Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कर्म

चरिया पमादबहुला, कालुस्सं लोलदाय विसयेसु। परपरितावपवादो, पावस्सय आसवं कुणदि।। सण्णाओ य ति लेस्सा, इंदियवसदाय अत्तरुद्दाणि। णाणं च दुप्पउत्तं मोहो पावप्पदा होंति।।

प्रमाद युक्त चर्या, परिणामों की मलिनता, विषयों की लोलुपता, दूसरे को कष्ट देना, परनिन्दा करना, आहार, भय, मैथुन, परिग्रह ये चार संज्ञाएँ, कृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्यायें, इन्द्रियों की पराधीनता, आर्त-रौद्र ध्यान, ज्ञान का दुरुपयोग और मोह ये सभी 'पाप आस्रव के कारण' हैं।

Negligent conduct, impurity of intentions, craving for sense-objects, tormenting others, slander, the four instincts (food, fear, sex, possession), the three dark leshyas (black, blue, grey), enslavement to the senses, sorrowful and cruel meditation, misuse of knowledge, and delusion — all these are causes of the influx of sin.

— आराध्य सूत्र · #2

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