बन्धु विरोध करे सगरे, झगरे नित होत सुधारस चाँटत, मित्र करे करनी रिपु की, धरणीधर देखत न्याव न पाटत। पूत कपूत का कार्य करे, नारी सती पति सो चित पाटत, या विधिना प्रतिकूल भये तब, ऊँट चढ़े पे कूकर काटत।। — अर्थात् 'पाप के उदय में' बन्धु विरोध करने लग जाते हैं, अमृत चाँटते हुए भी झगड़े होते हैं, मित्र शत्रु जैसा व्यवहार करने लग जाता है, राजा देखते हुए भी न्याय नहीं करता है, पुत्र कुपुत्र का काम करने लग जाता है, सती स्त्री भी पति से विरक्त हो जाती है, ऊँट पर सवारी करने पर भी कुत्ता काट देता है।
When sin ripens, kinsmen turn hostile; quarrels arise even while savoring nectar; a friend behaves like an enemy; a king watches yet does not do justice; a son turns wayward; even a chaste, devoted wife grows cold toward her husband; and one seated high on a camel is still bitten by a dog.
— आराध्य सूत्र · #1
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