Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

जाड्यन्धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं, मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति। चेत: प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं, सत्सङ्गति: कथय किं न करोति पुंसां।।

सत्सङ्गति अज्ञानता दूर करती है, वचनों में सत्यता लाती है, सम्मान दिलाती है, पाप दूर करती है, मन प्रसन्न करती है, दिशाओं में कीर्ति फैलाती है और ऐसी कौन सी चीज है जो सत्सङ्गति से प्राप्त नहीं होती है?

Good company removes dullness, instils truth in speech, bestows honour, drives away sin, gladdens the mind, and spreads fame in all directions—tell me, what is there that good company does not do for a person?

— आराध्य सूत्र

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति