स्वयंकृतं कर्म यदात्माना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभं। परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटम्, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ॥18॥
पूर्व जन्म में स्वयं के द्वारा किए हुये शुभ-अशुभ कर्मों का फल ही जीव भोगता है, अगर दूसरे के द्वारा दिए हुये कर्मों का फल जीव भोगे तो उसके किए हुये कर्मों का फल व्यर्थ हो जाएगा।
A being reaps only the fruit of the good and bad deeds it did itself in past lives; if it reaped the fruit of deeds done by others, then the fruit of its own deeds would be rendered meaningless.
— आराध्य सूत्र · #106
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