हो जाने से हृदय और नाभि में स्थित कमल भी बंद हो जाता है इसलिए रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।''
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुँआ जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
आहार