पर परिभव परिवादा, दात्मोत्कर्षाच्च वध्यते कर्म। नीचैर्गोत्रं प्रतिभव, मनेक भव कोटि दुर्मोचं।।
पर का अनादर व निन्दा और अपनी प्रशंसा से जो नीच गोत्र कर्म का बन्ध होता है, वह अनेक करोड़ों जन्मों में नष्ट करना दुष्कर है।
The low-status karma bound by disrespecting and slandering others and praising oneself is hard to destroy across many millions of births.
— आराध्य सूत्र · #20
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