Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Karma

कर्म

370 सूत्र · पृष्ठ 2 / 5

पुण्य छप्पर फाड़कर देता है, पाप थप्पड़ मार कर लेता है।
कर्म
पुण्य-पाप को छुपा के कर सकते हैं किन्तु छुपा के रख नहीं सकते हैं।
कर्म
जिसकी भवितव्यता निकट है उस पर ही जिनवाणी का प्रभाव पड़ता है।
कर्म
जो पाप में तैरता है, वह दुःख में अवश्य डूबता है।
कर्म
जिस व्यक्ति का पुण्य क्षीण हो जाता है, उसके पवित्र विचार भी नष्ट हो जाते हैं।
कर्म
संसार में जितने जीव दुःखी हैं, हो रहे हैं, होंगे, वे सब संयोग का फल भोग रहे हैं।
कर्म
जिन्होंने दूसरों की राहों में अन्धेरे बिछाये हैं, उन्हें कभी उजाले नहीं मिल पाये हैं।
कर्म
जब मनुष्य पदासीन होता है तब बहुत से अपरिचित उसके सहायक तथा सभी उसके अधीन हो जाते हैं, पदच्युत एवं धन रहित होने पर स्वजन भी शत्रु हो जाते हैं, अतः पाप से डरना चाहिए।
कर्म
हम ऐसा मानने की गलती कभी न करें, कि गुनाह में छोटा-बड़ा होता है।
कर्म
गुप्त पाप करने वाले व्यक्ति शंका मात्र से प्रकाश में आ जाते हैं।
कर्म
यदि तुम्हारे भाग्य में डूबकर मरना है, तो तुम चम्मच भर पानी में भी डूब मरोगे।
कर्म
वही सुखी होता है जो अपने किए पापों का सदा पश्चाताप करता रहता है।
कर्म
जिस बाप ने दुकान को खड़ा किया, बकरे की पर्याय में वह वहाँ खड़े होने लायक नहीं रहता है।
कर्म
व्यक्ति जितना कर्मबंध भोग-भोगकर नहीं करता, उससे अधिक नयनों से निहारकर करता है।
कर्म
निर्माल्य को (देव-शास्त्र-गुरु के द्रव्य को) जो स्वीकृत करता है वह वंशच्छेद को प्राप्त कर बाद में दुर्गति को प्राप्त करता है।
कर्म
भीख माँगने से नहीं, लाभान्तराय के क्षयोपशम से मिलती है।
कर्म
मानव के कर्म ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या हैं।
कर्म
कर्मों को दोष मत दो, करनी को दोष दो।
कर्म
पुण्य और पाप सदैव चार हाथ आगे चलता है, जो अनुकूलता प्रतिकूलता करता जाता है।
कर्म
वह पाप अग्नि का कुंड है जो आदर, मान, साहस और धैर्य को क्षणभर में जलाकर भस्म कर देता है।
कर्म
मनुष्य में अगर मनुष्यता नहीं है तो मनुष्य पशु से भी नीचा है क्योंकि पशु तो अपने पूर्वकृत पापकर्मों का फल भोगकर मनुष्यता की तैयारी कर रहा है, पर मनुष्य नये पाप-कर्म करके नरकों की, पशुता की तैयारी कर रहा है।
कर्म
व्यक्ति सद्भावनाओं के द्वारा अपने भाग्य को भी बदल सकता है।
कर्म
मनुष्य कहीं भी जन्म ले, वह अपने कर्मों से श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट बनता है।
कर्म
आदमी अपना विनाश और विकास करने में स्वतंत्र है।
कर्म
यदि असंज्ञी भव का निर्माण हो गया, तब और बात की तो कथा ही क्या, पछताने तक की बुद्धि नहीं रहेगी।
कर्म
आपका भाग्य निश्चित नहीं, आप अपने कर्मों से निश्चित करते हैं।
कर्म
भाव परावर्तन ही पञ्च परावर्तन कराता है, अतः अपने भावों को सुधारो अर्थात् पाँच पापों को तजो और पञ्च परमेष्ठी को भजो। भाव सुधरने से भव सुधरता है।
कर्म
कर्मों से लड़ना नहीं, खोटे कर्मों से बचना साधना है।
कर्म
पुण्य के प्रभाव से हर जगह सहायता करने वाले मिल जाते है, राम को लंका में विभीषण मिल सकता है तो फिर आपको कोई क्यों नहीं मिल सकता है ''पुण्य कमाओ''।
कर्म
प्रबल पुण्यात्मा जीव के ही परिणाम निर्मल होते हैं।
कर्म
पुण्य कमाओ पैसा नहीं पैसा तो अपने आप आयेगा।
कर्म
यदि वर्तमान में भाव निर्मल हैं तो भविष्य का भव निर्मल होगा।
कर्म
कठोर पाप कठोर साधना से ही कटेंगे, हीरे की कटिंग हीरे से ही होती है लोहे से नहीं।
कर्म
जिससे अपयश और कुमति हो तथा जिससे पुण्य नष्ट हो जाए, ऐसा कर्म कभी न करें।
कर्म
जैसे लेकर न चुकाया हुआ ऋण यहाँ-वहाँ बन्धनकारी होता है, वैसे ही किया हुआ पाप भी इस लोक या परलोक में फल भोगे बिना या प्रायश्चित्त आदि किए बिना नष्ट नहीं होता है।
कर्म
निःस्वार्थ भाव से किया गया सत्कर्म निश्चितत: शुभ फलप्रदाता होता है।
कर्म
किए गये उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाते, कभी इस भव में तो कभी अगले भव में फल अवश्य देते हैं।
कर्म
पुण्य के सृजन और पाप के विसर्जन में ही इहलोक व परलोक में सुख मिलता है।
कर्म
यदि आप दूसरों के बारे में बुरा सोचते है तो स्वयं बुरे फल भोगने के लिए तैयार रहें।
कर्म
पाप कर्म की ओर व्यक्ति पहले देखता है, फिर सोचता है, फिर बढ़ता है और फिर उसमें लिप्त हो जाता है।
कर्म
छिपकर किया गया पाप जीवनभर कांटे की तरह चुभता है।
कर्म
एक व्यक्ति के पास सौ का नोट है वह न पुण्य रूप है न पापरूप, उस नोट को दान में दिया जा रहा है तो पुण्य रूप है, शराब खरीदी जा रही है तो पापरूप, उसी प्रकार वर्गणाएँ होती हैं, पाप भाव से पाप रूप पुण्य भाव से पुण्य रूप परिणमन कर जाती हैं।
कर्म
कषाय करते समय यह तो विचार करो कि द्रव्य लिङ्गी साधु के अव्यक्त मिथ्याभाव मिथ्यात्व गुणस्थान सम्बन्धी सभी प्रकृतियों तक का बंध करा देता है तो क्या तेरे इस समय बंध नहीं हो रहा है? क्या इसका कुफल नहीं भोगना होगा?
कर्म
कोई मुझे सम्पदा ऐश्वर्य का स्वामी समझे तो मुझे इससे क्या है? विपक्ष मलीन समझे तो मुझे क्या? मैं तो जैसा होऊँगा, वैसा ही फल पाऊँगा। किसी के जानने समझने आदि से क्या होता है?
कर्म
कार्य के बिना कारण न होने का मतलब बिना बीज के फल का नहीं मिलना है।
कर्म
तीव्र कषाय में मरीचि समवसरण छोड़कर भाग गया था मन्द कषाय में शेर की पर्याय में श्रावक बन गया था।
कर्म
मति सुधारने से गति सुधर जाती है और भ्रष्ट मति से भ्रष्ट गति होती है।
कर्म
दुःख भोगने वाला तो भविष्य में सुखी हो सकता है लेकिन दुःख देने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता है।
कर्म
असाता के उदय में नींद नहीं आती है, साता के उदय में नींद आती है, मुनि तो निद्रा जय के लिए तपस्या करते हैं। सहज निद्रा आ रही है तो आपका पुण्य है और निद्रा न आये तो स्वाध्याय करो, मंत्र जाप करो पर चिंता न करो। पाप के उदय में नींद न आये तो पुण्य तो किया जा सकता है।
कर्म
छोटे से भी पाप का यदि प्रायश्चित्त नहीं किया तो वह एक दिन पहाड़ जैसे विशाल चारित्र को भी नष्ट कर देता है, जैसे छोटा सा बट का बीज यदि मुख से भी फूँक दें तो उड़ जायेगा लेकिन यदि वह अंकुरित होकर वृक्ष बना तो पहाड़ को भी फोड़ देता है।
कर्म
अकल कितनी भी तेज हो नसीब से जीत नहीं सकती बीरबल कितना भी अकलमन्द क्यों न था कभी बादशाह नहीं बन पाया था।
कर्म
भाग्य देखो! कुछ पढ़े लिखे नौकरी कर रहे हैं और कुछ अनपढ़ राजा बनकर राज्य कर रहे हैं।
कर्म
यदि आपने नरक के दुःखों को नहीं देखा है, तो तिर्यंच गति के दुःखों को देख लो, तन पर छुरी चल रही है, तन को छीला जा रहा है, फिर भी मुख से आवाज नहीं निकाल पा रहा है, अपने आपको बचा भी नहीं सकता है, ये सब मायाचारी का परिणाम है।
कर्म
जैसे सुबह गाय को खिलाई गयी घास शाम को दूध में वृद्धि कर देती है, वैसे ही वर्तमान में किया गया पुण्य भविष्य में सुखों की वृद्धि कर देता है।
कर्म
यदि भाव अच्छे हैं तो सदैव भाव मंगल आपके पास है और यदि भाव बुरे हैं तो मांगलिक द्रव्य, क्षेत्र, काल कुछ नहीं कर लेंगे। राजा श्रेणिक के भाव बुरे हुए तो यशोधर मुनिराज के गले में मरा सर्प डाला और नरक गति का बंध किया और जब भाव मंगल हुए तो उन्हीं से क्षमा माँगने लगा, मन में सोचने लगा अपनी गर्दन काटकर इनके चरणों में चढ़ा दूँ तब प्रायश्चित्त होगा, लेकिन उन्हीं मुनिराज के समझाने से मोक्षपुरी का रास्ता मिल गया, वही मुनिराज मंगल भूत हो गये, भाव परिवर्तन से भव परिवर्तन रुक गया।
कर्म
कोई भी क्षेत्र मंगल अमंगल नहीं होता, अतः किसी भी क्षेत्र को दोष मत दो जिस क्षेत्र में किसी को मंगल होता है उसी क्षेत्र में किसी को अमंगल होता है, हस्तिनापुर में पाण्डवों को विजयश्री मिली उन्हें मंगलभूमि रही और कौरवों के लिए अमंगल रही, पुण्यात्मा के लिए प्रत्येक क्षेत्र मंगल है।
कर्म
कोई भी काल अमंगल नहीं होता, जिस काल कहीं मंगलाचरण होता है उसी काल में कहीं शोक छाया होता है इसलिए यदि आपका पुण्य है तो प्रति क्षण मंगल है और पुण्यहीन को प्रतिक्षण अमंगल है।
कर्म
खोटे भाव रखने वाले का मरण बिगड़ जाता है, जिससे भविष्य में दुःख ही दुःख भोगना पड़ता है, अतः हमेशा अच्छे भाव रखने से अच्छे भव मिलते हैं।
कर्म
जिस जीव के अशुभ दिन आने होते हैं उसके अशुभ विचार और आचरण में हीनता हो जाती है।
कर्म
सँभल के रहना पाप का उदय आते देर नहीं लगती, बुझते दीपक की लौ भी अंत समय तेज हो जाती है, यदि कोई गलत काम करने के बाद भी बढ़ता नजर आता है तो समझ लेना कि बुझने के दिन आ रहे हैं जैसे मरने के कुछ समय पहले प्राणी स्वस्थ हो जाता है।
कर्म
भगवान् किसी का भला-बुरा नहीं करते, यदि भगवान् भला करते तो मन्दिर के द्वार पर बैठा भिखारी जीवन भर क्यों हाथ फैलाता? रोज पूजा करने वाला पुजारी क्यों निर्धन रहता? और बुरा करते तो मंदिर मूर्ति को तोड़ने वाले क्यों महलों में सुख से रहते? अतः सत्य यह है सुख-दुःख स्वयं के भावों से किए कर्माधीन हैं।
कर्म
अज्ञानी को कर्म लिप्त करते हैं, ज्ञानी को कर्म लिप्त नहीं करते हैं, जैसे घी हथेली को लिप्त करता जिह्वा को नहीं।
कर्म
ताजा दुहा हुआ दूध जिस प्रकार शीघ्र नहीं बिगड़ता उसी प्रकार कुकर्मी का फल भी शीघ्र नहीं मालूम होता किन्तु वह राख में दबी हुई अग्नि की तरह विद्यमान रहता है।
कर्म
इस जगत् में मेघ के बिना वृष्टि नहीं होती, बीज के बिना अंकुर नहीं होता, तप के बिना कर्म क्षय नहीं होता और रत्नत्रय के बिना मोक्ष नहीं होता है।
कर्म
तप से होगा क्या लाभ, जब दुष्कर्म में ही लीन हो।
कर्म
कर्मों से छूटने के लिए फूट-फूट कर रोने की नहीं, सम्यक् साधना की जरूरत है।
कर्म
संतों की तपस्या का एकमात्र लक्ष्य कर्मक्षय होता है।
कर्म
गृहस्थ के द्वारा मरण पर्यन्त जो पाप संचित किया जाता है उन सब पाप को एक रात्रि का दीक्षित साधु नियम से भस्म कर देता है।
कर्म
गृह व्यापार से उत्पन्न हुआ पाप जिनेन्द्र भगवान् के पास छूट जाता है, परन्तु जिनेन्द्र भगवान् के पास किये पाप को मूर्ख प्राणी कहाँ छोड़ेगा।
कर्म
सम्यग्ज्ञान से रहित अज्ञानी जिन कर्मों को लाख करोड़ भवों में नष्ट करता है, सम्यग्ज्ञानी उन कर्मों को मन-वचन-काय को क्षण भर में वश में करके नष्ट कर देता है।
कर्म
मनुष्य के पास पाँच इन्द्रिय हैं। यथा–चक्षु (आँख), नाक, कान, रसना और स्पर्शन। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चक्षु अर्थात् आँख है। आँख के अभाव में मनुष्य का जीवन अत्यधिक कठिन है। आँख से मनुष्य के स्वभाव का परिचय मिल जाता है। मनुष्य स्वभाव से कठोर, क्रोधी, नम्र, वात्सल्य पूर्ण अथवा स्नेहमयी है, यह उसकी दृष्टि से झलक जाता है। मनुष्य दो प्रकार के कर्म करता है। १. शुभ अथवा पुण्य कर्म, २. पाप कर्म। आँखें मनुष्य के लिए वरदान है। उसके माध्यम से मनुष्य पुण्य एवं पाप कर्म का बंध करता है। जहाँ एक ओर अच्छी दृष्टि के द्वारा १०० प्रतिशत पुण्य कर्म अर्जित कर सकता है। वहीं मनुष्य को जितना पाप कर्म का बंध होता है, उसका बहुभाग लगभग ८३ प्रतिशत आँख (दृष्टि) के माध्यम से होता है। शेष लगभग १७ प्रतिशत पाप कर्म अन्य शेष चार इन्द्रियों से होता है। यथा–कान (कर्ण), नाक (घ्राण), रसना और स्पर्शन के माध्यम से होता है। मनुष्य आँख के माध्यम से ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है। जिनवाणी के पठन-पाठन में आँखों का योगदान महत्त्वपूर्ण है। ज्ञानार्जन के लिए आँखें आवश्यक हैं।
कर्म
ज्ञानी मनुष्य का लोकोत्तर आचार किसके द्वारा कहा जा सकता है? जहाँ अज्ञानी बन्ध को प्राप्त होता है वहीं ज्ञानी कर्म बन्ध से छूटता है।
कर्म
जिन शास्त्र द्वारा प्रत्यक्षादि प्रमाणों से पदार्थों को जानने वाले के नियम से मोह कर्म का क्षय हो जाता है, इसलिए शास्त्र का सम्यक् प्रकार से अध्ययन करना चाहिये।
कर्म
अन्तराय कर्म का तीव्र उदय होने पर शास्त्र रचना और शास्त्र श्रवण का लाभ नहीं होता है।
कर्म
ज्ञानी का अपमान, ज्ञान ग्रहण में बाधा, ज्ञान सामग्री का तिरस्कार एवं ज्ञानी से घमण्ड करने से जीव कर्णहीन, वचनहीन एवं बुद्धिहीन होता है।
कर्म