Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 16

लड़के व्यसन में-परिवार टेंशन में

258 सूत्र · पृष्ठ 2 / 5

सिर्फ पुरुष ही क्यों अपने अंदर के रावण को मारें? स्त्रियों को भी चाहिए कि वो भी अपने अंदर की कैकई, मंथरा, शूर्पनखा को मारें।
संयम
यदि आप बहुत अधिक लोगों पर निर्भर रहते हैं तो आपके निराश होने के अवसर अधिक होंगे।
विवेक
अपना दुःख हटाने का तरीका है सबका दुःख बाँटना और अपनी खुशी बढ़ाने का तरीका है सबको खुशी बाँटना।
दान
मनुष्य दुःखी, निराश, चिंतित, उद्विग्न बैठा रहता हो तो समझना चाहिए सही सोचने की विधि से अपरिचित होने का ही यह परिणाम है।
मन
स्वार्थ, अहंकार और लापरवाही बढ़ जाना ही व्यक्ति के पतन का कारण है।
चरित्र
सबसे बड़ा दीन दुर्बल वह है, जिसका अपने ऊपर नियंत्रण नहीं है।
संयम
यदि हम सुधरे, हमारा दृष्टि कोण सुधरे तो दूसरों का सुधार कुछ भी कठिन न रह जायेगा।
चरित्र
अज्ञानी को ज्ञान, भूखे प्यासे को भोजन, भूले को मार्ग दें, दुःखी की सेवा करें।
दान
जब भी कोई प्रतिभावान सामने आये तो हताश होने की बजाय उसके गुणों को बारीकी से पढ़ें।
विनम्रता
अब सहयोग की उम्मीद किससे करें भला मिट्टी के बने लोग कागजों में बिक जाते हैं।
विविध
सज्जन गाय की तरह दुर्जन साँप की तरह होता है।
चरित्र
सज्जन गुणहीनों पर भी दया करते है, पर के द्वारा किए हुए उपकार को नहीं भूलते हैं, अपनी कमजोरी दूसरों पर नहीं डालते हैं, दूसरों के दोषों को प्रकट नहीं करते हैं, गुणवान को देखकर प्रमुदित होते हैं, दूसरों के अल्पगुण की भी अनल्प प्रशंसा करते हैं, दूसरों के वैभव से ईर्ष्या नहीं करते हैं, दूसरों के दुःख में दुःखी-सुख में सुखी होते हैं, स्व प्रशंसा नहीं करते हैं, दूसरे के द्वारा प्रशंसा किए जाने पर नम्रीभूत होते हैं, विषमताओं के आने पर निजशील, न्यायनीति और धर्म का परित्याग नहीं करते हैं, पर के द्वारा कटु व्यवहार किए जाने पर भी मधुर उत्तर देते हैं, दूसरों के दोष नहीं गुण ग्रहण करते हैं विसंवाद नहीं करते हैं।
चरित्र
जिन्दगी मिली है जीने के लिए उसको हँस के जियो क्योंकि आपको देखकर भी कोई मुस्कुराता होगा।
मन
समय सभी के लिए २४ घंटे ही है, बेहतर प्रबंधन से २५ घंटे जितना कार्य २४ घंटे में किया जा सकता है।
समय
पूरा शरीर सिर्फ नौ महीने में बन जाता है, जीवन निर्माण के लिए ९० वर्ष मिलते हैं।
समय
आशातीत परिणाम के लिए पूरी लगन और ईमानदारी से काम करें।
पुरुषार्थ
जीवन जीना है तो दर्पण की तरह जियो जिसमें स्वागत सभी का हो लेकिन संग्रह किसी का न हो।
अनासक्ति
जीतने वाले कुछ अलग से नहीं करते वो कार्यों को अलग तरह से करते हैं।
पुरुषार्थ
सफल उद्योगपति हमेशा जनता की जरूरत को समझ कर ही उत्पादन करते हैं।
समृद्धि
मंत्रोच्चारपूर्वक भोजन बनायेंगे तो 'हीरो' नहीं 'संत साधक' पैदा होंगे।
णमोकार
यथासंभव हमें अपना जीवन 'सहज' में जीना चाहिए और किसी आदत को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।
संयम
बदलाव प्रारम्भ में सबसे कठिन, मध्य में सबसे बेकार और अंत में सबसे अच्छा होता है।
पुरुषार्थ
खुद में वह बदलाव लायें, जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।
चरित्र
सबसे कठिन बंधन स्नेह का है, परतन्त्रता भी मात्र इतनी है कि पर से स्नेह है, अपने को स्वतन्त्र, स्वतः सिद्ध, अविनाशी, अखण्ड, सत् जानकर बन्धन से दूर रहो और प्रसन्न रहो।
अनासक्ति
परिचय बढ़ाना शान्ति का मार्ग नहीं है अतः किसी से विशेष परिचय मत पूछो और न अधिक समय तक एक स्थान पर रहो, परिस्थिति वश यदि एक स्थान पर रहने का प्रसंग आवे तो अपने ध्यान, अध्ययन, व्रताचरण से विशेष प्रयोजन रखो हाँ! सार्वजनिक शास्त्र प्रवचन एक बार करते रहें, जिससे स्व दृष्टि निर्मल हो और अन्य को भी लाभ हो सके।
अनासक्ति
जब-तक सविकल्प अवस्था है तब तक अपनी गलती खोजो।
संयम
यदि तुम्हें शान्ति पसंद है तो तुम अपना ऐसा व्यवहार रखो कि जिस व्यवहार के निमित्त से दूसरों को अशान्ति न पैदा हो क्योंकि तुम्हारे व्यवहार से दूसरों के अशांत होने पर तुमको शान्ति न होगी। कितने ही टूटी टाँग वाले हैं, तुम तो चलते-फिरते हो, कितने ही अंधे हैं तुम्हें तो कुछ दिखता भी है, कितने ही दारिद्रय या अजीर्ण से खा नहीं पाते हैं, तुम तो खाते भी रहते हो, फिर भी शान्ति नहीं रखते?
संतोष
कौन-सा पर पदार्थ मेरा हित करेगा? मेरा हित तो निर्विकल्प अवस्था में है, बाह्य पदार्थ का ध्यान तो विकल्प का हेतु है व रहेगा।
ध्यान
जो जितना सज्जन होगा उसके अंग-अंग में उतनी शालीनता होगी।
विनम्रता
जो समय बचाना चाहता है वह एक भी अनावश्यक बात नहीं करता है।
समय
यदि सुखमय जीवन चाहते हो तो अपरिचित रहना सीखो।
संतोष
यदि कुछ बनना चाहते हो तो सुनना व सहन करना सीखो।
विनम्रता
दो तथ्य आपको परिभाषित करते हैं, ‘आपका धैर्य’ जब आपके पास कुछ न हो और आपका व्यवहार जब आपके पास सब कुछ हो।
चरित्र
अपने परिणाम सुधारो, दूसरों को मत सुधारो, तीर्थंकर आदिनाथ अपने परिवार के मारीच को नहीं सुधार पाये, तो आप कैसे सुधार सकते हो।
विवेक
रागी जीव ने शरीर के राग में न जाने कितनों को शरीर रहित कर दिया, एक पर्याय को सजाने में कितनों की पर्यायों को नष्ट कर दिया। सही चेहरा तो चारित्र से चमकता है किन्तु आपने परजीवों की हिंसक सामग्री से चमकाना चाहा है। चर्म सुन्दर नहीं सुन्दर तो आत्मा का धर्म है।
अनासक्ति
अच्छे ने अच्छा, बुरे ने बुरा जाना मुझे जिसकी जैसी सोच उसने वैसा ही पहचाना मुझे।
मन
जिसकी बड़ी सोच होती है वही सबसे बड़ा होता है।
मन
सुख-दुःख का वेदन देखने से नहीं सोचने से होता है, यदि देखने से दुःख होने लगे तो फिर अग्नि के देखने से आँखें जलने लगेंगी।
मन
हम व्यक्ति के कामों से यह जानते हैं कि वह क्या-क्या सोचता है, न कि उसके बताने पर कि वह क्या सोचता है।
मन
आप वही बनते हैं जिसके बारे में आप पूरा दिन सोचते हैं।
मन
आप जिन चीजों के बारे में सोचते हैं, उनमें मास्टरी प्राप्त करते हैं।
मन
आप वो हैं जो आपकी सोच है अतः अपनी सोच को सही बनायें, वरना लोहे को दूसरा नहीं बल्कि उसकी जंग ही उसे नष्ट कर देती है।
मन
फर्क सिर्फ सोच का होता है सकारात्मक या नकारात्मक वरना सीढ़ियाँ वही होती हैं पर किसी को ऊपर ले जाती तो किसी को नीचे लाती हैं।
मन
जो धोखेबाज न हो, स्थिर रहने वाला हो, बुद्धिमान हो, संतोषी हो, चुगली से रहित हो, भर्त्सना करने पर उत्तर न देता हो तथा प्रशस्त वचन बोलता हो, स्वामी के शत्रु से शत्रुभाव, मित्र से मित्रभाव रखता हो सत्पुरुष ऐसा सेवक चाहते हैं।
चरित्र
एक डण्डा मारकर बताया कि एक बज गया, पूछने वाला खुश हुआ। उससे पूछा क्यों हँस रहे? उसने कहा—एक घंटे पहले पूछता तो ये १२ डण्डे मारता, जो हर हाल में राजी है, उसे कोई दुःखी नहीं कर सकता है।
संतोष
गलतियाँ हों पर एक गलती दुबारा न हो, गलतियाँ उन्हीं से होती हैं, जो कुछ करने की कोशिश करते हैं, गिरते भी वही हैं जो चलते हैं, गलती से सबक लो, गलती से गिरो भी तो बॉल की तरह उछलो न कि मिट्टी के लौंदे की तरह गिरकर चिपको, यही उन्नति का राज है।
पुरुषार्थ
धर्म गुरुओं से लोग त्याग, न्याय, सत्य और ईमानदारी के पथ पर चलने की शिक्षा लेते हैं, अतः धर्म गुरु अनीति और अधर्म से बचें।
धर्म
माँ-बाप का नहीं किन्तु अच्छे मित्रों का चुनाव तो करना ही चाहिए।
संगति
जीवन में आप न सबको प्रसन्न रख सकते हो और न सबसे प्रसन्न रह सकते हो अतः शान्ति धारण करो।
संतोष
एक छोटी-सी लड़ाई से हम अपना प्यार खत्म कर लेते हैं, इससे तो अच्छा है कि प्यार से हम अपनी छोटी सी लड़ाई ही खत्म कर दें।
क्षमा
पाप में लीन पुरुष खोटा पुरुष है, पाप से निवृत्त पुरुष पुण्यवान है, निज-पर के हित में संलग्न पुरुष सत्पुरुष है और परहित करना ही जिनका कार्य है, वे महापुरुष हैं।
चरित्र
दूसरों के प्रति हमारे शुभ विचार हमारी सुप्त चेतना को जाग्रत कर हमें प्रबल शक्ति प्रदान करते हैं।
मन
इस तरह से जीवन जीना चाहिए कि यदि कोई आपके बारे में बुरा कहे तो कोई भी उस पर विश्वास न करें।
चरित्र
यदि स्वभाव में मधुरता नहीं है तो जीवन में कहीं भी आनंद नहीं मिल सकता है।
चरित्र
दूसरे को बदलने में नहीं अपितु स्वयं को बदलने में सुख मिलता है।
चरित्र
स्वयं का निर्णय ही सर्वोपरि होता है, पर के निर्णय से जीवन कष्टमय होता है।
विवेक
शारीरिक सौन्दर्य की अपेक्षा सदाचरण का सौन्दर्य हजार गुणा श्रेष्ठ होता है।
चरित्र
इतने नरम भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको खा जाये, इतने गरम भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको छू न सके, इतने सरल भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको मूर्ख बना दे, इतने ज्यादा अकड़ों भी मत कि दुनिया आपसे मिल न सके, इतने गम्भीर भी मत बनो कि दुनिया आपसे ऊब जाये, इतने छिछोरे भी मत बनो की दुनिया आपकी गिनती न करे इतने मँहगे भी मत बनो कि दुनिया आपको बुला न सके, इतने सस्ते भी मत बनो कि दुनिया आपको ना चाहे।
चरित्र
सेवकों को अपने स्वामी से उचित सम्मान पाकर जैसा सन्तोष होता है वैसा सन्तोष बहुत धन देने पर भी नहीं होता है।
चरित्र
अज्ञानी की श्वासें तेज और ज्ञानी की श्वासें मंद-मंद चलती हैं, स्वरूप का चिन्तन करने वाले योगी की श्वास मंद-मंद चलती है किन्तु भोगी की श्वासें तेज चलती हैं, जो जितना उथला व्यक्ति होता है वह उतना ही हाँफता है।
ध्यान