Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

साधु सङ्गति होने पर खोटे कार्यों में प्रवृत्ति नहीं होती। खोटी स्त्री, पुत्र तथा स्वामी आदि के दुर्वचन सुनने का दुःख नहीं होता। राजादिक को प्रणाम नहीं करना पड़ता, भोजन, वस्त्र, धन तथा स्थान की चिन्ता नहीं होती। ज्ञान की प्राप्ति होती है, लोक में प्रतिष्ठा बढ़ती है, शान्ति और सुख में प्रीति होती है। मृत्यु के बाद मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है, इस प्रकार श्रामण्य पद के ये गुण हैं अतः हे बुद्धिमान् पुरुषों! उस श्रामण्य पद को प्राप्त करने का प्रयत्न करो।

In the company of saints one does not engage in wicked deeds; one need not suffer the harsh words of a bad wife, sons or master; one need not bow to kings and the like; there is no worry over food, clothes, wealth or lodging. Knowledge is gained, prestige in the world grows, and delight arises in peace and happiness; after death, liberation and such are attained. These are the virtues of the ascetic state — so, O wise ones, strive to attain that ascetic state.

— आराध्य सूत्र · #12

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति