Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

कौरवशतं वयं पञ्च, परस्पर विरोधिनः। अन्यस्मिन् विरोधे तु, वयं पञ्चाधिकं शतं।।

कौरव सौ हैं और पाण्डव पाँच हैं किन्तु पाण्डव कहते हैं कि तीसरा विरोध करेगा तो हम पाँच और कौरव सौ नहीं किन्तु हम एक सौ पाँच हैं।

The Kauravas are a hundred and we Pandavas are five, mutually opposed; but if a third opposes us, then we are not five and they a hundred, we are one hundred and five together.

— आराध्य सूत्र · #5

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति