Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कर्म

पर परिभव परिवादा, दात्मोत्कर्षाच्च वध्यते कर्म। नीचैर्गोत्रं प्रतिभव, मनेक भव कोटि दुर्मोचं।।

पर का अनादर व निन्दा और अपनी प्रशंसा से जो नीच गोत्र कर्म का बन्ध होता है, वह अनेक करोड़ों जन्मों में नष्ट करना दुष्कर है।

The low-status karma bound by disrespecting and slandering others and praising oneself is hard to destroy across many millions of births.

— आराध्य सूत्र · #20

इसी विषय के और सूत्र

सभी कर्म →