Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 16

लड़के व्यसन में-परिवार टेंशन में

258 सूत्र · पृष्ठ 3 / 5

आपकी शिकायतें ही आपके व्यक्तित्व की सूचक हैं। निःशंक जीवन जियो।
चरित्र
मेरे शब्द मेरी पहचान बने तो अच्छा है चेहरे का क्या वह तो मेरे साथ चला जायेगा।
चरित्र
शरीर के स्वभाव का चिन्तन करने से वैराग्य में वृद्धि होती है।
अनासक्ति
दूसरों के प्रति शिकायत की वृत्ति अनुभव हीनता का प्रतीक है।
चरित्र
मैंने सरिता से सीखा है जीने का तरीका, चुपचाप से बहना और अपने मौज में रहना।
संतोष
अनुशासित शिष्य शिक्षा को सुगमता से प्राप्त कर लेता है।
विनम्रता
अत्यन्त क्रोध की अवस्था में भी पूज्य पुरुषों की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
सच्चा शिष्य गुरु के प्रति भावों को नहीं बदलता है।
विनम्रता
सच्चा शिष्य गुरु के पीछे चलता है, गुरु से नीचे बैठता है, गुरु को सामने आते देखकर खड़ा हो जाता है और गुस्से में भी नीचे स्वर में बात करता है।
विनम्रता
सभ्यता पूर्ण व्यवहार को शिष्टाचार कहा जाता है।
चरित्र
ताकत के साथ नेक इरादे भी रखना वरना ऐसा क्या था जो रावण भी हार गया था।
चरित्र
वो दुश्मन बनकर मुझे जीतने निकले थे, मोहब्बत कर लेते तो मैं खुद ही हार जाता।
क्षमा
जो व्यक्ति शक्ति न होते हुए भी मन से हार नहीं मानता है उसको दुनिया की कोई भी ताकत हरा नहीं सकती है किन्तु हर हार से सीख ली जायें।
पुरुषार्थ
जो मनुष्य प्रतिष्ठा को करने वाला है उसे संघ का अधिपति जानना चाहिए क्योंकि धर्म की वृद्धि किसी अन्य द्वारा नहीं होती है।
धर्म
भावना सहित प्राणी कदाचित् ज्ञान और चारित्र से च्युत भी हो जाता है तो वह स्वर्गादि के सुख प्राप्त कर मुक्ति का स्वयंवर होता है।
धर्म
जो दर्शन-ज्ञान-चारित्र का पालन किए बिना दूसरे का भोजन करता है वह अगले भव में पशु के रूप में भार ढोने वाला होता है।
कर्म
मैं मानता हूँ जिसकी आशा नष्ट हो गयी वही पुण्यात्मा है, निष्पृह मनुष्य इस लोक-परलोक में इन्द्र तथा चक्रवर्तियों के द्वारा स्तुत्य होता है।
संतोष
सच्चा सुख अनन्त इच्छाओं की पूर्ति के लिए भागने में नहीं है बल्कि जीवन में सादगी, संतोष और सदाचरण अपनाने में है।
संतोष
जो विभिन्न महापुरुषों के चिंतन के साथ रहते हैं वे समझो कि उन्हीं के साथ रहते हैं।
संगति
जो शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता में राजी नाराज होता है, वह हड्डी-मांस का भक्त है भगवान् का नहीं।
भक्ति
बिना पूछे सलाह देने से सब सम्मान समाप्त हो जाता है।
वाणी
अनेक जीवों को समझाने की अपेक्षा एक स्वयं को समझा लेना अच्छा है।
संयम
प्रभु से मत कहो समस्या विकट है, समस्या से कह दो कि मेरा प्रभु मेरे निकट है। यदि किसी समस्या को सुलझाया जा सकता है तो फिर चिन्ता करने की क्या जरूरत है और यदि नहीं सुलझाया जा सकता तो फिर चिन्ता करने से क्या फायदा है?
भक्ति
जो हाथ सेवा के लिए आगे उठते हैं, वे प्रार्थना करने वाले ओठों से अधिक पवित्र होते हैं।
दान
अपने आपको सुधारना संसार की सबसे बड़ी सेवा है।
चरित्र
गरीबी की रोटियाँ खा लेना पर कलंक के रसगुल्ले मत खाना।
सत्य
विपरीत ज्ञानी बन के रहने की अपेक्षा कम ज्ञानी रहना अच्छा है।
ज्ञान
जो अपनी भलाई चाहते हैं, वे महापुरुषों का अपमान करने से बचें।
विनम्रता
परिचय, पत्रों से नहीं अपनी पात्रता से देना चाहिए।
चरित्र
धनी व्यक्ति को भूला जा सकता है पर ज्ञानी को नहीं।
ज्ञान
दुनिया में मेहमान बनकर जियो मालिक बनकर नहीं।
अनासक्ति
जो झुक सकता है वह सारी दुनिया को झुका सकता है। निर्ग्रन्थों का मार्ग निष्पृह वृत्ति का मार्ग है।
विनम्रता
प्रशंसा से पिघलना मत और आलोचना से उबलना मत।
संयम
मूर्खों की तारीफ सुनने की अपेक्षा बुद्धिमानों की डाँट सुनना अच्छा है।
संगति
जिसके वश में अपना मन नहीं है, उसको सिद्धि कैसे प्राप्त होगी?
मन
स्वयं का पाप स्वयं के लिए घातक है। बहाने बाजी कार्य को पीछे धकेलती है।
कर्म
हीरे की तरह काबलियत रखते हो तो अँधेरे में चमका करो, रोशनी में आकर तो काँच भी चमका करते हैं।
चरित्र
आसमान में उड़ने की मनाही नहीं, शर्त सिर्फ इतनी कि जमीन को नजर अंदाज न करें।
विवेक
आलोचना, क्रोध, निंदा जैसे जहर को पीना सीखो।
क्षमा
शराब से बढ़कर मनुष्य का नाश करने वाली कोई पेय वस्तु नहीं हो सकती है।
आहार
शराब पर ही नहीं, सभी प्रकार की नशीली वस्तुओं के सेवन का निषेध होना चाहिए।
आहार
शराब सम्पत्ति ही नष्ट नहीं करती बल्कि शरीर भी नष्ट करती है।
स्वास्थ्य
पूर्व काल में जुआ खेलना मनुष्यों में वैर का कारण देखा गया है, अतः बुद्धिमान मनुष्य हँसी के लिए भी जुआ न खेलें।
चरित्र
निस्संदेह दान की बहुत प्रशंसा हुई है परन्तु दान से धार्मिक आचरण ही श्रेष्ठ है।
धर्म
यदि किसी लड़की के दोष जानने हो तो उसकी प्रशंसा उसकी सहेली के सामने करो।
विविध
निन्यानवें प्रतिशत अवस्थाओं में कोई भी मनुष्य स्वयं को दोषी नहीं ठहराता,चाहे उसकी कितनी भी भारी भूल क्यों न हो?
विवेक
दूसरों के दोष पर ध्यान देते समय हम स्वयं बहुत भले बन जाते हैं, पर जब हम अपने दोषों पर ध्यान देंगे तो अपने आपको कुटिल और कामी पायेंगे।
विवेक
ऐसा कोई महान् व्यक्ति नहीं हुआ जो वास्तव में सदाचारी न रहा हो।
चरित्र
सदाचार की रक्षा यत्न से करना चाहिए, धन तो आता है और जाता है, धन क्षीण हो जाने पर भी सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता किन्तु जो सदाचार से भ्रष्ट हो गया, उसे नष्ट ही समझना चाहिए।
चरित्र
व्यभिचारी को इन चार बातों से कभी छुटकारा नहीं मिलता–घृणा पाप, भ्रम और कलंक।
ब्रह्मचर्य
जो पुरुष बुराई से विमुख रहते हैं, वे लोभ नहीं करते और न ही दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त होते हैं।
चरित्र
जो पुरुष न्याय की बात को समझता है और दूसरों की वस्तुओं को लेना नहीं चाहता लक्ष्मी श्रेष्ठता को जानती है और उसे ढूँढ़ती हुई उसके घर आती है।
धन
मुख से चाहे कोई कितनी ही धर्म-कर्म की बातें करे, पर उसकी चुगल खोर जिह्वा उसके हृदय की नीचता को प्रकट कर ही देती है।
वाणी
यदि तुम दूसरों की चुगली करोगे तो वह तुम्हारे दोषों को खोजकर प्रकट कर देगा।
वाणी
जिनकी दृष्टि विस्तृत है तथा जिनके विचार बड़े-बड़े प्रश्नों के हल करने में लगे रहते हैं, ऐसे लोग विकथा का एक शब्द भी अपने मुख से नहीं निकालते हैं।
वाणी
जो लोग दोषों से सर्वथा रहित नहीं है, वे स्वयं पर तो नहीं बिगड़ते फिर वे अपनी निन्दा करने वालों पर क्यों क्रुद्ध होते हैं ?
क्षमा
वह प्रभावशाली मुख मुद्रा किस काम की जिसके हृदय में बुराई भरी हो।
चरित्र
जो मनुष्य दूसरों की सम्पत्ति को हड़पने की प्रतीक्षा में बैठा रहता है उसके हृदय से दया और प्रेम कोसों दूर रहते हैं।
चरित्र
उच्च कुल में जन्म लेने वाले मूर्ख का उतना आदर नहीं होता जितना निम्न कुल से उत्पन्न विद्वान् का होता है।
ज्ञान
मनुष्य पशुओं से जितना उच्च है शिक्षित अशिक्षितों से भी उतना ही श्रेष्ठ है।
ज्ञान