Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संगति

452 सूत्र · पृष्ठ 6 / 7

सत्सङ्ग में और शमशान में शान्ति मिलती है।
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जो गुणवानों की अवहेलना करता है वह कठिन तप करता हुआ भी और शास्त्रसमुद्र को जानता हुआ भी कल्याण को प्राप्त नहीं होता है।
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सेठ जी ने गाड़ी खरीदी पन्द्रह दिन ड्राईवर के पास बैठकर देख लिया कैसे चलाता है और ड्राईवर की छुट्टी कर दी और स्वयं चलाने लगे, जङ्गल में गाड़ी बिगड़ गयी, कुछ जानते नहीं थे, अतः दूसरे से मदद लेकर घर पहुँचे, इसी प्रकार जब तक मोक्ष मार्ग के सच्चे ड्राईवर न बन जायें, तब तक गुरुओं की सङ्गति में रहना चाहिए।
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पृथिवी पर नीम के वृक्ष बहुत दिखाई देते हैं परन्तु चन्दन कहीं-कहीं प्राप्त होता है, पत्थरों से पृथिवी भरी पड़ी है परन्तु चिन्तामणि रत्न दुर्लभ है, कौओं की काँव-काँव सदा सुनायी पड़ती है परन्तु कोयल की कूक यदा-कदा ही सुनायी पड़ती है, इससे पता चलता है कि यह जगत् दुर्जनों से व्याप्त है सज्जन तो पृथिवी पर थोड़े ही हैं।
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गुणवानों के साथ सङ्गति, गुणवानों के साथ वार्तालाप और गुणवानों के साथ मित्रता करने वाला मनुष्य दुःखी नहीं होता है।
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सन्त जहाँ बैठ जाते हैं वहीं पर आनन्द यात्रा शुरू हो जाती है और जब चल देते हैं तो यात्रा का आनन्द शुरू हो जाता है।
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सत्सङ्गति का फल बुद्धि है, बुद्धि का फल दुराग्रह का त्याग है, दुराग्रह के त्याग का फल शान्ति है और शान्ति रूपी वृक्ष का फल सुख है।
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जहाँ अच्छी हवा नहीं होती वहाँ रोग बढ़ते हैं और जहाँ सत्सङ्ग नहीं होता वहाँ आत्म रोग बढ़ते हैं।
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इत्र बेचने वाले के पास विना पैसे की सुगन्धी मिलती है, उसी तरह सत्सङ्गति में सुखी होने के सूत्र मिलते हैं।
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सङ्गति का प्रभाव प्रकृति में भी देखने को मिलता है, वायु का सङ्ग पाकर धूल आकाश की ऊँचाईयों को प्राप्त होती है, वहीं धूल जल का साथ पाकर नीचे की ओर बहने वाली कीचड़ बन जाती है।
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अग्नि के संयोग से पानी विभाव को प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार रागादि रूप अग्नि का स्पर्श होते ही स्वभाव भी विभाव रूप हो जाता है।
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दूध ने पानी की सङ्गति की तो पतला हो गया, आधी कीमत हो गयी, बदनाम हो गया और स्वाद भी बिगड़ गया किन्तु अल्पमूल्य वाले पानी को दूध ने अपने मूल्य का बना दिया।
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क्षेत्र का प्रभाव- दूध की डेरी में बैठकर कोई शराब भी पिये तो लोग समझेंगे दूध पी रहा है और मदिरालय में बैठकर कोई दूध भी पिये तो लोग समझेंगे शराब पी रहा है।
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एक क्षण की साधु की सङ्गति से वज्रबाहु, उदयसुन्दर का जीवन बदल गया था और महावैरागी चारुदत्त कुसङ्गति से वेश्यागामी हो गया था।
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राजकुमार वज्रबाहु की शादी मनोरमा राजकन्या से हुई थी, जब उनका साला उदयसुन्दर पहली बार बहिन को लेने आया, तो वज्रबाहु ने इस शर्त पर ले जाने की स्वीकृति दी कि हम भी साथ में चलेंगे, हाथी पर सवार होकर तीनों जा रहे थे, जङ्गल में पहुँचते ही मुनिराज के दर्शन हो गये, देखते ही वज्रबाहु के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया, उदयसुन्दर साले ने हँसी में कहा, जीजाजी आप दीक्षा ले लोगे तो हम भी दीक्षा ले लेंगे और छब्बीस राजाओं के साथ तीनों दीक्षित हो गये, वज्रबाहु मनोरमा के राग मे ससुराल जा रहा था क्षण भर की साधुसङ्गति से जीवन बदल गया था।
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बुजुर्गों की सङ्गति करो उनकी एक-एक झुर्री पर हजार-हजार अनुभव लिखे होते हैं, काँपते हाथ, हिलती गर्दन, लड़खड़ाते कदम, मुरझाया चेहरा यह सन्देश देता है कि जो भी शुभ करना है आज कर लो, कल नहीं कर पाओगे, बूढ़ा इंसान धरती का सबसे बड़ा शिक्षालय है, उसे देखकर उगते सूरज की डूबती कहानी का बोध होता है।
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बैटरी डिस्चार्ज होने पर लाईट की सङ्गति से ऊर्जावान होती है, उसी तरह साधुओं की सङ्गति से आत्मा की शक्ति जाग्रत होती है।
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मुनियों का रूप नहीं स्वरूप देखा जाता है पर वर्तमान में निःस्वार्थ समागम दुर्लभ हो गया है।
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लौकिक जन की सङ्गति से व्यक्ति वाचाल, कुटिल व दुर्भावना से युक्त हो जाता है, अतःलौकिक संसर्ग त्याज्य है।
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सत्पुरुषों की मित्रता सात कदम साथ-साथ चलने अथवा सात पदों का वार्तालाप होने पर हो जाती है, सत्पुरुषों में भी जो सत्पुरुष हैं उनकी मित्रता तीन कदम साथ चलने से हो जाती है और जो सन्तों में सन्त हैं, उनकी मित्रता पद-पद पर होती है।
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दुष्टों व काँटों के प्रति दो प्रकार की प्रतिक्रिया होती है, या तो उनका जूते से मुख भङ्ग कर दो, या दूर से छोड़कर चले जाओ।
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समूह में अकेले स्वादिष्ट भोजन नहीं करना चाहिए, अकेले अपना स्वार्थ सिद्ध नहीं करना चाहिए, रास्ते में अकेले नहीं चलना चाहिए, तथा सब सो रहे हों तब अकेले जागृत नहीं रहना चाहिए।
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घुड़साल का तोता- राजा ने दो तोते पलवाये एक घुड़साल में, एक रनवास में रखा, राजा एक दिन घुड़साल गया तो तोता बोला! रे बदमास पीछे हट जा, राजा को सुनकर क्रोध आया मेरा नमक खाकर मेरा अपमान करता है, इसको मरवा दो, राजा रनवास गया वहाँ का तोता राजा को देखकर दूर से ही मीठे नम्र स्वर में बोला, हे महाराज साहब स्वागत है, पधारिये, आसन ग्रहण कीजिये हे रानी, राजा साहब पधार रहें है, स्वागत करों, इसका व्यवहार देखकर राजा आश्चर्य में पड़ गया, एक माँ के दो बच्चे, एक भद्र दूसरा अभद्र ऐसा क्यों, मन्त्री जी ने जवाब दिया राजन्! ये सङ्गति व संस्कार का फल है, अपने आचरण से लोग आचरण सीखते है, गाँधी जी ने पहले अवगुण छोड़े फिर दूसरों से छुड़वाये।
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दुष्ट तिया का पोषना, मूरख को समझाय। बैरी ते कारज परे, कौन नाही दुःख पाय।।
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सद्भाव सहित और मायाचारी से रहित होकर साधर्मियों की यथायोग्य सेवा करना वात्सल्य कहलाता है।
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मोक्षसुख के कारणभूत अहिंसा धर्म में एवं सभी साधर्मियों में निरन्तर वात्सल्य भाव रखना चाहिये।
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न कोई किसी का मित्र है, न कोई किसी का शत्रु है व्यवहार से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।
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उत्सव में, कष्ट में, अकाल पड़ने पर, राष्ट्र में विप्लव होने पर, श्मशान में और राजदरबार में जो साथ देता है वही बन्धु कहलाता है।
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अपना बनाने के छ: कारण- मिलने पर मुस्कुराना, आदर करना, नाम याद रखना, सच्चे हृदय से बात करना, गुणों की प्रशंसा करना, भेजने जाना आदि।
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प्रेम की शक्ति दण्ड की शक्ति से हजार गुणी प्रभावशाली और स्थायी होती है।
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छेड़ के तो देखे कोई इस दिलेर को, प्रेम-मोहब्बत मे तो कुत्ते भी काट लेते हैं शेर को।
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जो वजन होता है प्यार का, वह वजन नहीं होता है व्यापार का।
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मत ठुकराओ गले लगाओ धर्म सिखाओ।
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वात्सल्य से कठोर हृदय व्यक्ति भी मोम की तरह कोमल बन जाता है।
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स्नेह न मिलने पर मित्र खल बन जाते हैं जैसे सरसों से तैल निकल जाने पर खली बन जाती है।
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प्रेम पूर्ण व्यवहार अमृत के समान एवं द्वेष पूर्ण व्यवहार विष के समान होता है।
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दो मित्र विदेश से धन कमाकर लाये, रास्ते में रात हो गई, धन की रक्षा हेतु तीन-तीन घण्टे सोने का वादा किया, एक देव सर्प बनकर के आया, एक मित्र को काटने लगा तो दूसरे ने विरोध किया, तो सर्प ने कहा! तुम मित्र के गले का दो बूँद खून दो तो हम चले जायेगें, तलवार से गर्दन रेत कर खून निकाला तो मित्र की नींद खुल गई गर्दन पर तलवार चलते देखी लेकिन फिर सो गया, सर्प चला गया खून देने वाले मित्र को आकुलता हुई मित्र क्या सोचेगा, जब इसका नम्बर आया सोने का तो नींद नहीं आई कारण पूछा तो कहा! कि मैंने आपका खून निकाला था तब आपने क्या सोचा था? तब मित्र ने कहा कि मित्र गर्दन काट रहा है तो हमारा भला ही कर रहा होगा, मित्र पर ऐसा विश्वास वफादार होना चाहिए।
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प्रेम चाहते हो तो दूसरों को भी प्रेम देना चाहिए।
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प्रीति ऐसी कीजिये जैसे लोटा डोर। गला फँसावे आपनो, जल पीवे कोई और।।
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धर्मी खड़ा बाजार में सबकी माँगे खैर। न काहू सो दोस्ती न काहू से बैर।।
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चार मिले चौसठ खिले बीस रहे कर जोड़। ज्ञानी ऐसे मिलन में पुलकित सात करोड़।। एक शरीर में अस्सी लाख करोड़ रोम होते हैं।
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भविजन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।।
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जो जुदा करे उस कैंची को भूमि पर पटकी जाती है। जो दो को एक करे सुईयाँ पगड़ी में रक्खी जाती है।।
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कलौ युगे सङ्घेशक्ति- धागे से धागा मिलकर कपड़ा और तिनके से तिनका मिलकर रस्सा बनता है जिससे बड़े-बड़े हाथी भी बाँधे जाते हैं, पाँच अगुलियाँ मिलती हैं तब ग्रास मुख में जाता है।
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एक और एक ग्यारह होते हैं, सङ्गठन शक्ति परिवार में, समाज में, देश में समृद्धि को लाती है।
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कौरव सौ हैं और पाण्डव पाँच हैं किन्तु पाण्डव कहते हैं कि तीसरा विरोध करेगा तो हम पाँच और कौरव सौ नहीं किन्तु हम एक सौ पाँच हैं।
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अन्धकार में दीप जलाना सबके वश की बात नहीं है, कठिन समय में साथ निभाना हर साथी की रीत नहीं है। मन के मौन समन्दर में जब पीड़ाओं का ज्वार उठा हो, पीड़ाओं को पीकर मुस्कराना सबके वश की बात नहीं है।।
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दुष्ट भलाई न करें, करो कोटि उपकार। सर्पिन दूध पिलाइये, विष ही के दातार।।
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बीमार के लिए, धनहीन के लिए, परदेश गये हुए के लिए व शोक से दुःखी मनुष्य को मित्र का दर्शन औषधि के समान है।
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पवित्रता, त्यागशीलता, शूरवीरता, सुख-दुःख में समानता, सरलता, अनुराग और सत्य व्यवहार ये मित्र के गुण हैं।
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इस असार संसार में मन के विश्वास के पात्र स्वभाविक मित्र की प्राप्ति होना 'निःसन्देह यही सार' है।
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रहस्य प्रकट करना, याचना करना, निर्दयता पूर्ण व्यवहार करना, चित्त की चञ्चलता, क्रोध, असत्य भाषण और जुआ खेलना ये मित्र के दूषण हैं।
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नाना दुःखों के कारण कुमार्ग में आसक्त मन वाले मित्र को जो रोकते नहीं हैं वे मानों भयङ्कर सर्पों से व्याप्त गहरे कुंए में गिरने कि प्रेरणा करते हैं।
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यदि किसी से उत्कृष्ट प्रीति रखना चाहते हो तो उससे वाचनिक विवाद, अर्थ का लेन-देन और परोक्ष में उसकी स्त्री से सम्पर्क ये तीन काम मत करो।
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देना, लेना, गुप्त बात कहना, गुप्त बात पूँछना, भोजन करना और कराना ये छः प्रीति के लक्षण हैं।
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'आइये-आइये, इस आसन पर बैठिये, आपके दर्शन से मैं प्रसन्न हुआ हूँ, क्या समाचार है, प्रतिकूलता में भी आप प्रसन्नता बनाए रखते हैं, बहुत समय बाद क्यों आए हो' इस प्रकार घर पर आये हुए मित्र से जो आदर पूर्वक सम्भाषण करते हैं उनके घर संशय रहित मन से सदा ही जाना चाहिए।
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गाँठ में दाम, परलोक में धर्म, विदेश में विद्या, जीवन में सच्चरित्र, कष्ट में सद्बुद्धि, बुढ़ापे में माला ये छः मित्र कहे गए हैं।
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प्रेम पूर्ण आहार-सबसे बड़ा उपहार- बनारस में महावीर जयन्ति के अवसर पर श्री जी की शोभा यात्रा निकलती थी किंतु कुछ वर्षों से विरोधी तत्त्वों के कारण रथ नहीं निकाल सकते थे, महावीर जयन्ती के अवसर पर पण्डित जगनमोहनलाल जी कटनी वालों को बुलाया, उनके कहने से सबसे पहले विरोधियों को प्रीति भोज दिया गया, चल समारोह के कार्य उन्हीं को सौंप दिये, रथ निकाला गया, चौराहे पर भोजक ने आलाप भरकर राग गाया 'दौलत पक्षपात तज देखो, साँचो देव कौन है इनमें' सुनते ही सबकी दुकानें खुल गयीं थी।
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निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन विना निर्मल करें सुभाव ॥4॥
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श्रमणों के पास आने में श्रम तो करना पड़ता है, किन्तु भ्रम दूर हो जाता है।
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अग्नि की सङ्गति से लोहा पिटता है और लोभ की सङ्गति से आत्मा पिटती है।
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जब माल होता है, तो दोस्त साथ देते हैं और जब मार पड़ती है, तो दोस्त किनारे हो जाते हैं।
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लोग माल उड़ाकर भी बुरा कहते हैं- एक सेठ के चार बेटे थे, उसने पाँच-पाँच लाख रुपए सबको बराबर बाँट दिये, बेटों ने सोचा समाज का मुख मीठा कर दो, छोटे बेटे ने अच्छी नमकीन-मिठाईयाँ खिलाई, खा-पीकर लोग चर्चा करने लगे, बाप का धन तो इसी ने उड़ाया है, तभी तो इतना खर्च कर रहा है, लोग माल भी उड़ा रहे थे और बुराई भी कर रहे थे, दूसरे बेटे ने केवल मिठाई बनायी, खा-पीकर लोग बोले ये तो बदमाश है, तीसरे ने पूड़ी-साग खिलाई तो लोगों ने कहा कञ्जूस है, चौथे ने दाल-रोटी खिलाई तो लोग बोले कि मक्खीचूस है, इसलिए इस जगत में प्रशंसा की दृष्टि से खर्च करना व्यर्थ है क्योंकि महावीर भगवान् की भी सब प्रशंसा नहीं करते हैं।
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प्रशंसा के लोभी इस तरह लुट जाते हैं- चार धूर्तों ने प्रशंसा के लोभी कञ्जूस राजा को लूटने का उपाय सोचा और स्यारों के बोलने के समय राजा के पास आये, राजा ने पूँछा स्यार क्यों रो रहे हैं? धूर्तों ने कहा हुजूर! आपके राज्य में सभी प्रजा सुखी है केवल इन बेचारों के आवास की व्यवस्था नहीं है राजा ने प्रशंसा सुन कर बीस लाख रुपये दे दिये। बार-बार यही कहकर धूर्तों ने राजा से साठ लाख रुपये ऐंठ लिये, चौथी वार राजा ने पूछा अब क्यों रो रहे हैं? धूर्तों ने कहा हुजूर! इनके रोने और गाने की आवाज एक जैसी ही है अतः अब ये रो नहीं रहे आपका गुणगान कर रहे हैं, राजा लुट कर के भी खुश हो गया।
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जो तपस्वी, व्रती, मौनी और जितेंद्रिय हैं अगर वह भी स्त्री की सङ्गति करें तो अपने संयम को कलङ्कित कर लेते हैं।
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आत्मा की बात दुर्लभ- भोगों की बातों को सिखाने वाले जगह-जगह टी.वी., कम्प्यूटर आदि साधन मिल जाते हैं, किन्तु आत्मा की बात सिखाने वाले दुर्लभ हैं, अतः आत्मा की बात सिखाने वालों की सङ्गति करना चाहिए।
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पचास वर्ष में जितना अकेले पढ़कर सीखोगे, उतना छः माह में ज्ञानियों की सङ्गति से सीख जाओगे।
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साधुओं की सङ्गति ही वास्तविक सङ्गति है, वह हमेशा श्रेष्ठ सुखदायी होती है, भव्यों के लिए कल्पवृक्ष के समान परमानन्द देने वाली होती है।
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सत्सङ्गति अज्ञानता दूर करती है, वचनों में सत्यता लाती है, सम्मान दिलाती है, पाप दूर करती है, मन प्रसन्न करती है, दिशाओं में कीर्ति फैलाती है और ऐसी कौन सी चीज है जो सत्सङ्गति से प्राप्त नहीं होती है?
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सन्त के विहार से सूना-सूना और आगमन से सोना-सोना हो जाता है।
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बसन्त आने पर प्रकृति मुस्कुराती है और सन्त के आने पर संस्कृति मुस्कुराती है, सूखों को हरा करना बसन्त का काम है, मुर्दों (आलसी) को खड़ा करना सन्त का काम है।
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गङ्गा पाप को, चन्द्रमा सन्ताप को और कल्पवृक्ष दीनता को दूर करता है, किन्तु साधु का समागम पाप सन्ताप और दीनता तीनों को दूर करता है।
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धर्म में प्रेरणा और अधर्म के निवारण द्वारा इष्ट प्रयोजन को साधता हुआ तथा अनिष्ट प्रयोजन को बाधता हुआ साधुओं का समूह जीवों का जैसा उत्कृष्ट उपकार करता है वैसा तीर्थ, ज्ञान और देव भी नहीं कर सकते हैं।
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साधु सङ्गति होने पर खोटे कार्यों में प्रवृत्ति नहीं होती। खोटी स्त्री, पुत्र तथा स्वामी आदि के दुर्वचन सुनने का दुःख नहीं होता। राजादिक को प्रणाम नहीं करना पड़ता, भोजन, वस्त्र, धन तथा स्थान की चिन्ता नहीं होती। ज्ञान की प्राप्ति होती है, लोक में प्रतिष्ठा बढ़ती है, शान्ति और सुख में प्रीति होती है। मृत्यु के बाद मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है, इस प्रकार श्रामण्य पद के ये गुण हैं अतः हे बुद्धिमान् पुरुषों! उस श्रामण्य पद को प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
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मुनि निन्दा- एक व्यक्ति साधुओं की बहुत निन्दा करता था, तो एक सेठजी ने कहा कि मैं अष्टान्हिक में मुनि को आहार देकर ही आहार करता हूँ, आप आठ दिन के लिए मुनि बन जाएँ, आपको बहुमूल्य वस्तु का इनाम एवं बढ़िया आहार करायेंगे, वह व्यक्ति लोभ वश तैयार हो गया, पर केश लोंच करने में दाँतों पसीना आ गया एवं उस दिन उपवास करना पड़ा तो दिन में तारे दिख गये, पारणा के दिन हलुआ पूड़ी भर पेट खा लिया, पानी की कमी पड़ गयी, तो नानी याद आ गयी, दूसरे दिन सेठजी से हाथ जोड़ कर बोले ! ये तपस्या हमारे वश की नहीं है और उस दिन से उन्होंने मुनि निन्दा करना छोड़ दिया।
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