Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

अनवरतमहिंसायां, शिवसुखलक्ष्मी निबन्धने धर्मे। सर्वेष्वपि च सधर्मिषु, परमं वात्सल्यमालम्ब्यं।।

मोक्षसुख के कारणभूत अहिंसा धर्म में एवं सभी साधर्मियों में निरन्तर वात्सल्य भाव रखना चाहिये।

One should hold constant vatsalya (affection) for the dharma of non-violence, which is the cause of the bliss of liberation, and for all one's co-religionists.

— आराध्य सूत्र · #2

इसी विषय के और सूत्र

सभी संगति →
संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति