Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 270

अकलङ्क और निकलङ्क।

26 सूत्र

मुनियों के 28 मूलगुणों का पालन अभयदान के लिए है।
अहिंसा
ज्ञान दान-शास्त्रदान से शास्त्ररूपी सागर का पारगामी, अज्ञान अन्धकार को भेदने वाला तथा रागादि की सन्तति को मिटाने वाला होता है।
ज्ञान
दान की महिमा- आहारदान से भोगभूमि, ज्ञानदान से केवलज्ञान, आवासदान से स्वर्ग, औषधिदान से कामदेव के पद की प्राप्ति होती है।
दान
कोण्डेश ग्वाला ने शास्त्रका दान दिया जिससे वह महान आचार्य कुन्दकुन्द महाराज बना।
ज्ञान
अकलङ्क और निकलङ्क-मान्यखेट के राजा शुभतुङ्ग के मन्त्री का नाम पुरुषोत्तम पत्नी का नाम पद्मावती इनके दो पुत्र थे अकलङ्क और निकलङ्क। एक वार अष्टान्हिक पर्व में मन्त्री और उनकी पत्नी ने आठ दिन का ब्रह्मचर्य व्रत लिया, साथ ही दोनों पुत्रों को भी व्रत दिला दिया। युवावस्था में जब पिताजी ने दोनों से विवाह करने को कहा, तो दोनों ने मना कर दिया। पिताजी ने उनको खूब समझाया कि व्रत की अवधि तो केवल आठ दिन की थी, अब विवाह करने में कोई परेशानी नहीं है। परन्तु दोनों ने कहा व्रत की अवधि आठ दिन थी, पर हमारे लिए आठ दिन की अवधि नहीं थी। यह बोलकर दोनों ने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और धार्मिक अध्ययन में तत्पर हो गये। दोनों बौद्ध धर्माचार्य के पास पढ़ने लगे, एक दिन बौद्धगुरु पढ़ाते-पढ़ाते किसी विषय को समझा नहीं सके और वे चिन्तित होकर बाहर चले गये। प्रकरण सप्तभङ्गी का था, अकलङ्क ने समय पाकर उसे हल कर दिया। बौद्ध गुरु ने उसे देखा, तो सोचने लगे की यहाँ कोई जैन विद्यार्थी है, जो भेष बदलकर पढ़ रहा है। उसकी खोज करने के लिए रात को सिपाहियों को भेजा और दोनों को पहचानकर जेल में बन्द करा दिया। समय पाकर दोनों जेल से भाग निकले तो किसी ने देख लिया और सैनिकों को उनके पीछे भेज दिया। दोनों भागते-भागते एक तालाब के पास पहुँचे वहाँ निकलङ्क ने भाई अकलङ्क से कहा कि आप यहाँ छिप जाइये आप एक पाठी हैं, आप सुरक्षित रहोगे तो जैन धर्म आगे चलता रहेगा। बहुत मनाने के बाद अकलङ्क वहाँ छिप गये, निकलङ्क आगे भाग गये। एक स्थान पर एक धोबी ने पूँछा की आप क्यों भाग रहे हो? तो उन्होंने बताया की मेरे पीछे सैनिक पकड़ने के लिए आ रहे हैं, तो डर कर वह धोबी भी साथ में भागने लगा। जब वे थक गये तो सैनिकों ने दोनों को अकलङ्क-निकलङ्क समझ कर मार डाला। जब अकलङ्क को यह पता चला तो बहुत दुखी हुए। उन्होंने बाद में मुनि दीक्षा लेली और तत्त्वार्थ राजवार्तिक सभाष्य, अष्टशती लघीयस्त्रय सविवृत्ति, न्याय विनिश्चय सविवृत्ति, सिद्धि विनिश्चय, प्रमाण सङ्ग्रह, स्वरूप सम्बोधन बृहत्त्रयम्, न्याय चूलिका, अकलङ्क स्तोत्र इत्यादि ग्रन्थों की रचना की। जिनशासन की प्रभावना के लिए आचार्य अकलङ्क देव ने अपने भाई निकलङ्क का महान त्याग किया था।
धर्म
कमाई का पच्चीस प्रतिशत बचा कर रखना चाहिए, पच्चीस प्रतिशत व्यापार में लगाना चाहिए, पच्चीस प्रतिशत धर्म और भोगोपभोग में लगाना चाहिए, पच्चीस प्रतिशत परिवार के भरण पोषण में लगाना चाहिए।
धन
जो अहङ्कारी अधम पुरुष मोह के कारण विनम्र एवं बुद्धिमान श्रोता के रहते हुए निषिद्ध मन्दबुद्धि श्रोता को व्याख्यान करता है, उसका रत्नत्रय रुपी जहाज भग्न हो जाता है और बोधि से रहित होकर संसार समुद्र में डूब जाता है।
ज्ञान
संसार शरीर भोगों से विरक्त हो समस्त पदार्थों में मोह को छोड़ने से त्याग धर्म होता है ऐसा जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है।
अनासक्ति
हे गुणवान् मेघ! तुम अशरण चातक पक्षी को छोड़कर पर्वत पर एवं समुद्र में क्यों बरसते हो? अर्थात् मेघान्योक्ति के द्वारा कहा गया है की हे धनवानों! जिन्हें पैसों की आवश्यकता है उन्हें छोड़कर तुम धनवानों के लिए धन क्यों लुटाते हो?
दान
हे मेघ! तू कठोर क्यों गरजता है, बरसता तो कुछ ही बून्दे है, मत बरस-मत बरस किन्तु कठोर गर्जना तो शीघ्र छोड़ दे 'यहाँ पर भी मेघान्योक्ति के माध्यम से कहा गया है कि' हे धनवान्! तू याचकों को देता तो थोड़ा है और डांटता बहुत है, तू भले ही दान मत दे, पर डाँटना तो शीघ्र छोड़ दे।
वाणी
हे चन्दन के वृक्ष! तू अपने समीप बैठे साँपों को दूर कर, जिससे कि ये जगत तेरी श्रेष्ठ सुगन्धी को ले सकें, यहाँ भी चन्दनपादपान्योक्ति के माध्यम से कहा गया है कि हे धनवान! तू अपने समीप बैठे साँपों के सामान इन दान में अन्तराय डालने वाले लोगों को हटा, जिससे कि तेरे धन का सदुपयोग हो सके।
दान
हे रोहण पर्वत! तेरे रत्नों को लोग ले गये हैं, तो तू शोक मत कर, शीघ्र ही बादलों की ध्वनि से तुझे बहुत सारे रत्नों की प्राप्ति हो जायगी, यहाँ रोहणगिरी अन्योक्ति के माध्यम से कहा गया है, कि हे धनवान! तू दान देकर पश्चाताप मत कर तुझे पुण्य के उदय से बाद में अनन्त गुना धन प्राप्त होगा।
दान
प्यास रुपी दानव से पीड़ित विपत्ति को प्राप्त मनुष्य को देखकर चञ्चल लहरों के बहाने नृत्य करते हुए हे समुद्र! तू लज्जित क्यों नहीं होता है, यहाँ पर समुद्र अन्योक्ति के माध्यम से कहा गया है, कि हे धनवान! दरिद्रता रुपी दानव से पीड़ित मनुष्य को देखकर अपने धन का अनाप-शनाप दुरुपयोग करते हुए तुझे लज्जा क्यों नहीं आती है?
दान
हे खजूर के वृक्ष! तू अपने ऊँचे होने का अहङ्कार क्यों करता है, फल तो दूर तेरी छाया भी तो राहगीरों के काम नहीं आती है, यहाँ खर्जूर अन्योक्ति के माध्यम से कहा गया है, कि हे धनवान! तू अपने सम्पन्न होने का अहङ्कार क्यों करता है क्योंकि, धन की तो बात दूर तेरा तन भी तो किसी के काम नहीं आता है।
दान
हे धान के पौधे! मैं छोटा हूँ ऐसा मानकर तू खेद-खिन्न क्यों होता है? सारा जगत तेरी बदौलत ही जीवित है इसलिए समस्त भू-भाग पर तू ही धन्य है, यहाँ पर धान्य के पौधे के माध्यम से अल्प धनवान को समझाया गया है कि हे भाई मेरे पास कम धन है ऐसा मानकर तू क्यों दुःखी होता है? क्योंकि जितना भी है तेरा धन दूसरों के काम तो आता है, इसलिए पृथ्वी पर तू धन्य है, अर्थात् जिनका तन-मन-धन किसी के काम नहीं आता उनसे तो तू अच्छा है।
संतोष
जो मनुष्य मन-वचन-काय की विशुद्धि से शुद्ध होकर पात्र के लिए आहार मात्र देता है, जो कि संसार समुद्र से तैरने के लिये बीज के सामान है, उसके पुण्य के लिए इन्द्र भी अभिलाषा करता है।
दान
इस लोक सम्बन्धी फल की अपेक्षा से रहित, क्षमा, निष्कपटता, ईर्ष्या रहित, खेद रहित, प्रसन्नता सहित और अहङ्कार रहित होना ये आहार दाता के सात गुण हैं।
दान
पड़गाहन करना, उच्चासन देना, पाद प्रक्षालन, पूजन, नमोस्तु, मन-वचन-काय की शुद्धि एवं आहारजल की शुद्धि ये नवधा भक्ति मानी गई है।
दान
साधु को वही आहार देना चाहिए जिससे राग, द्वेष, असंयम, मद, दुःख, भय आदि उत्पन्न न हो एवं स्वाध्याय और तप की वृद्धि हो।
दान
मुनि उत्कृष्ट पात्र हैं, अणुव्रती मध्यम पात्र है, अविरत सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र है, सम्यग्दर्शन रहित और व्रत सहित कुपात्र है सम्यग्दर्शन और व्रत दोनों से रहित अपात्र हैं।
दान
पात्र को दिया हुआ थोड़ा भी दान, समय पाकर प्राणियों को वट वृक्ष की तरह बहुत फल देने वाला होता है।
दान
अन्नदान के समान कोई दान नहीं, समता के समान कोई तप नहीं, वीतरागता के समान कोई देव नहीं और दया के समान कोई धर्म नहीं है।
दान
आहार मात्र देने के लिए साधु की परीक्षा नहीं करना चाहिए, वे भावलिंगी हो या न हो गृहस्थ तो दान देने से शुद्ध होता है।
दान
अहो! बड़े आश्चर्य की बात है कि कलिकाल के होने पर और चित्त की चंचलता होने पर और शरीर अन्न का कीड़ा होने पर भी आज जिन लिंग के धारी जीवों का दर्शन हो रह है।
धर्म
भोगने योग्य पदार्थ, भोजन, शक्ति, रतिशक्ति, श्रेष्ठ स्त्रियाँ, वैभव, दान देने की शक्ति, ये सब स्वयं दान देने से प्राप्त होते हैं।
दान
जो अपने धन का स्वयं दान न करके दूसरों से करवाता है, वह भोगों को अवश्य प्राप्त होता है पर उसका भोग दूसरे करते हैं।
दान