Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 94

धर्मध्यान के बाह्य लक्षण। भगवान का विहार।

40 सूत्र

अन्धा मन्दिर जा रहा था, किसी ने कहा तुम्हें दिखता नहीं है तो मन्दिर क्यों जाते हो? उसने कहा! हमें नहीं दिखता तो क्या भगवान को भी नहीं दिखता है?
भक्ति
मन्दिर के शिखर को देखकर प्रणाम करना, मालूम नहीं मन्दिर तक पहुँच पाते कि नहीं।
भक्ति
मूर्ति में मूर्तिमान के दर्शन करना चाहिए।
भक्ति
'प्रभू चरण छह तीन रहू, दुनिया से छत्तीस' भगवद् भक्ति 63 की तरह, संसार से उदासीनता 36 की तरह होना चाहिए।
भक्ति
धर्मध्यान के बाह्य लक्षण- शास्त्र के अर्थ की खोज करना, शीलव्रत का पालन करना, गुणों के समूह में अनुराग रखना, अङ्गड़ाई, जमुहाई, छींक, डकार और श्वासोच्छ्वास में मन्दता होना शरीर को निश्चल रखना, आत्मा को व्रतों से युक्त करना आदि धर्मध्यान के बाह्य लक्षण हैं।
ध्यान
भगवान् के विहार की महिमा- जिस मार्ग से भगवान् का विहार होता है, वह मार्ग अपने चिन्हों से एक वर्ष तक यह प्रकट करता है कि वहाँ से भगवान् का विहार हुआ है, तथा रत्नवृष्टि से वह मार्ग ऐसा सुशोभित होता है जैसे नक्षत्रों के समूह से चन्द्रमा सुशोभित होता है, उस समय मन्दबुद्धि मनुष्य तीक्ष्णबुद्धि के धारक हो जाते हैं, समस्त हिंसक जीव अहिंसक हो जाते हैं और भगवान् के विहार से अनुगृहीत भूमि में दो सौ योजन तक उपद्रव आदि नहीं होते हैं और पचास वर्ष तक कोई उपद्रव-दुर्भिक्ष आदि नहीं होता है, भगवान् के समीप रहने वाले लोगों को खेद, पसीना, पीड़ा तथा चिन्ता आदि कुछ भी उपद्रव नहीं होता है।
भक्ति
दीक्षोपरान्त उपवास- सुमतिनाथ और मल्लिनाथ भगवान् ने भोजन करने के बाद दीक्षा धारण की तथा दीक्षा के तीन दिन के बाद तीन दिन का उपवास लिया, पार्श्वनाथ और वासुपूज्य भगवान् ने दीक्षा के बाद एक दिन का उपवास धारण किया था और शेष तीर्थंकरों ने दो दिन का उपवास लिया था, किन्तु आदिनाथ भगवान् की दीक्षा लेने के बाद छह माह के अनशन की कथा सर्वत्र प्रसिद्ध है।
धर्म
केवलज्ञान उत्पत्ति स्थान- वृषभनाथ भगवान् को पूर्वताल नगर के सकटामुख वन में, नेमिनाथ भगवान् को गिरनार पर्वत पर, पार्श्वनाथ भगवान को आश्रम के समीप, महावीर भगवान को ऋजुकूला नदी के तट पर शेष तीर्थंङ्करों को अपने-अपने नगर के उद्यान में केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था।
ज्ञान
वृषभनाथ, श्रेयाँसनाथ, मल्लिनाथ, नेमिनाथ और पार्श्वनाथ भगवान् को पूर्वाण्ह काल में शेष को अपराण्ह काल में केवलोत्पत्ति हुयी थी।
ज्ञान
जिनेन्द्र भगवान् के स्तवन करने से अनेक विघ्न, शाकिनी, भूत, सर्प एवं विष भी निर्विषता को प्राप्त हो जाते हैं।
भक्ति
देवाधिदेव के चरणों की पूजा समस्त दुःखों का नाश करने वाली है, मनोरथों को पूर्ण करने वाली है, काम का नाश करने वाली है, इसलिए विनय पूर्वक नित्य पूजा करनी चाहिये।
भक्ति
लोग विष को दूर करने के लिए मणि, मन्त्र, औषधि, रसायन आदि को ढूँढते हैं पर वे यह नहीं समझते कि हे भगवन्! वे सब आपके ही पर्यायवाची नाम हैं।
भक्ति
अज्ञानी प्राणी सुख को प्राप्त करने के लिए दुःख के साधन जुटाता है, गुण प्राप्त करने के लिए दोष देखता है, धर्म के लिए पाप करता है, उसका ऐसा करना मानो तैल के लिए रेत पेलने जैसा है।
विवेक
जिन भगवान् की पूजा के भाव से मेंढक क्षण भर में ऋद्धिधारी देव हो गया, फिर सच्चे भक्त मोक्ष प्राप्त कर लें तो क्या आश्चर्य है? वे महावीर भगवान् मेरे नेत्रों के पथगामी बनें।
भक्ति
विशुद्ध ज्ञान और निर्मल चरित्र के रहते हुए भी यदि जिनेन्द्र भगवान् में उत्कृष्ट भक्ति नहीं है, तो फिर मिथ्यात्व रूपी मुद्रा से अङ्कित मोक्ष मन्दिर का द्वार कैसे खोला जा सकता है।
भक्ति
जिसको संसार समुद्र को सुखाना हो, वह जिनेन्द्र भगवान् के चरणों की सेवा करे, यदि जिनेन्द्र भगवान् के चरण न मिलें, तो स्वेच्छानुसार भावपूजा, जाप, ध्यान आदि कर लें, पर कुदेवों का पूजन न करें, क्योंकि प्राणी भूख मिटाने के लिए अन्न मिलता है तो ही खाता है, अन्यथा भूखा बैठा रहता है, पर भूख मिटाने के लिए कालकूट जहर नहीं खाता है, कुदेव कालकूट जहर से भी ज्यादा हानिकारक हैं।
भक्ति
हे जनबांधव! मैंने आपका नाम सुना, पूजा की, दर्शन भी किए, किन्तु भक्ति पूर्वक हृदय में धारण नहीं किया इसलिए दुःखों का पात्र हुआ हूँ, क्योंकि भाव शून्य क्रिया पूर्ण फलदायी नहीं होती है।
भक्ति
जिनेन्द्र भगवान् में मेरी भक्ति हो, जिनेन्द्र भगवान् में मेरी भक्ति हो, जिनेन्द्र भगवान् में मेरी भक्ति हो, हमेशा हो, हमेशा हो, हमेशा हो, पूज्यपाद महाराज जी ने ऐसी भावना व्यक्त की है।
भक्ति
हे भगवन्! आपका स्तवन करने से अनेक भवों के पाप क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार रात्रि कालीन अन्धकार सूर्य की किरणों से क्षण भर में नष्ट हो जाता है।
भक्ति
हे भगवन्! समस्त दोषों से रहित आपका स्तवन तो दूर रहे, आपका नाम ही संसारी प्राणियों के पापों को नष्ट करता है, जिस प्रकार सूर्य दूर ही रहता है, किन्तु उसकी किरणें ही तालाबों में कमलों को विकसित कर देती हैं।
भक्ति
देवों का आगमन, आकाश में गमन, चमर आदि समवसरण की विभूति तो मायावियों में भी देखी जाती है अतः इन से नहीं किन्तु वीतरागता, सर्वज्ञता और हितोपदेशिता से भगवान् आप महान् हैं।
भक्ति
बिम्ब के फल बराबर जिनालय बनवाता है या यव के बराबर भक्ति पूर्वक प्रतिमा स्थापन करवाता है उसके पुण्य का वर्णन सरस्वती देवी भी नहीं कर सकती, फिर जो जिनप्रतिमा-जिनालय दोनों बनवाते हैं, उनका तो कहना ही क्या?
भक्ति
लोग एक मुट्ठी चावल को निर्माल्य समझते हैं, मन्दिर के पैसे बिजली आदि को निर्माल्य नहीं समझते, जो निर्माल्य खाता है उसकी पीठ पर कूबड़ होती है, अगले जन्म में देवों के विमान को खींचता है।
धर्म
व्यन्तरों का सर्वत्र आवास होता है, उनसे स्वीकृति लेकर कार्य करें, नहीं तो बाधायें उपस्थित होती हैं।
विविध
जाप/सामायिक ईशान दिशा में बैठकर करने से विशेष लाभ होता है, दक्षिण में जाप-स्वाध्याय वर्जित है एवं अभिषेक पूजा उत्तर मुख होकर करना चाहिए।
ध्यान
यदि भगवान् की दृष्टि बाहर नहीं जाती है तो समाज की उन्नति नहीं हो सकती है, भगवान् की दृष्टि जितनी दूर जाती है समाज उतनी सुखी रहती है।
विविध
नन्दीश्वर द्वीप में अकृत्रिम प्रतिमाओं का अभिषेक होता है।
भक्ति
जो श्रावक खाली हाथ मन्दिर जाता है वह मन्दिर से खाली हाथ ही वापस आता है।
भक्ति
दुनिया को छोड़ो तब भगवान् मिलते हैं, भगवान् को भी छोड़ो तब आत्मा मिलती है।
अनासक्ति
भगवान् का पादमूल मेरे अन्दर की पवित्रता का कारण है अतः काया की आराधना नहीं काया के माध्यम से भगवान् के गुणों की आराधना की जाती है, तभी स्तुति होती है और ऋद्धियाँ भी प्रकट होती हैं।
भक्ति
अनावश्यक पत्थर निकाल देने पर मूर्ति बनती है और कर्म नोकर्म का भार दूर होने पर भगवान् आत्मा प्रकट होती है।
कर्म
देव-शास्त्र-गुरू का चेहरा नहीं स्वरूप का दर्शन-चिन्तन किया जाता है।
भक्ति
सिद्धों का नाम लेने वाले भी पूज्य हैं, धन्य हैं व गुणी हैं।
भक्ति
जिनबिम्ब एक्स-रे के समान होता है, दर्पण केमरे के समान होता है।
भक्ति
हे जिनेन्द्र! चर्म मय नेत्र से भी आपका दर्शन होने पर वह पुण्य प्राप्त होता है, जो भविष्य में केवलज्ञान प्राप्त कराता है, फिर अन्तर्मन से दर्शन करने पर तो शीघ्र ही केवलज्ञान प्राप्त होता है।
भक्ति
दुर्जनों को गले लगाना सच्चा शङ्कर बनने का रास्ता प्रभु ने बताया है।
क्षमा
सेठ की सेवा के लिए गरीब बालक तीर्थ यात्रा में गये थे, सेठ से पहले ज्वाँर के दाने चढ़ाये और भगवान् से पहले प्रार्थना की और कहा ‘भगवन् क्षमा करना हम गरीब हैं’ और आकर सो गये, सेठ ने सोचा मुझसे पहले कौन मोती चढ़ा कर गया है, पता चला बच्चों ने ज्वाँर के दाने चढ़ाये थे वे मोती बन गये तब सेठ का गर्व चूर-चूर हो गया, भक्ति के लिए सोना-चाँदी की नहीं श्रद्धा और समर्पण की आवश्यकता होती है।
भक्ति
नारद जी गङ्गा स्नान करने गये, घाट पर एक कन्या रो रही थी, पचास-पचास साल के ज्ञान और वैराग्य नामक दो मृत पुत्र पड़े थे, कन्या का नाम था भक्ति, पञ्चम काल में ज्ञान और वैराग्य बूढ़े हो गये किन्तु भक्ति रूपी माँ युवती है अर्थात् संगीत से सब झूमने लगते हैं अतः क्षयोपशम के अनुसार अपने ज्ञान और वैराग्य को बढ़ाते हुए भक्ति के माध्यम से अपना कल्याण करना चाहिए।
भक्ति
सास अपनी बहु को मन्दिर ले गयी उसे गाय को देखकर दूध की याद आ गयी राक्षस का स्टेच्यु देखकर डर गयी, सास ने कहा इसी प्रकार भगवान् के दर्शन से अपने स्वरूप की याद आ जाती है, इसलिए जिनदर्शन जरूरी है, अतः हमें अन्य को न देखकर अपने आदर्श को देखना चाहिए जिससे हमें उन जैसा बनने की प्रेरणा मिलती रहे।
भक्ति
पाकिस्तान में चालीस जैन परिवार थे, आतङ्कवाद से परेशान होकर मन्दिर सहित पाकिस्तान छोड़ने का विचार किया हवाई अड्डे पर अङ्ग्रेज गवर्नर ने कहा प्रति व्यक्ति इतना सामान ले जा सकते हो आस्थावान लोगों ने अपनी सम्पति वहीं छोड़ दी जयपुर में घास की झोपड़ी में भगवान विराजमान किये परिश्रम करके पहले पूजन द्रव्य फिर भोजन द्रव्य खरीदते थे कुछ दिन बाद पहले मन्दिर फिर घर बनवाया। जो खाली हाथ आये थे, वास्तव में जिसके पास धर्म है वह खाली नहीं कहलाता है, बाद में वे सब मालामाल हो गये, अतः आस्था रखकर आयतानों की रक्षा करना चाहिए।
भक्ति