Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 62

सबका हित साहित्य से है

59 सूत्र

जिससे तत्त्व का बोध होता है, जिससे मन का निरोध होता है, जिससे आत्मा शुद्ध होती है, जिनशासन में उसका नाम है ज्ञान।
ज्ञान
मेघ चाहे उपाधियाँ व जागीरें बरसा दें, धन चाहे हमें खोजे किन्तु ज्ञान को तो हमें ही खोजना पड़ेगा।
ज्ञान
ज्ञान के बिना उज्ज्वल भविष्य का और कोई मार्ग नहीं है।
ज्ञान
पालने से लेकर श्मशान तक ज्ञान प्राप्त करते रहो।
ज्ञान
आयु कर्म की उदीरणा किसी भी नशे से हो सकती है अतः नशा आत्महत्या के कारण हैं।
स्वास्थ्य
अनाकुलता का मूल प्रसिद्धि नहीं आत्म विशुद्धि है, मंदिर की द्रव्य थाली भर चढ़ाते हैं, पुण्य झोली भर चाहते हैं और दान एक रुपया नहीं देना चाहते, जो ऐसा करते हैं वे मंदिर से लोन लेते जाते हैं किन्तु जमा कुछ नहीं करते हैं।
दान
सत्साधना में बढ़ते हुए योगी को यदि गिरने का कोई निमित्त है तो प्रतिष्ठा।
धर्म
मैं बड़ों की इज्जत इसलिए करता हूँ कि उन्होंने हमसे ज्यादा आराधना की है, मैं छोटों की इज्जत इसलिए करता हूँ कि उन्होंने हमसे कम अपराध किए हैं।
विनम्रता
सत्य की खोज में किए गए प्रयास का नाम विज्ञान है लेकिन सत्य का प्रतिपादन करने वाले ज्ञान का नाम वीतराग विज्ञान हैं।
ज्ञान
प्रथम प्रहर में दुनिया, द्वितीय प्रहर में भोगी, तृतीय प्रहर में चोर, अंतिम प्रहर में योगी जागता है, देर से सोना, देर तक सोये रहना दरिद्रता का कारण है, जल्दी सोना, जल्दी उठना अच्छी हेल्थ और वेल्थ का कारण है, जो हर रोज उगते सूरज को देखते हैं, उनका पूरा दिन उगा हुआ रहता है, जो सूर्योदय के बाद भी सोये पड़े रहते हैं उनका भाग्य भी सो जाता है।
समय
आपके व्यक्तित्व का आइना होती है, आपकी वेशभूषा।
चरित्र
पर के निमित्त अपनी निराकुलता क्यों खोते हो?
मन
यातायात नियम–ट्रैफिक के नियम और उन्हें क्यों पालन करना है, उससे हमारा और सभी का क्या फायदा है? १८ वर्ष के पहले वाहन क्यों नहीं चलाना ? लायसेंस बनाने के पश्चात् ही चलाना आदि की शिक्षा आवश्यक है।
विविध
वैसे तो सभी इन्द्रियज्ञान प्रायः समता के बाधक हैं किन्तु आँख द्वारा अवलोकन अधिक बाधक है अतः नेत्रोपयोग निजचर्या में ही करो यथा लिखने में, पढ़ने में, चलने में, उठने–बैठने में, चीज उठाने रखने में, दर्शन में, पूजन में, वंदन में, वैय्यावृत्य में, भोजन में, धर्मात्माओं से वार्तालाप में, दुखियों को समझाने में और नित्य क्रिया में।
संयम
हजार वर्ष पहले स्थिति बड़ी दयनीय थी। आतातायी राजाओं ने भारत के विभिन्न भागों पर कब्जा कर लिया और बौद्धों ने उन राजाओं को प्रभावित कर लिया।
विविध
साम्प्रदायिक द्वेष वशात् जैनों की पाठशालाओं, गुरुकुलों और मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया इसलिए अकलंक-निकलंक को बाहर से बौद्ध बनकर नालंदा के बौद्ध विश्वविद्यालय में जाना पड़ा।
विविध
पश्चाताप कोई भी कर सकता, प्रायश्चित्त तप धर्मात्मा ही ग्रहण करते हैं।
धर्म
मंदिर जी के गर्भगृह का वही महत्त्व है, जो हमारे शरीर में पेट का है, गर्भगृह में ऊर्जा संग्रहीत होती है, बिजली पानी को पहले संगृहीत किया जाता है फिर प्रवाहित किया जाता है उसी प्रकार मंदिरों और शिखरों में मंत्रादि से ऊर्जा संग्रहीत होती है अतः उन्हें पवित्र रखना चाहिए।
भक्ति
बरसात न अच्छी होती न खराब जरूरत पर निर्भर है, उसी प्रकार दान जहाँ, जितना, जो आवश्यक है वहाँ उतना, वही महत्त्वपूर्ण हैं।
दान
व्यवहार में किसी के बल पर कोई कार्य मत करो अन्यथा शल्य व संक्लेश मिलेगा।
विविध
जो उपदेश का लक्ष्य केवल पर को ही बनाते है, वे मूर्ख हैं।
विवेक
दिशाओं के सम्बन्ध में विचार करना गलत नहीं पर दिशायें ही सब-कुछ नहीं हैं।
विविध
जैनदर्शन में वीतरागता और अहिंसा के विषय में कभी दो प्रमाण नहीं मिलेंगे।
धर्म
जैसे किसी कैदी को न्यायालय से बरी होने का आदेश प्राप्त हो लेकिन अभी वह जेल में है और ड्रेस भी जेल की पहने है उस समय वह जेल की नहीं बल्कि जेल से मुक्ति की अनुभूति करता है, उसी प्रकार अरहंत भगवान् को भाव मोक्ष होने से अनंत सुख है।
धर्म
कल्की धर्म का नाश करता उपकल्की धर्म को बढ़ाता है।
धर्म
देव-शास्त्र-गुरु समान होते हुए भी भगवान् के समान जिनवाणी की स्थापना नहीं होती गुरु को बिना नहाये भी छू लेते है पर स्त्रियाँ नहीं छूती हैं।
धर्म
एक व्यक्ति के पास सौ का नोट है वह न पुण्य रूप है न पापरूप, उस नोट को दान में दिया जा रहा है तो पुण्य रूप है, शराब खरीदी जा रही है तो पापरूप, उसी प्रकार वर्गणाएँ होती हैं, पाप भाव से पाप रूप पुण्य भाव से पुण्य रूप परिणमन कर जाती हैं।
कर्म
पंचक में मरण होने पर श्मशान में ५ श्रीफल रखें जलाये नहीं एवं ५ बार णमोकार मंत्र पढ़ें नैमित्तिक दोष दूर हो जायेगा।
णमोकार
जिन्दगी की आवश्यक वस्तु की कामना से यदि भक्ति की जाती है तो वह न तो नियम है, न मिथ्यात्व है, न सकाम भाव है, वह एक मजबूरी है यदि कोई घर में बीमार हो गया णमोकार नहीं पढ़े तो क्या करें? भक्तामर नहीं पढ़े तो क्या करें? भगवान् से भोग विलास की याचना करना निदान है।
भक्ति
सामान्य व्यक्ति की दृष्टि नकारात्मक ऊर्जा वाली एवं आचार्य भगवन् मंत्र में सकारात्मक ऊर्जा देते हैं इसलिए परदे के पीछे से देते हैं।
णमोकार
बेटे को शेर पकड़े तो बचाते हैं, उसी प्रकार दूसरे जीवों की रक्षा करना चाहिए।
अहिंसा
दो के बीच बात हो रही हो और आवश्यक हो तो कहे 'क्षमा करें' आपको दखल देना पड़ रहा है यह कहकर ही बात करें, किसी के कमरे में संकेत देकर ही जाये।
चरित्र
जो कार्य अचानक कभी हो वह दोष है लेकिन जिसे सुधारा जा सकता है उस कर्त्तव्य में उदासीनता करना प्रमाद है।
पुरुषार्थ
आताताई झुककर प्रवेश नहीं करते थे इसलिए पहले मंदिर जी के दरवाजे छोटे बनाये जाते थे।
विविध
देवों के पास जो विभूति है मनुष्यों के पास नहीं अतः विशेष रूप से देव पञ्चकल्याणक मनाते हैं, क्षीरसागर से देव ही जल ला सकते हैं।
भक्ति
रसना का सम्बन्ध मन से है, मन चंचल होता है अतः रसना को जीतना कठिन है।
संयम
प्रतिष्ठा पाठ में कहा है–केसर से रंगे चावल पुष्प संज्ञा को प्राप्त हैं।
भक्ति
जैसे धनी पुरुष पास में रखे हुए स्वर्ण में बढ़ा भाव सुनने के बाद घटता भाव सुनने पर, कुछ खर्च खराबी न होने पर भी दुःखी होता है, इसी प्रकार वास्तविक वैराग्य शून्य, ज्ञानी व त्यागी पुरुष प्राप्त ज्ञान व त्याग में बढ़े सम्मान की स्वीकारता कर चुकने के बाद सम्मान न होने पर, किसी के द्वारा कुछ हानि वा क्लेश नहीं दिये जाने पर भी दुःखी होता है अस्तु, उसके दुःख में उसकी ही तो मूल में भूल है।
अनासक्ति
कषाय करते समय यह तो विचार करो कि द्रव्य लिङ्गी साधु के अव्यक्त मिथ्याभाव मिथ्यात्व गुणस्थान सम्बन्धी सभी प्रकृतियों तक का बंध करा देता है तो क्या तेरे इस समय बंध नहीं हो रहा है? क्या इसका कुफल नहीं भोगना होगा?
कर्म
शारीरिक कष्ट से आत्मा की हानि नहीं और शरीर की भी विशेष हानि नहीं पर मानसिक व्यथा से आत्मा और शरीर दोनों की हानि है।
मन
दूसरे की मान कषाय पसंद न होना भी मान कषाय का फल है।
क्षमा
जिस प्रकार एक सूखे पेड़ को आग लगा दी जाये तो वह पूरा जंगल जला देता है, इसी प्रकार एक पापी पुत्र पूरे परिवार को बर्बाद कर देता है।
परिवार
कुछ पुस्तकें चखने के लिए, कुछ चबाने के लिए कुछ घोलकर पी जाने के लिए होती हैं।
ज्ञान
लक्ष्य भौतिक, सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक होना चाहिए।
पुरुषार्थ
एक से अधिक कार्य करने के लिए शारीरिक क्षमता की आवश्यकता नहीं है, उसके लिए मानसिक क्षमता की आवश्यकता है जितनी चादर उतने पैर पसारो, सदा एक नाव में सवार होओ, जितना सँभाल सको उतना ही करो, ज्यादा करोगे तो दूसरों के लिए, पैसा ज्यादा हो तो बुरी आदतें लग जाती हैं।
संतोष
जीवन ऐसा कुछ नहीं है जिसके प्रति गंभीर रहा जाए जीवन तुम्हारे हाथों में खेलने के लिए एक गेंद है। गेंद पकड़े मत रहें।
अनासक्ति
छोटे-छोटे खर्चों से सावधान रहिये एक छोटा-सा छेद बड़े जहाज को डुबा सकता है।
धन
मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान् बनता हैं।
चरित्र
अनेक महागुरुओं से हम साक्षात् नहीं मिल सकते लेकिन उनकी पुस्तकें हमारा सही मार्ग दर्शन कर सकती हैं।
ज्ञान
जूतों पर पॉलिश करने वाला अपाहिज पॉलिश कराने वालों को पहले पढ़ने पुस्तक देता था ताकि उतनी देर वह समय का सदुपयोग करें कुछ गुण ग्रहण करें और मेरी दयनीय दशा देखकर सहयोग न करें मैं कर्मयोग करूँ।
पुरुषार्थ
किसी भी कार्य में सामने वाले व्यक्ति की जरूरत को समझकर उसका समाधान किया जाये तो बहुत समय और ऊर्जा की बचत होगी।
विवेक
माँ, महात्मा, परमात्मा की तिजोरी की भाँति स्वयं रक्षा करना चाहिए अपनी तथा घर की रक्षा चौकीदार कर सकता है।
परिवार
शिक्षक, चिकित्सक, संत और शासक पथभ्रष्ट नहीं होना चाहिए संत की इच्छा शक्ति और शासक की कार्यशक्ति एक हो तो देश की तस्वीर बदल सकती है।
चरित्र
शिक्षा बुढ़ापे के लिए सबसे अच्छा प्रावधान है।
ज्ञान
पैसा ही सबकुछ नहीं अन्यथा तीर्थंकर क्यों त्याग करते, वे जानते थे कि पैसे से भोजन खरीद सकते है भूख नहीं, पुस्तक खरीद सकते ज्ञान नहीं, सुविधाएँ खरीद सकते हैं सुख नहीं, मंदिर बना सकते भगवत्ता नहीं खरीद सकते हैं।
धन
जरूरत समझे बिना किए गये कार्य के परिणाम ही व्यथित करते हैं।
विवेक
शिक्षा प्रणाली में १. शारीरिक शिक्षा–योगासन प्राणायाम, पौष्टिक आहार–विटामिन मिनरल प्रोटीन की उपलब्धता शरीर की आवश्यकता, सात्विक खाने के फायदे और गुण, फास्ट फूड के अवगुण/नुकसान और खाने का समय बताना चाहिए।
स्वास्थ्य
जल संरक्षण—पानी की कितनी कमी है और इसका महत्त्व पानी को कम से कम उपयोग करना। किस तरह पानी बचाना, एक ही पानी को दो-तीन बार कैसे उपयोग किया जाए और भविष्य के लिए पानी कैसे बचाया जाय इसकी शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है।
प्रकृति
नैतिक शिक्षा—समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, हमें नैतिक मूल्यों की,
चरित्र