Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Karma

कर्म

370 सूत्र · पृष्ठ 3 / 5

जैसे हीरा ही हीरे को काटता है, वैसे ही ज्ञानी ही कर्मों को काटता है अज्ञानी नहीं।
कर्म
विषय कषाय की तीव्रता, खोटे शास्त्रों का अध्ययन, दुर्ध्यान, दुष्ट लोगों की सङ्गति, स्वभाव की तीव्रता और उन्मार्ग में गमन होना अशुभ परिणाम माने जाते हैं इनसे पाप का ही बंध होता है।
कर्म
कर्म तेरे अच्छे हैं तो किस्मत तेरी दासी है, नियत तेरी साफ है तो घर में ही मथुरा काशी है।
कर्म
मनुष्य जिस समय खोटे कार्य में प्रवृत्त होता है उसी समय वह निश्चय से मर जाता है, फिर चिरकाल बाद मरे हुए उस मनुष्य के विषय में इस समय शोक क्यों किया जाता है?
कर्म
लक्ष्मी पुरुषार्थ के अनुसार होती है, कीर्ति त्याग व दान के अनुसार होती है, विद्या अभ्यास के अनुसार होती है और बुद्धि कर्मों के अनुसार होती है।
कर्म
पुण्य का बन्ध इच्छा रहित व्यक्ति को होता है।
कर्म
जीवन में मुफ्त कुछ नहीं मिलता सब पुण्य से आता है- किसी की सम्पति को नाजायज तरीके से अपने कर्तव्य की सीमा के बाहर जाकर हथियाने का विचार मत करिये, वह आपके पास टिकेगी नहीं।
कर्म
कोई भी व्यक्ति अपने द्वारा किये गये दुष्कर्म के फल से बच नहीं सकता, चाहे समुद्र में करो या आकाश में।
कर्म
हर बात का कोई न कोई कारण अवश्य होता है, अचानक कुछ नहीं होता। कर्मों के बन्धन से मुक्त होने के लिए सफलता-असफलता, लाभ-अलाभ, निन्दा-प्रशंसा में अपने मन को सन्तुलित रखिए। कोई घटना या प्रसङ्ग इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता, जितना कि उसके प्रति आपकी मानसिक प्रतिक्रिया या दृष्टिकोण होता है। संसार न अच्छा है न बुरा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे देखते हैं यह आपकी मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। जो आपके अन्दर है वही बाहर भी दिखाई देता है। प्रयोगों से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि विकास उन्हीं से होता है।
कर्म
धृतराष्ट्र ने मुनिराज से पूँछा मेरी आँखों के सामने मेरे सौ पुत्र मारे गये क्या कारण है? मुनिराज ने कहा कि तीन भव पूर्व तुमने सर्पिणी के सौ बच्चे मारे थे, यह उसका फल है।
कर्म
कर्म रुपी केसिट अन्दर है, उचित-अनुचित व्यवहार बाहर दिखाई देता है।
कर्म
धन, जमीन का बटवारा हो सकता है कर्मों का नहीं, पुण्य छिपाकर करो, पाप छपा कर करो।
कर्म
कर्मों की विचित्रता- कोई तो विशाल भवनों में रहता है, किसी को वृक्ष की छाया भी नहीं मिलती है, कोई रेशम और रत्नों में मढ़ा है, किसी को फटा वस्त्र भी नहीं मिलता है।
कर्म
जैसे न चाहते हुए भी संसार के जीवों को गरीबी आदि का कष्ट भोगना पड़ता है, वैसे ही कर्म से पीड़ित ज्ञानी को भी न चाहते हुए भी भोग भोगना पड़ता है, अतः सम्यग्दृष्टि जीव भोगों का सेवन करते हुए भी उनका सेवन नहीं करता है, क्योंकि विना इच्छा के किया गया कर्म विरागी होता है।
कर्म
भरत चक्रवर्ती जैसा पुण्यानुबन्धी(सातिशय) पुण्य मोक्षलक्ष्मी की ओर ले जाता है। अतः बन्ध होने पर भी सहन करने योग्य है।
कर्म
जिनवाणी बही खाता नहीं, आचरण का शास्त्र है। जैसे ब्याज 24 घन्टे चलता है, वैसे ही कर्म बन्ध भी 24 घण्टे होता है।
कर्म
जो चीज पाप के उदय में प्रतिकूल होती है वही चीज पुण्य के उदय में अनुकूल हो जाती है, जो हवा मोमबत्ती की कमजोर लौं को बुझा देती है, वही हवा जङ्गल की आग को विकराल बना देती है।
कर्म
संवर और निर्जरा बन्धन मुक्ति के ये दो साधन हैं।
कर्म
कर्म क्षय के दो उपाय- चिन्तन और भक्ति।
कर्म
उन सभी कर्मों को अशुभ मानें जो निजी गुणों का अन्त कर देते हैं।
कर्म
उठा-धरी को पुरूषार्थ समझना कर्तृत्व बुद्धि है।
कर्म
ऋण, हत्या और बैर ये संसार के बढ़ाने वाले हैं।
कर्म
जो-जो देखी वीतराग ने, सो-सो होसी वीरा रे। अनहोनी कबहूँ न होसी रे, काहे होत अधीरा रे।।
कर्म
जङ्गल के राजा शेर को खरगोश ने अपनी युक्ति से कुये में पटक कर जङ्गल के सब जीवों को सुखी कर दिया, इसी तरह पाप रूपी शेर को संसार रूपी कुये में पटक कर अपनी आत्मा को सुखी करना चाहिए।
कर्म
बन्धु विरोध करे सगरे, झगरे नित होत सुधारस चाँटत, मित्र करे करनी रिपु की, धरणीधर देखत न्याव न पाटत। पूत कपूत का कार्य करे, नारी सती पति सो चित पाटत, या विधिना प्रतिकूल भये तब, ऊँट चढ़े पे कूकर काटत।। — अर्थात् 'पाप के उदय में' बन्धु विरोध करने लग जाते हैं, अमृत चाँटते हुए भी झगड़े होते हैं, मित्र शत्रु जैसा व्यवहार करने लग जाता है, राजा देखते हुए भी न्याय नहीं करता है, पुत्र कुपुत्र का काम करने लग जाता है, सती स्त्री भी पति से विरक्त हो जाती है, ऊँट पर सवारी करने पर भी कुत्ता काट देता है।
कर्म
प्रमाद युक्त चर्या, परिणामों की मलिनता, विषयों की लोलुपता, दूसरे को कष्ट देना, परनिन्दा करना, आहार, भय, मैथुन, परिग्रह ये चार संज्ञाएँ, कृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्यायें, इन्द्रियों की पराधीनता, आर्त-रौद्र ध्यान, ज्ञान का दुरुपयोग और मोह ये सभी 'पाप आस्रव के कारण' हैं।
कर्म
एकान्त आदि पाँच मिथ्यात्व, क्रूर परिणाम, पच्चीस कषाय, पन्द्रह प्रमाद, कुटिलता में तत्पर पन्द्रह योग, आठ मद, चार संज्ञाएँ, पञ्चेन्द्रियों के सत्ताईस विषय, चार आर्तध्यान, चार रौद्रध्यान, सात व्यसन, व्रत धारण कर विषाद करना, पाँच पाप, बारह अविरति, राग-द्वेष, मिथ्यात्व, सात भय, तीन वेद और शोक पच्चीस क्रियाओं में सम्यक्त्ववर्धिनी क्रिया को छोड़कर शेष चौबीस क्रियाएँ और मायाचार ये सब पाप बन्ध के लिए होते हैं अर्थात् उपर्युक्त कारणों से पाप बन्ध होता है।
कर्म
हिंसादि पाँच पाप क्रोधादि चार कषाय, मिथ्याज्ञान, पक्षपात, मात्सर्य, आठ मद, दुरभिनिवेश, तीन अशुभ लेश्याएँ, चार विकथा, चार आर्तध्यान, चार रौद्रध्यान, ईर्ष्या, असंयम और तीन शल्यों में जो प्रवृत्ति है वह अशुभ भाव है।
कर्म
पाप के उदय से देव भी कुत्ता बन जाता है और पुण्य के उदय से कुत्ता भी देव बन जाता हैं धर्म के प्रभाव से प्राणी को अचिन्त्य विभूति कि प्राप्ति होती है।
कर्म
चन्द्रमा आकाश में विहार करता है, अन्धकार को दूर करता है, हजारों किरणों का धारक है, ज्योतिर्विमानों के मध्य में चलने वाला चन्द्रमा भी भाग्य के योग से राहु द्वारा ग्रस लिया जाता है, क्योंकि हो ललाट पर लिखी हुयी रेखा मिटाने में कौन समर्थ है। कौन टाल सकता है?
कर्म
कौन जानता है, कब क्या होने वाला है? अहो! राज्याभिषेक के समय राम का वन गमन हुआ था।
कर्म
ऊँट को जातिस्मरण- एक सेठ के यहाँ कन्या हुयी, सेठ के पास एक ऊँट था जो उस कन्या का पूर्व भव का पति था, सेठ ने कन्या की शादी की, तो दहेज में ऊँट दे दिया, वह कन्या ऊँट पर सवार हुयी, तो ऊँट को जातिस्मरण हो गया, कि ये मेरी पत्नि थी, अब मेरे ऊपर बैठी है, ऊँट बैठ गया आगे नहीं बढ़ा खूब पिटाई की, लेकिन नहीं उठा, कन्या को भी जाति स्मरण हो गया कि ये मेरा पति था, इसलिये बैठ गया, कन्या ने समझाया तुम्हारी पर्याय बदल गयी है, अब विकल्प मत करो, इस पर्याय में कड़वी नीम खाना पड़ती है और भार ढोना पड़ता है।
कर्म
चक्र ने नहीं-एक तीर ने प्राण हरे- पुण्य के उदय में कृष्ण जी की मृत्यु जरासन्ध के सुदर्शन चक्र से नहीं हुई, पर पापोदय में एक बाण से हो गयी, उसी तरह लक्ष्मण की मृत्यु रावण के सुदर्शन चक्र से नहीं हुई, लेकिन देवों ने स्नेह की परीक्षा के निमित्त 'राम नहीं रहे' यह झूठ बोला, तो सुनते ही लक्ष्मण जी के प्राण निकल गये।
कर्म
सारी दुनिया को पानी पिलाने वाला भी, प्यासा मर जाता है जैसे श्रीकृष्ण जी।
कर्म
खरदूषण चौदह हज़ार विद्याओं एवं चौदह हज़ार विद्याधरों का स्वामी था, पाप के उदय में लक्ष्मण से युद्ध में मारा गया था।
कर्म
प्रजा के द्वारा किया हुआ पाप राजा को, राजा के द्वारा किया गया पाप मन्त्री को, स्त्री के द्वारा किया हुआ पाप पति को और शिष्य के द्वारा किया गया पाप गुरु को भी भोगना पड़ता है।
कर्म
पापास्रव में अभिप्राय मुख्य है, जैसे ससुराल की गाली और शत्रु की गाली का अभिप्राय अलग-अलग होता है।
कर्म
पतन जब होता है, तो उसमें वृद्धि ही होती है, जैसे सीढ़ी से गेंद खिसकाओं तो सीधे नीचे गिरती है।
कर्म
नियम का भङ्ग करने से और देव-शास्त्र-गुरु की आज्ञा का लोप करने से महापाप का बन्ध होता है।
कर्म
आत्मा रुपी राम से मिलने के लिए पाप रुपी रावण का त्याग जरूरी है।
कर्म
विपत्तियाँ उड़ती हुयी आती हैं और वापस पैदल जाती हैं।
कर्म
कुत्ते के भाग्य में रोटी के साथ सब्जी नहीं होती है।
कर्म
लगती है तकदीर को जब ठोकर गम्भीर। राजा फिरता रङ्क बन रानी भरती नीर।।
कर्म
बढ़े पाप से पाप ही, यह उक्ति ध्रुव सत्य। पाप बड़ा है आग से, चिन्तन हो बुध नित्य।।
कर्म
जब तक तेरे पुण्य का बीता नहीं करार। तब तक तुझ को माफ है औगुण करो हजार।।
कर्म
कर्मों की गति मन क्या जानें, सब को नाच नचावें। अपने अपने कर्मों का फल तीर्थंङ्कर भी पावें।।
कर्म
अनन्त चतुष्टय का घात पुण्य से नहीं, पाप से होता है, इसीलिए पुण्य को बढ़ाना चाहिए और पाप को घटाना चाहिए।
कर्म
'वन में' राम के लिए यक्ष के द्वारा रामपुरी की रचना। 'रण में' खरदूषण से युद्ध मे विराधित विद्याधर के द्वारा लक्ष्मण का सहयोग। 'शत्रु विद्याधर रावण से' भूमिगोचरी राम की विजय। 'जल में' पोटली बनाकर फेंक दिए जाने पर देवों द्वारा यमपाल चाण्डाल के लिए सिंहासन की रचना। 'अग्नि के मध्य में' सीता के अग्नि कुण्ड को देवों द्वारा जल कुण्ड मे परिवर्तित करना। 'समुद्र में' श्रीपाल जी को धवल सेठ द्वारा गिरा दिए जाने पर भी रक्षा होना। 'वंशस्थ पर्वत पर' श्री कुलभूषण-देशभूषण जी का श्री राम-लक्ष्मण जी के द्वारा उपसर्ग निवारण। 'सुप्त अवस्था में' सर्प से नेवले द्वारा बालक की रक्षा। 'प्रमत्त अवस्था में' पूर्व के उपकृत जटायु एवं कृतान्तवक्त्र के जीव देवों द्वारा श्री राम का सहयोग। 'विषम स्थिति में' पाण्डवों की लाखा महल से रक्षा एवं प्रतिसूर्य विद्याधर ने अञ्जना को वन में बहन बनाकर सहायता की और हनुरुह द्वीप ले गया। इन सभी स्थितियों में पूर्वकृत पुण्य ने रक्षा की।
कर्म
पुण्य झड़ता-पाप गड़ता- पाप काँटे की तरह है, पुण्य फूल की तरह है, काँटे को किसान बुद्धि पूर्वक जला देता है, फूल स्वयं झड़ जाते हैं, उसी प्रकार पाप को साधु बुद्धि पूर्वक छोड़ देता है, पुण्य की निर्जरा चौदहवें गुण स्थान के अन्त में स्वयं हो जाती है।
कर्म
पापानुबन्धीपुण्य- पुण्य के उदय में अशुभ भावों से पाप का बन्ध करना।
कर्म
पापानुबन्धीपाप- पाप के उदय में अशुभ भावों से पाप का बन्ध करना।
कर्म
पुण्यानुबन्धीपुण्य- पुण्य के उदय में शुभभावों से पुण्य का बन्ध करना।
कर्म
पुण्यानुबन्धीपाप- पाप के उदय में शुभभावों से पुण्य का बन्ध करना।
कर्म
बंदर के अंदर-माया का समन्दर- एक किसान के पास तीन बैल थे, दो को जोतता था एक बँधा रहता था, बैल के समीप एक सीका था जो पेड़ पर टाँग रखा था, जिसमें किसान अपना नाश्ता रखता था, बन्दर बदमाशी करता था, डिब्बा खोलकर भोजन करके जूठन बैल के मुँह में लगा देता था, किसान ने भोजन गायब पाया और बैल का मुँह जूठा देखकर पिटाई करने लगा, बन्दर रोज चालाकी करता, दस-पन्द्रह दिन बीत गये, पड़ोसी ने देखा कि बैल को व्यर्थ में पीटता है, समझाया इसे क्यों पीटते हो? बैल इतने ऊँचे सीके तक कैसे पहुँच सकता है, वह इससे बहुत ऊपर है, किसान ने कहा जूठन तो इसी के मुँह में लगी है फिर सन्देह कैसा? उसने कहा! एक दिन तुम छिपकर देखों मामला क्या है, किसान ने स्वीकार किया, प्रतिदिन की तरह बन्दर आया, खाना खाया, जूठन बैल के मुँह में पोत दी, उसी तरह बैल तो हुआ पुण्य एवं बन्दर हुआ पाप, खोटी प्रवृत्ति पाप करता है, अपयश पुण्य का होता है।
कर्म
औषध, मित्र, नक्षत्र, शकुन, वास्तु और ज्योतिष पुण्य के उदय में अनुकूल होते हैं और पाप के उदय में वे सब प्रतिकूल हो जाते हैं।
कर्म
तीन बालकों में होड़ लगी कि तुम हमको हँसा दो, तो मैं तुम्हारी सेवा करूँगा, उसको पचास तरह से हँसाया लेकिन वह नहीं हँसा, इसी तरह पुण्य-पाप को चुनौती दें, कि इनके आने पर हम हर्ष-विषाद नहीं करेंगे।
कर्म
नारियल में पानी- पुण्य की निशानी- जो होनहार है वह नारियल के भीतर पानी के समान होती ही है और जो जाने वाली है वह गज के द्वारा खाये हुये कैथ के दल के समान जाती ही है, अर्थात् जैसे नारियल में पानी अपने आप आ जाता है और हाथी के द्वारा खाये हुये कैथ का दल अपने आप चला जाता है, वैसे ही भाग्य की अनुकूलता होने पर लक्ष्मी विना प्रयत्न के प्राप्त हो जाती है और प्रतिकूलता होने पर अकस्मात् चली जाती है।
कर्म
पुण्यशाली मनुष्य खाद्य, स्वाद्य, पवित्र सुगन्धित पान और लेह्य (चाटने योग्य पदार्थ) तथा इनके संयोग से निर्मित स्वादिष्ट भोजन स्वर्णादि की थालियों आदि में खाते हैं, इनके पुण्य से रसोईया द्वारा निर्मित कुछ भी भोजन अमृत के समान जान पड़ता है।
कर्म
कर्मों की गति- श्रीकृष्ण जी ने जब कंस को मार डाला तो उसकी स्त्री जीवद्यशा प्रतिनारायण पद के धारी अपने पिता जरासन्ध के पास गयी और उससे कहा कि आपके रहते हुये कंस जैसा पति और चाणूर जैसा पहलवान कृष्ण ने मार डाला, इतना सुनते ही जरासन्ध की क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो गयी, तब जरासन्ध ने अपने बेटे को यादव कुल के नष्ट करने को कहा, तो कृष्ण का सामना करते हुए वह मारा गया, पुन: जरासन्ध ने अपने छोटे भाई अपराजित को आदेश दिया, कृष्णजी से युद्ध में वह भी मारा गया, अब जरासन्ध स्वयं यादवों को नष्ट करने की बुद्धि से निकला, इस बात का समाचार वसुदेव और समुद्रविजय आदि को मिला, तो इन सब ने जरासन्ध की शक्ति का विचार करते हुए मथुरा नगरी को छोड़कर जङ्गलों में रहने का निश्चय किया, चूँकि नेमिनाथजी का जन्म हो चुका था, फिर भी इनको मथुरा छोड़कर जाना पड़ा, जिस स्थान पर यादव वंशी छिपे हुए थे, उसी रास्ते से जरासन्ध अपनी सेना लेकर निकल रहा था, तब यादव लोग भी युद्ध की तैयारी करने लगे कि अब सामने आये शत्रु का सामना करना है, इस बुद्धि से समुद्रविजय, उग्रसेन, वसुदेव आदि दसों भाई युद्ध को तैयार हुये एक देव ने आकर सैकड़ों जलती हुयी चितायें विक्रिया से दिखा दीं और वह देव वृद्धा माँ का रूप बनाकर रोने लगा, जरासन्ध ने इन जलती हुयी चिताओं को देखकर पूँछा! कि ये चिताएँ किसकी जल रही हैं और आप क्यों रो रही हो, तब वृद्धा ने कहा कि यादव वंशी राजा मथुरा छोड़कर इस जङ्गल में आपके भय से छिप गये थे, लेकिन आपका यहाँ आगमन हो गया, इसलिए सभी यादव इनमें जलकर मर गये, इनमें मेरा पति भी मर गया है, मैं यादव वंशीय राजाओं की दासी हूँ, मुझसे अग्नि में प्रवेश नहीं किया गया है इसलिए में रो रही हूँ, इस प्रकार का समाचार सुनकर जरासन्ध अपने नगर वापस चला गया, उधर श्री नेमिनाथजी और कृष्णजी के प्रभाव से देवों ने द्वारिका नगरी की रचना की, सब नगर के बीचों-बीच कृष्ण जी का अठारह खण्ड का सर्वतोभद्र नामक महल बनाया और समुद्रविजय आदि दस भाईयों का आठ खण्ड का महल बनाया, कृष्णजी के साढ़े तीन करोड़ कुमार रणविद्या में कुशल थे, वे कृष्णजी जरासन्ध से कैसे जीते जा सकते थे।
कर्म
पङ्क के विना पङ्कज उग नहीं सकता, पङ्ख के विना पक्षी उड़ नहीं सकता। पुण्य को भी पाप की तरह हेय समझने वालों, पुण्य के विना तीर्थंङ्कर पद मिल नहीं सकता।।
कर्म
कहीं पर भूख तड़फन की, कहीं पर मौज उड़ते हैं, कहीं पर दूध कुत्ते को, कहीं बालक बिलखते हैं। किसी की देह नज्झी है, कहीं परदे लटकते हैं, कहीं सूती नहीं मिलता, कहीं सिलकन पहनते हैं। किसी का चैन से सोना, किसी का रात भर रोना, किसी को सुध न ऊठने की, किसी का काम वश रहना। कहीं पर चैन की वंशी, कहीं अरमान के टुकडे, कहीं हर अङ्ग पर जेवर, कहीं पर बाल भी बिखरे। कहीं हैं धूल कालिख तो कहीं पावडर महकते हैं, कहीं पर होंठ में लाली, कहीं पर दिल धधकते हैं। कहीं अर्थी निकलती है, कहीं तबला ठनकता है, कहीं रोना सदा जुट कर, कहीं अट्टहास होता है।।
कर्म
न जाने कैसे खेल खिलाती है जिन्दगी, पल में हँसे तो पल में रूलाती है जिन्दगी। शीशे का बनाया था मैंने सपने में महल, पर चोट पत्थरों की दिलाती है जिन्दगी। सोचा था मैंने अब न किसी को सताऊँगा, पर गलतियों पे गलति कराती है जिन्दगी। प्यासा दौड़ता है मृग पानी की चाह में, बालू को भी पानी सा दिखाती है जिन्दगी। रे मन! जिसे तू चाहता वो मिल नहीं सकता, सपनों को सदा झूठा बनाती है जिन्दगी।।
कर्म
नारद की उत्पत्ति कुलिझ्झी तापस से होती है, जो कलहप्रिय, धर्मप्रिय होते हैं, इनके माता-पिता को भाग्य से मुनिराज का उपदेश मिल जाता है, बच्चे को अकेला छोड़ मोक्षमार्ग में लग जाते हैं।
कर्म
अनावश्यक पत्थर निकाल देने पर मूर्ति बनती है और कर्म नोकर्म का भार दूर होने पर भगवान् आत्मा प्रकट होती है।
कर्म
दर्शन मोह की 3 और अनंतानुबंधी की 4 इन सात प्रकृतियों के उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम से क्रमशः औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होते हैं।
कर्म
सम्यग्दृष्टि को सभी कर्मों का अन्तःकोड़ा-कोड़ी सागर से ज्यादा स्थिति बन्ध नहीं होता है।
कर्म
मिथ्यात्व से यदि दुर्गति हुई तो निगोदादि में दीर्घकाल तक भ्रमण करना पड़ता है, यदि सुगति हुई तो देवगति में किल्विष या आभियोग्य जाति का देव हो दुःख उठाना पड़ता है, इन्द्रियों की इच्छानुकूल प्रवृत्ति करना मिथ्यात्व का लक्षण है।
कर्म
आठवें गुणस्थान तक सब कर्मों की स्थिति अन्तः कोड़ा-कोड़ी सागर पड़ती है, इसके आगे कम होती जाती है। क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि जीव केवली के पादमूल में तीन करण पूर्वक मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व को सम्यक् प्रकृति में संक्रमित करके सम्यक् प्रकृति की क्षपणा करता हुआ जब सम्यक् प्रकृति की स्थिति अन्तर्मुहूर्त मात्र रह जाती है उसको कृतकृत्य वेदक कहते हैं।
कर्म
अशुभ कर्मों का अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणा हीन होना क्षयोपक्षम लब्धि है। उत्तरोत्तर भावों की विशुद्धि होना विशुद्धिलब्धि है। सद्गुरुओं का उपदेश प्राप्त होना देशनालब्धि है। समस्त पाप कर्मों के उत्कृष्ट स्थिति और उत्कृष्ट अनुभाग का घात करके अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण स्थिति में और द्विस्थानीय (लता/दारू) अनुभाग में करना प्रायोग्यलब्धि है, अथवा आयुकर्म के अलावा सात कर्मों की स्थिति को अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर कर देना, घातिया के अनुभाग को लता/दारू रूप अघाति के पाप प्रकृति के अनुभाग को नीम/काँजीर रूप करने को प्रायोग्यलब्धि कहते हैं। अधःकरण, अपूर्वकरण, और अनिवृत्तिकरण रूप परिणामों का प्राप्त होना करणलब्धि है प्रारम्भ की चार लब्धियाँ भव्य व अभव्य दोनों को सामान्य से हो सकती हैं, किन्तु करणलब्धि केवल भव्य को ही होती है।
कर्म
उपगूहन अङ्ग पालन नहीं होने से नीच गोत्र का बन्ध एवं अशुभ नाम कर्म का बन्ध होता है।
कर्म
जीव कषाय करके जिसमें सुख-दुःख रूपी धान उत्पन्न होती है, ऐसे संसार रूपी लम्बे खेत को जोतता है अर्थात् जीव कषाय करके संसार को बढ़ाता है।
कर्म
मोक्षमार्ग पर चलने वाले को कर्म बन्ध से बचना पढ़ता है।
कर्म
पूर्व जन्म में स्वयं के द्वारा किए हुये शुभ-अशुभ कर्मों का फल ही जीव भोगता है, अगर दूसरे के द्वारा दिए हुये कर्मों का फल जीव भोगे तो उसके किए हुये कर्मों का फल व्यर्थ हो जाएगा।
कर्म
गिरते पेड़ के पत्ते से भी हम पुण्य क्षीण होने पर अपने पतन की शिक्षा ले सकते हैं।
कर्म
असली वस्तु में नकली वस्तु के मिलाने से नीच गोत्र और अशुभ नाम कर्म का बन्ध होता है।
कर्म