Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संगति

452 सूत्र · पृष्ठ 5 / 7

सम्प्रदाय और संगठन स्वयं को स्वयं से बाहर कर देते हैं।
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सम्प्रदाय को मानने वाला कोई अपनी मान्यता नहीं बदलता है।
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सामंजस्य कीजिए इसी से सुखों का स्वर्ग बनेगा।
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चारण, बन्दी, नीच, नाई, माली और भिक्षुओं के साथ बुद्धिमान मनुष्यों को मन्त्रणा नहीं करना चाहिए।
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पड़ोसी से आत्मीयता जतलाने पर पड़ोसी अपना प्यार पूरे परिवार पर उड़ेल देता है।
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यदि किसी से उत्कृष्ट प्रीति रखना चाहते हो तो उससे तीन काम मत करो–१. वाचनिक विवाद, २.अर्थ का लेन-देन, ३.परोक्ष में उसकी स्त्री से मेल-जोल।
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देना, लेना, गुप्त बात कहना, गुप्त बात पूछना, भोजन करना और कराना ये ६ प्रीति के लक्षण हैं।
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आप केवल इन तीन लोगों पर विश्वास करें–१.जो आपकी हँसी के पीछे का दर्द समझे। २. आपके गुस्से के पीछे का प्यार समझे। ३.आपके मौन होने का कारण समझे।
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अच्छे लोगों की एक खूबी ये भी है कि उन्हें याद रखना नहीं पड़ता, वे याद आते हैं।
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उपदेश मूर्खों के क्रोध की शान्ति के लिए नहीं होता किन्तु क्रोध की वृद्धि के लिए होता है अत: उनको उपदेश न दें, जैसे सर्प को दूध पिलाओ तो विष ही बढ़ता है, निर्विष नहीं होता।
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लाख मूर्ख तज राखिये, इक पण्डित गुणवान। सर शोभा इक हँस से, लाख काक क्या काम।।
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सीख सरल को दीजिए, विकट मिले दुख होय। वी(पक्षी)ने सीख कपि को दयी, दियौ घोसला खोय।।
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ये प्राणीउपदेशदाता के विना संसार रूपी दु:खों के महासागर में परिभ्रमण कर रहे हैं।
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एक व्यक्ति का विरोध करने से महान पुरुष भी विपत्ति में पड़ जाता है, फिर अधिक लोगों का विरोध करने वाले मनुष्य का तो कहना ही क्या?
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अनुभवहीन व मूर्खों से बात करने के चार फल वचनों का व्यय, मानसिक सन्ताप, अपयश और प्रतारणा प्राप्त होती है।
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जो हितकारी तप, दान, धर्म तथा चारित्र आदि को बलपूर्वक प्रेरणा देकर ग्रहण कराता है, वह इस जगत् में श्रेष्ठ बन्धु है।
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पड़ोसी से प्रेम करने वाला व्यक्ति विपत्ति में भी सुखी रहता है, क्योंकि पड़ोसी सहयोग करता है और पड़ोसी से बैर रखने वाला व्यक्ति सम्पत्ति में भी दुःखी रहता है क्योंकि पड़ोसी परेशान करता है।
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स्वादिष्ट और रोग हरने वाली औषधि की तरह, हित चिन्तक और बुद्धिमान मनुष्य दुर्लभ होते हैं।
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सर्पों के द्वारा डसे हुए मनुष्यों का शरीर ही नष्ट होता है, परन्तु दुर्जन के द्वारा डसा हुआ मनुष्यों का वंश, वैभव, पाण्डित्य, क्षमा तथा कीर्ति आदि गुण क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।
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ज्ञानी बुजुर्गों की सङ्गति करो, क्योंकि उनकी एक-एक झुर्री पर हजार अनुभव लिखे होते हैं, उनके काँपते हाथ, हिलती गर्दन, लड़खड़ाते कदम, मुरझाया चेहरा सन्देश देता है कि जो भी शुभ करना है, आज ही कर लो कल नही कर पाओगे, बूढ़ा इंसान धरती का सबसे बड़ा शिक्षालय है, क्योंकि उसे देखकर उगते सूरज की डूबती कहानी का बोध होता है।
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स्वार्थसिद्धि के अभाव में परमोपकारी भी कट्टर शत्रु हो जाता है, उपकार से शत्रु भी मित्र बन जाता है।
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अपने को सुखी रखने का उपाय यह है कि पड़ोसी सुखी रहे, पड़ोसी चीखेगा तो आप सुखी नहीं रहेंगे।
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जितना लें उससे अधिक दें, बन्धनों से ऊपर उठें, नियमित व्यायाम करें, अच्छी सङ्गति चुनें।
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सन्देह नहीं विश्वास रखिए- शुभचिन्तकों पर विश्वास नहीं करने से धोखा खाना बेहतर है।
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छोटे बच्चों को भी मित्र बनाइए- अपने अवकाश के समय में कुछ क्षण छोटे बच्चों के साथ रहने के लिए भी सुरक्षित रखिये, इनके साथ खेलने का आनन्द उठाइए। ये आनन्द के सागर हैं। इनकी मीठी-मीठी बातें, तुतलाती बोली, लड़खड़ाते शब्द, आपको आनन्द के सागर में डुबो देंगे। इनकी निश्छल जीवन शैली आपको प्रत्येक वस्तु के प्रति एक न एक दृष्टिकोण से परिचित करायेगी। इनके अजीवों-गरीब प्रश्न आपको अधिक गहराई से सोचने पर मजबूर कर देंगे।
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विभिन्न व्यक्तियों के नामों को याद रखने से उन व्यक्तियों पर अच्छी छाप छूटती है, एवं व्यवसाय और कार्य क्षेत्र में वाञ्छित सहयोग प्राप्त होता है।
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जीवन में ऐसे मित्र जरूर रखिए जिससे कि दर्पण देखने की जरूरत न पड़े अर्थात् मित्र गलतियाँ बताते रहें।
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ज्ञानी मित्र के सदृश जीवन में कोई वरदान नहीं है।
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मिलने पर मित्र का आदर करो, पीठ पीछे उसकी प्रशंसा करो, तथा आवश्यकता के समय मदद करो।
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यदि दृढ़ मित्रता चाहते हो तो बहस करना, उधार लेना-देना, मित्र की स्त्री से बात करना छोड़ दो।
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भरतचक्रवर्ती ने जैसे राजा श्रेयाँस को आहार दान के समय, जयकुमार को स्वयंवर के समय प्रोत्साहित किया वैसे ही बाहुबली को प्रोत्साहित करते तो शायद युद्ध नहीं होता।
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व्यक्ति को दूसरों से नहीं अपनों से खतरा होता है, गाँधीजी को गोडसे ने मारा, सीता को राम ने वन में छोड़ा, रावण की मौत का कारण विभीषण हुआ, अञ्जना को घर से सास ने निकाला और विपत्ति में पिता ने छाया तक नहीं दी, पाण्डवों को मारने का प्रयास कौरवों ने किया, आदिनाथ को मारीच ने बदनाम किया, भरत ने बाहुबली से युद्ध किया।
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नम्रता सबके साथ रखो, मगर नजदीकी बहुत कम लोगों के साथ और उन्हे भी भरोसा करने से पहले परख लो।
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आप खुश होंगे तो लोग आपके पास आयेंगे, आप दुखी होंगे तो लोग आँख चुरायेंगे, लोग आपकी खुशियां बाँटना चाहते हैं, आपका दुःख नहीं बाँटना चाहते हैं, जिन्दगी के कड़वे घूँट आपको अकेले ही पीना पड़ेंगे।
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दयालुता, आपसी समझ और आत्मत्याग से रिश्ते बनते हैं, ईर्ष्या, स्वार्थ, अहङ्कार और रूखे व्यवहार से टूटते हैं।
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यदि एक बिन्दु सिन्धु से पृथक् हो जाती है तो सूर्य उसे सुखा देता है, जो समाज से, धर्म से कट कर रहेगा, वह सूख जायेगा।
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जिस तरह बाल काले करने के लिए डाई लगाते हैं, उसी तरह काले मन को सफेद करने के लिए सत्सङ्ग की डाई लगाना चाहिए। बाल पुनः सफेद हो जाते हैं पर मन पुनः काला नहीं होता है।
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आलसी, बहुभोजी, क्रूर, जो देश-काल का ज्ञाता न हो, निन्दित भेषी हो उसे घर में स्थान नहीं देना चाहिए।
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एकता का किला बड़ा मजबूत होता है, इसके भीतर रहने वाला प्राणी दुःख नहीं भोगता है।
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अनेक तिनकों से बनाई गयी रस्सी बड़े-बड़े हाथियों को बाँध लेती है।
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प्रत्येक व्यक्ति को हाथ की पाँच अङ्गुलियों की तरह रहना चाहिए, कोई छोटी, कोई बड़ी होने पर भी कोई चीज सब इकट्ठी होकर उठाती हैं।
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मकान ममता का घर है और मन्दिर समता का घर है। साधर्मी में नख और मांस की तरह स्नेह होना चाहिये।
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मनुष्यता, मुमुक्षुता, महापुरूष का सत्सङ्ग ये तीन बहुत दुर्लभ है। साधु सुलभ है पर साधुता दुर्लभ है।
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वात्सल्य से कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी मोम की तरह कोमल हो जाता है।
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व्यक्ति को मैत्री भाव सबसे रखना चाहिए पर मित्र का चयन पत्नि की तरह सावधानी से करना चाहिए।
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सदैव सामने वाले की आखों में झाँककर उसे समझने की कोशिश करें।
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दूसरे व्यक्तियों को आनन्द प्रदान करने के लिए और उनको अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उनकी बातों को मन्त्रमुग्ध होकर सुनना सर्वोत्तम साधन है, सहमत न होते हुएभी कभी-कभी सहमति दिखाते रहिए।
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शान्ति के लिए टाङ्ग खिचाई नहीं मदद करना चाहिए।
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एकता वही होती है जहाँ स्वार्थ, प्रलोभन और अहम्भाव नहीं होता है।
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परीक्षा- आपत्ति में मित्र की, युद्ध के समय शूरवीर की, सङ्कट के समय कुटुम्बी जनों की, निर्धन अवस्था में पत्नि की परीक्षा होती है।
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कड़वा मजाक दोस्ती का जहर है।
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निमित्त का असर किस पर- शीशी में रखी शराब से शीशी में कुछ प्रभाव नहीं होता, कोई आदमी पीले, तो नशा चढ़ जाता है।
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अपने चाहने वालों को छोटा-मोटा उपहार देकर प्रसन्न करें।
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दूसरों की समस्या भली भाँति सुनें, भाषण करने का अभ्यास करें, किसी समूह की सदस्यता ग्रहण करें, समाजोपयोगी कार्यों के लिये कुछ समय अवश्य देवें।
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क्या आपसे मिलने वाला हर व्यक्ति प्रसन्न रहता है?
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क्या आप इस बात का ध्यान रखते हैं कि किसी के घर ऐसे समय न पहुँचे, जब घर के सदस्यों को असुविधा हो?
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क्या गुणवान लोगों की सङ्गति आपको अच्छी लगती है?
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क्या आप दूसरों पर विश्वास रखते हैं?
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ज्ञान बढ़े गुणवान की सङ्गति, ध्यान बढ़े तपसी सङ्ग कीने, मोह बढ़े परिवार की सङ्गति, लोभ बढ़े धन में चित दीने। क्रोध बढ़े नर मूढ़ की सङ्गति, काम बढ़े तिए को सङ्ग कीने, बुद्धि विवेक विचार बढ़े कवि दीन सो 'सज्जन सङ्गति' कीजे।।
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समस्त रत्नों का खजाना, कल्याण व सम्पदा का कारण, एवं सबकी उन्नति का मूल गुणवानों की सङ्गति मानी गई है।
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यह हमारा है, यह पराया है ऐसी मान्यता छोटे मन वालों की होती है, किन्तु उदार चरित्र वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही कुटुम्ब होती है।
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साधुओं का दर्शन पुण्य वर्धक है क्योंकि साधु तीर्थ स्वरूप होते हैं, तीर्थ काल पाकर फलदायी होता है किन्तु साधु समागम तत्काल फलदायी होता है।
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दुर्जनों की सङ्गति से साधु जनों में भी दोष आ जाते है जैसे कि रावण के सीता हरण करने पर समुद्र को भी बन्धन प्राप्त हुआ था।
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थोड़ी भी दुर्जनों की सङ्गति महान सद्गुणों का नाश करती है जैसे कि छाछ के संयोग से दूध अपना स्वभाव छोड़ देता है।
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पुष्पों की सङ्गति से कीड़ा भी सज्जनों के सिर पर चढ़ जाता है और महापुरुषों के द्वारा प्रतिष्ठित होकर पत्थर भी देवत्व को प्राप्त हो जाता है।
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गुण गुणवानों को पाकर गुणी हो जाते हैं और गुणहीन को पाकर दोष रूप परिणमन कर जाते हैं जैसे कि मीठे जल वाली नदियाँ समुद्र में मिलकर खारी हो जाती हैं।
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नीच लोगों की सङ्गति करने से मति हीन हो जाती है, बराबरी वालों की सङ्गति से मति बराबर रहती है और विशिष्ट लोगों की सङ्गति करने से मति विशिष्ट हो जाती है।
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दुर्जनों के साथ मित्रता और प्रीति दोनों ही नहीं करनी चाहिये क्योंकि अङ्गार गरम होता है तो जलाता है और ठण्डा होता है तो हाथ काला करता है।
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लोक में चन्दन शीतल है, चन्दन से भी शीतल चन्द्रमा है, चन्दन और चन्द्रमा से भी शीतल साधु सङ्गति है।
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चित्त मिले तो चेला कीजे, मित्र मिले तो मेला। साधु मिले तो सङ्गति कीजे, न तो सबसे भला अकेला।।
संगति
सङ्गत कीजे साधु की, ज्यो गन्धी को वास। जो गन्धी कुछ दे नहीं, तो भी वास सुवास।।
संगति
क्रोधी लोभी कामी मदी, चार सूझते अन्ध। इनकी सङ्गति छोड़िये, नहीं कीजे सम्बन्ध।।
संगति
खोटी सङ्गति कटुवचन, अरु पर तिय सों नेह। कारण बने विनाश के, नशे धरम-धन-देह।।
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ज्ञान बढ़े गुणवान की संगति, ध्यान बढ़े तपसी संग कीने। मोह बढ़े परिवार की संगति, लोभ बढ़े धन में चित दिने। क्रोध बढ़े नर मूढ़ की संगति, काम बढ़े तिय को संग कीने। बुद्धि विवेक विचार बढ़े, कवि दीन सो सज्जन संगति कीजे॥
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सौ भोगी एक बालक के हृदय का परिवर्तन नहीं कर सकते, किन्तु एक योगी हजारों लोगों के हृदय का परिवर्तन कर देता है।
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